रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
मू०-रावण-मधुछंद ॥ मोकहँरोकिसकेकहिकोरे ।
युद्धजुरैयमहूंकरजोरे ॥ राजसभातिनुकाकरिलेखों । देखिकै
राजसुताधनुदेखौं ॥ २१ ॥ सवैया ॥ बानकह्योतबरावणसों
अबवेणिचढाउशरासनको । वातबनाइबनाइकहाकहछोडि
देआसनवासनको । जानतहैकैधौं जानतनाहिंनतू अपनेमद
नाशनको । ऐसेहिकैसेमनोरथपूरतपूजेबिना नृपशासनको
॥ २२॥ रावण-बंधुछन्द ॥ बाननबाततुम्हैकहिआवै॥ बान॥
सोईकहौंजियतौहिंजोभावै ॥ रावण ॥ काकरिहौहमतौंहीं
बरैंगे ॥ बान ॥ हैहयराजकरीसोकरेंगे ॥ २३ ॥ रावण-दं
डक ॥ भौंरज्यौंभवतभूतवासुकीगणेशयुतमानोमकरन्द
बुन्दमालगंगाजलकी । उडतपरागपटनालसीविशालवाहुक
हाकहौंकेशोदासशोभापलपलकी । आयुधसघनसर्वमंगला
समेतिसर्वपर्वतउठाइगतिकीन्हीहैकमलकी । जानतसकललो
कलोकपालदिगपालजानतनबानबातमेरेबाहुबलकी॥ २४ ॥
टी०-॥ २१॥ आसन बिछावने औ वासन वस्त्रनको छोडिदे अर्थ मलरूप
काचिधनुष उठावोआइ अथवा सीताके लेवेकी जे आशा है तिनकी कामना स्मरण
छोडिदे अपने मदनाशनको मोको तू जानतहै कि नहीं जानत जो ऐसी बात कहत
हैं कि सीताको बिना धनुष तोरेही बरिहों अथवा अपने मदनाशनको धनुषको अर्थ
यह धनुष तुम्हारे मदको नाश करिहै नृपशासन धनुष उठाइबो ॥२२॥ हैहय राजा
सहस्रार्जुन ॥ २३ ॥ वासुकी सर्प औ गणेश सहित भूतगण जा पर्वत में कमल-
के भौंरसम भंवत भये औ महादेवके शीशको जो गंगाजल गिर्यो ताकी माल
मकरंद पुष्परस भयो औ उडत ये पार्वती आदि के पटवस्त्र हैं तेई पराग पुष्प-
धूलि औ मेरो बाहु जो हैं सो नाल कमलदंड भयो एने में या जनायो कि जब
मैं कैलास उठायो तब अतिशीघ्र उठायो तासों शंभुशीश को गंगाजल गिर्यो औ
वस्त्र उडत भये औ आयुध सघन कहि या जनायो कि तुम एक शंभु धनुष
उठाइबो कठिन मानत हौ वा पर्वतमें ऐसे अनेक आयुध रहे सर्व मंगला
पार्वती ॥ २४ ॥
मू०-मधुभारछंद ॥ तजिकैसुरारि । रिसचित्तमारि ॥ दश
कंठआनि । धनुछुयोपानि ॥ २५ ॥ विमति ॥ तुमबलनि-
धान । धनुअतिपुरान ॥ पीसजहुअंग । नहिंहोहिभंग॥२६॥
सवैया ॥ खंडितमानुभयोसबकोनृपमंडलहारिरह्योजगती
को ॥ व्याकुलबाहुनिराकुलबुद्धिथक्योबलविक्रमलंकपतीको
कोटिउपाय कियेक हिकेशवकेहून छाँडत भूमिरतीको । भूरि
बिभूतिप्रभावसुभावहिज्यॉ न चलैचितयोगयतीको ॥ २७ ॥
पद्धटिका ॥ धनुअतिपुरानलंकेशजानि । यहबातबानसोंक
हीआनि ॥ हौं पलकमाहँ लैहौंचढाइ । कछु तुम्हूँतोदेखोउठाइ ॥२८॥
टी०--सुकहे सोरारि वाग्विवाद अथवा सुरारि । बाणासुर ॥ २५ ॥ २६ ॥
निराकुल शिथिल बलदेह बल विक्रम उपाय विभूति ऐश्वर्य सुवर्ण रत्न गजादि
योग यती योगी ॥ २७ ॥ धनुष मोसों उठन लायक नहीं है यह जानिकै लंके-
शरावण अपनो भ्रमर राखि धनुष छोडि कै बाण सो यह बात कह्यो कि धनुष
अति पुरान है ॥ २८ ॥
मू०--वाण०--दोहा ॥ मेरेगुरुकोधनुषयह, सीतामेरीमाइ ॥
दुहूँभाँति असमंजसै, बाणचलेसुखपाइ ॥ २९ ॥ रावण-तो
टकछन्द ॥ अबसीय लियेबिनहौनटरौं । कहुँ जाहुँ नतौलगि
नेमधरौं ॥ जबलों न सुनौअपनेजनको । अति आरतशब्द
हतेतनको ॥ ३० ॥ ब्राह्मण-मोदकछंद ॥ काहू कहूँ शरआ-
शरमारिय । आरतशब्द आकाशपुकारिय ॥ रावणकेवहका
नपरयोजब ॥ छॉडिस्वयंवरजातभयोतब ॥ ३१ ॥ दोहा ॥
जबजान्योसबकोभयो, सबहीविधिव्रतभंग ॥ धनुषधरचोलै
भवनमें, राजाजनक अनंग ॥ ३२ ॥
इति श्रीमत्सकळलोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रि-
कायामिन्द्रजिद्विरचितायांबाणरावणयोर्वाग्विवादवर्णनं
नामचतुर्थः प्रकाशः ॥ ४ ॥
पञ्चमप्रकाशः ५. (४१)
टीका-॥ २९ ॥ हतेकहेबाणादि सों वेधे अर्थ-मेरे दास इहां उहां यज्ञादि
विघ्नकरत फिरत हैं तिनको जो कोऊ सताइहै तो तिनकी रक्षाको जैहौं ॥ ३० ॥
जब मारीचादिको रामचन्द्र मारयो है तब तिनको आरत पीडित दुःखितेति शब्द
सुनि रावण स्वयंवर सभाते गयो सो भेद कछू ब्राह्मण तौ जानत नहीं तासों
संदेह विशिष्टहै कहतहै कि कहूँ बली कहूँ कौन्ह्यौ स्थानमें शर बाणसों आशग
कहे काहू राक्षसको मारचो “क्रव्यादोस्त्रप आस्र इत्यमरः” । सुद्भासुर मारिय
कहूँ यह पाठ है तौ सुद् नामा राक्षसते भा कहे उत्पन्न जो असुर राक्षस है मारीच
ताको सुद् नाम राक्षसकी स्त्री ताड़का है ताको पुत्रमारीच है औ कहूँ शरमारीच
मारिय पाठ है तौ शरसों मारीच नामा राक्षसको मारचो ॥ ३१ ॥
अनंग विदेह ॥ ३२ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीप्रसादाय जनजानकीप्र-
सादनिर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकायाचतुर्थःप्रकाशः ॥ ४ ॥
मू०--दोहा ॥ यहप्रकाशपंचमकथा, रामगवनमिथिला
हि ॥ उद्धारणगौतमघरनि, स्तुतिअरुणोदयआहि ॥ १ ॥
मिथिलापतिकेवचनअरु, धनुभंजनउरधार ॥ जैमालादुंडु
भिअमर, वर्षनफूलअपार ॥ २ ॥ ब्राह्मण-तारकछंद ॥ जब
आनिभईसबकोदुचिताई । कहिकेशवकाहूपैमेटिनजाई ।
सियसंग लियेऋषिकीतियआई। इकराजकुमारमहासुखदाई ३॥
मोहनछंद।सुंदरवपुअतिश्यामलसोहै। देखतसुरनरकोमनमोहै
आनिलखीसियकोबरुऐसो । रामकुमारहिदेखियजैसो ॥४॥
तोटकछंद ॥ ऋषिराजसुनीयहबातजहीं । सुखपायचलेमि
थिलाहितहीं ॥ बनरामशिलादरशीजबहीं । तियसन्दररूप
भईतबहीं ॥ ५ ॥ विश्वामित्र-सोरठा ॥ गौतमकीयहनारि,
इन्द्रदोषदुर्गतिभई ॥ देखितुम्हेंनरकारि, परमपतितपावनभ
इ ॥ ६ ॥ कुसुमवि-चित्राछन्द ॥ तेहिअतिहरषेरघुपतिदे-
ख्यो । सबगुणपूरेतनमनलेख्यो ॥ यहबरमाँग्योदियोनका
हू । तुममममनतेकहूंनजाहू ॥ ७ ॥ कलहंसछन्द ॥ तहँता-
हिदैबरुकोचलेरघुनाथजू । अतिशूरसुन्दरयोंलसैंऋषिसाथ
जू ॥ जनुसिंहकेसुतदोउसिद्धिश्रीरये । बनजीवदेखतयोंसबै
मिथिलागये ॥ ८ ॥
टीका- ॥ १ ॥ २ ॥ जबधनुषकाहुसों नाउठयो तब सब के जनकादिके
मनमें दुचितई भई कि सीताको व्याह अब ना ह्वै है तादुचितई मेटिबेके
लिये त्रिकालदर्शिनी काहू ऋषिकी स्त्री एक राजकुमार सीताके संग चित्रमें
लिखिकै ल्याई किं सीताको या प्रकारको वरु मिलि है आशय कि जब या
प्रकारको राजकुमार आवै तब शम्भु धनुष चढ़ाइक सीताको व्याहै ॥ ३ ॥
सो हे ऋषि ! जैसो इन रामकुमारको देखियतहै तैसोई वरु ऋषिकी स्त्री सीताको
लिखिल्याई ॥ ४ ॥ ५ ॥ दुर्गति दुर्दशाको गई कहे प्राप्त भई ॥ ६ ॥ रूरेसुंदर
॥ ७ ॥ अति शूर औ सुंदर दुवौ राम लक्ष्मण ऋषिके साथमें ऐसे शोभित भये
मानो सिद्धि जो तप सिद्धिहै ताकी श्रीशोभा में रमे कहे अनुराग सिंहके सुत पुत्र
हैं सिंहादि बन जीव तपस्विनके वश्य होत हैं यह प्रसिद्ध है औ सिद्ध है श्रीरये
पाठ होइ तौ सिद्ध स्वाभाविक श्रीशोभा सों रये युक्त ॥ ८ ॥
मू०-दोहा ॥ काहूकोनभयोकहूं, ऐसोसगुन न होत । पुर
पैठतश्रीरामके भयोमित्रउदोत ॥ ९ ॥ राम-चौपाई ॥
कछुराजतसूरयअरुनपरे । जनुलक्ष्मणकेअनुरागभरे ॥
चितवतचित्तकुमुदिनीत्रसै । चोरचकोरचितासोलसै ॥१०॥
लक्ष्मण-षटपद् ॥ अरुणगातअतिप्रातपद्मिनीप्राणनाथ
भय । मानहुँकेशवदासकोकनदकोकप्रेममय ॥ परिपूरण
सिंदूरपूरकैधौंमंगलघट । किधौं शक्रकोछत्रमढयोमानिक-
मयूषपट ॥ कैशोणितकलितकपालयह किलकपा-
लिकाकालको । यहललितलालकैधौंलसतदिग्भामिनिके
भालको ॥ ११ ॥
टी०-अति अनुराग करि पुरमें पैठतही लक्ष्मणके सगुनार्थ उदित भये ताही
अनुराग प्रेमसों मानो भरेकहे पूरित हैं अथवा लक्ष्मणको ब्याज करि सगुन
पंचमप्रकाशः ५. ( ४३ )
समय उदयसों आपने ऊपर सूर्यको प्रेम जनायो यह कहनूति लोकरीति है
॥ १० ॥ पद्मिनी प्राणनाथ सूर्य अरुण तामें तर्कहैं कोकनद कमलनको
फुलावत हैं कोक चक्रवानको संयोगी करत हैं तासों मानो तिनके प्रेममयीहै
अर्थ तिन प्रति जो प्रेम है सो ऊपर छाइ रह्यो है सिंदूरकी पूर प्रवाह जलेति अर्थ-
सिंदूर मिश्रित जलसों भरचो अथवा परिपूर्ण सिंदूरसों पूर कहे पूरित अर्थ
सिंदूरहीसों भरयो अथवा सिंदूर सों रँग्योकै मंगल विवाहादिको घट पूजन
कलशहै मानिक रत्नकी मयूष किरण तिनको वीन्यो पटवस्त्र औ कोकिलकहै
निश्चयकरि यह कपालिकाकाली पै श्रोणितरुधिर कलितकालको कपालशीश
है अथवा कपालिकाको व कालको श्रोणित कलितकपाल है कालीको
रुधिर मांसभक्षकतासों कालको सर्वभक्षक तासों 'कालो जगद्भक्षकः' इति
प्रमाणात् ॥ ११ ॥
मू०-तोटकछन्द ॥ पसरेकरकुमुदिनिकाजमनो । कि
धौंपद्मिनिकोसुखदेनघनो ॥ जनुऋक्षसबैबहित्रासभगे ।
जियजानिचकोरफंदानठगे ॥ १२ ॥ रामचन्द्र-चंचरीछन्द ॥
व्योममेंमुनिदेखियेअतिलालश्रीमुखसाजहीं । सिंधुमेंबड़वा-
ग्निकीजनुज्वालमालबिराजहीं । पद्मरागनिकोकिधौंदिविविधू-
रिपूरितसोभई । शुरवाजिनकीखुरीअतितिक्षतातिनकी
हई ॥ १३ ॥ विश्वामित्र-सोरठा ॥ चढ्योगगनतरुधाइ,
दिनकर बानरअरुणमुख ॥ कीन्होंझुकिझहराइ, सकलतार
काकुसुमबिन ॥ १४ ॥
टी०-कुमुदिनि कोई के काजकहै गहिबेको कुमुदिनि भयसों संकोचको प्राप्त
होती है तासों ऋक्ष नक्षत्र यहि त्रास कहे फंदाभ्रमके त्रास ॥ १२ ॥ यामें आका-
शमें सूर्यकी लाली छाई रही है ताको वर्णन है मुनि विश्वामित्र को
संबोधन है ॥ १३ ॥ सूर्योदय सो नक्षत्रअस्त भये तामें विश्वामित्रने तर्ककरचो
दिनकर सूर्यरूपी जो अरुणमुख वानरहै सो गगन आकाशरूपी तरुवृक्षमें धाइक
चढयो है सो झुकि कहे रिसायकै झहराइकहे हलाइकै सकल तारका नक्षत्ररूपी
जे कुसुम फूले हैं तिन बिन कीन्ही सकल नक्षत्रास्तभयो तासों झुकि पद
करचो ॥ १४ ॥
( ४४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०--लक्ष्मण-दोहा ॥ जहींबारुणीकीकरी, रंचकरुचिद्वि
जराज ॥ तहींकियोभगवन्तबिन, संपतिशोभासाज ॥ १५॥
तोमरछन्द ॥ चहुँभागबागतडाग । अबदेखियेबडभाग ॥
फलफूलसोंसंयुक्त । अलियोंरमैजनमुक्त ॥ १६॥राम-दोहा॥
तिननगरीतिननागरी, प्रतिपदहंसकहीन॥जलजहारशोभितन
जहँ, प्रगटपयोधरपीन ॥ १७ ॥
टी०--वारुणी पश्चिमदिशा औमदिरा द्विजराज चन्द्रमा औ ब्राह्मण भगवंत
सूर्य औ ईश्वर संपत्ति चांदनी औ द्रव्यशोभा अंग छबिदुवौमें जानो सूर्योदय-
सों पश्चिम दिशामें शोभारहित चंद्रबिंब देखि श्लेषोक्तिसों वर्णन करयो जो ब्राह्मण
मदिराकी रुचि इच्छा करतहै ताको ईश्वर संपत्त्यादि सों हीन करत हैं ॥ १५ ॥
चहुँ भागचारौंवोरमुक्त साधुजन ॥ १६ ॥ जा जनकदेशगेते नगरी पुरी औ
तेनागरी स्त्री नहीं हैं जे प्रतिपदस्थान स्थान प्रति औ चरण चरण प्रति हंसपक्षी
ओक कहे जल औ हंसक बिछुवन सों हीन है औ जहां कहे जिनमें पीन बडे
पयोधर वापी कूपतडागादि औ कुचनमें जलज कमल औ मोतिनके हार समूह औ
माला नहीं शोभित अर्थ सब नगरिनमें जलाशय जल युक्त हैं तिनमें कमल
फूलैहैं औ हंस बसत हैं औ स्त्री मोतिनके माला औ बिछुवा पहिरे हैं यासों या
जनायो कि विधवा नहीं है और अथ-जो देश तिन नगरिन औ तिन नागरिन
सों युक्त है युक्तेतिशेषः । जिनके प्रतिपद् कहे मग राजमार्गोंति औ पग चिह्न
जे धूरिमें अंकित होत हैं तेई हंसपक्षी औकजल औ बिछुवन करिहीन हैं अर्थ
नगरीमें राजमार्ग छोड़ि अन्यत्र हंसयुक्त जल शोभितहै औ स्त्रिनके पग चिन्हही-
में बिछुवा नहीं हैं औ पगनमें सब बिछुवा पहिरेंहैं ओप जहां कहे जिन नगरिनमें
औ स्त्रिनमें शोभितन जलज हारन कमल समूहन औ मोतीमालनसों युक्त पीन
बडे पयोधर तडागादि औ कुचहैं ॥ १७ ॥
मू०-सवैया ॥ सातहुदीपनकेअवनीपतिहारिरहेजियमें
जबजाने । बीसबिसेब्रतभंगभयोसोकहौ अबकेशवकोधनुता-
ने । शोककिआगिलगीपरिपूरणआइगयेघनश्यामबिहाने ।
जानकिकेजनकादिककेसबफूलिउठेतरुपुण्यपुराने ॥ १८॥
दोधकछन्द ॥ आइगयेऋपिराजहिंलीने ॥ मुख्यसतानँदवि
प्रप्रवीने । देखिदुवौभयेपांयनिलाने । आशिपशीरषवासुलै
दीने ॥ १९ ॥ विश्वामित्र-सवैया ॥ केशवयेमिथिलाधि
पहैंजगमेंजिनकीरतिबेलिबईहै । दानकृपान विधातनसोंसिग
रीवसुधाजिनहाथलई है । अंगछतासकआठकसोंभवतीनिहु
लोकमैंसिद्धिभई है । वेदत्रयी अरुराजसिरी परिपूरणताशुभ
योगमई है ॥ २० ॥
टी०-घनश्याम रामचन्द्र औ सजलमेघ जैसे सजल मेघन्के आगमनसों
वृक्षकनकी दावाग्नि बुझातीहै औ हरित है जात हैं तैसे धनुष काहूसों ना उठ्यो
अब सीताको ब्याह ना है है ऐसे गाढ समयमें हम कछु सहाय ना कियो यह जासों
कहै ताको आगि जनकादिके पुण्य वृक्षनमें लगीरहै सो रामागमन सों
धनुष उठिबो निश्चय करि बुझानी औ फूलि उठे प्रफुल्लित है उठे हरित है उठे
इति ॥ १८ ॥ मुख्य जे सतानन्द प्रवीने विप्र ऋषि हैं ते राजा जनकको लीन्हें
विश्वामित्रको आगे है लेवेको आइ गये विश्वामित्रको देखि दुवौ सतानन्द औ
जनक पांयनमें लीनभये विश्वामित्र शीश सूंघी आशिष दयो ॥ १९ ॥ विश्वा-
मित्र रामादिसों जनककी बडाई करत हैं वेदत्रयी कहे तीनोंवेद ऋग्वेद, सामवेद
यजुर्वेद, तिनके अंगसों औ राजश्रीके सात अंग सों औ योगके आठ अंग सों
भव जो संसार है तामें तीनिहुँ लोकमें जनककी
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
( ४६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
हनछंद ॥ जनराजवंत जगयोगवंत । तिनकोउदोत । केहि
भाँतिहोत ॥ २२ ॥ श्रीराम-विजय ॥ सबछत्रिनआदिदै
काहूछुईंनछुयेबिजनादिकबातउगै । न घटैनबढैनिशिबासरके
शवलोकनकोतमतेजभगै । भवभूषणभूषितहोतनहींमदमत्त
गजादिमसीनलगै । जलहूंथलहूंपरिपूरणश्रीनमिकेकुलअ
द्भुतज्योतिजगै ॥ २३ ॥
टी०-जब विश्वामित्र जनककी स्तुति करचुके तब जनक अपने मंत्री आदि
सों विश्वामित्रकी बड़ाई करते हैं उत्तमवर्ण ब्राह्मण औ अरुणरंग अर्थ-तप-
स्याकरि क्षत्रिय सों ब्राह्मण भये ॥ २१ ॥ जब विश्वामित्र जनकके राज्य औ
योगकी स्तुति कियो तब संदेह युक्त है लक्ष्मण पूछयो कि, जे जन जगतमें राज्य
औ योग दुवौ साधत हैं ते कैसे उदयको प्राप्त होत हैं काहेते राज्य औ योग
परस्पर कर्म विरुद्ध हैं ॥ २२ ॥ लक्ष्मण पूछयो कि जेजन राजवंत योगवंत हैं
तिनको उद्योत कैसे होत है सो सुनिकै कहिबेकी अद्भुत युक्ति मनमें प्राप्त भई
तासों विश्वामित्र सों प्रथमहीं रामचंद्रही उद्योतके हेतुकहन लगे उद्योत ज्योतिको
होत है तालिये ज्योतिरूप करि कहत हैं कि निमि जे जनकके पुरिखा हैं तिनके
कुलकी जो ज्योतिप्रकाशकी शिखा है सो अद्भुत जगै कहे जगति है दीपित है
है इति अर्थ और दीप ज्योतिके सम नहीं है सो अद्भुतता कहत हैं कि,
दीप ज्योति को और दीप ज्योति छ्वै सकति है अर्थ समता करि सकति
है अर्थ जैसे एक दीपकी ज्योति होति है तैसी सजातीय औरहू दीप की होती
है औ या निमिकुलकी ज्योतिको आदि दै कहे आदिही सों जबसों प्रगट भई
है. अर्थ-जबसों निमिवंश भयो तब सों काहू क्षत्रिन नहीं छुयो अर्थ-समता
कर्यो फेरि कैसी है कि और ज्योति व्यजनादि बातसों डगमगाती है यह ज्योति
व्यजनादि बातसों नहीं उगती आदि पदते चामरादि जानौ अर्थ व्यजनादि
बात भोगादिको सुख जामें लिप्त नहीं हैसकत फेरि कैसी है कि और दीप ज्योति
दिनमें घटतिहै औ यह निशिवासर कहे रात्यौंदिन घटति बढति नहीं है अर्थ-
सबप्राणी जा वंशमें बराबर होत जात हैं तासों घटति नहीं औ पूर्णताको प्राप्त
है तासों बढति नहीं औ और दीप ज्योतिसों थल मात्रहीकौ तम अंधकार दूरि
होत है यासों कनकोत्तम तेज कहे अज्ञानको तेज दूरि होत है अर्थ-जिनके उप-
पंचमप्रकाशः ५. ( ४७ )
देश सों अथवा गानकरे सों अथवा कथा सुनि कै लोकन के प्राणिन को अज्ञान
दूरि होत है । ज्ञानी होत हैं फेरि कैसी है कि दीप ज्योति भवभूषण जो भस्म
है तासों अर्थ गुलसों भूषित होति है औ यह भव जो संसार है ताके जे भुवन कुंड-
लादि हैं तिनसों नहीं भूषित होती अर्थ कुंडलादि धारण सुखमें नहीं लिप्त होती
औ दीप ज्योतिमें मषी जो मसी है कज्जल रति सों लगति है अरु यामें
गजादिरूपी जो मषी है सो नहीं लागति अर्थ गजादि आरोहण सुखभोगमें
लिप्त नहीं होती आदि पदते रथास्वादि जानो औ दीप ज्योति थलहींमें पूर्ण
रहति है औ यह जलहू थलमें परिपूरण है अर्थ--जल थलमें प्रसिद्ध है योगसों
जीवन्मुक्त है तासों राज्यसुखमें लिप्त नहीं होत इतिभावार्थः ॥ २३ ॥
मू०--जनक-तारक ॥ यहकीरतिऔरनदेशनसोहै । सु
निदेवअदेवनकोमनमोहै ॥ हमकोवपुरासुनियेऋषिराई ।
सबगांउंछसातककीठकुराई ॥ २४ ॥ विश्वामित्र-विजय ॥
आपने आपनेगैरनितौभुवपालसबैसुवपालैंसदाई । केवल
नामहिकेभुवपालकहावतहैंभुवपालिनजाई । भूपनिकीतुमहीं
धरिदेहबिदेहनमें कलकीरतिगाई ॥ केशवभूषणकीभवभूषण
भूतनतैंतनयाउपजाई ॥ २५ ॥
टीका-जा प्रकार तुम वरण्यो यह कीरति और बडे राजनमें मोहति है या
लायक हम नहीं हैं ॥ २४ ॥ पतिको धर्म है स्त्रीसों पुत्र कन्या उपजावै सो
भूमिरूपी स्त्री है तासों और काहू भूपति नहीं उपजायो तासों केवल नामहीके
भूपाल भूपतिकी देह कोऊ नहीं धरे औ तुम भव संसार में भूषणनहूं को
भूषण अर्थ जाते भूषण शोभा पावत हैं अति सुन्दरी ऐसी तनया पुत्री भूतन
पृथ्वीके तन देह ते उपजायो तासों भूपन की देह केवल तुम्हीं धरे हो औ ताहू
पर तुम्हारी कल कहे निर्दोष कीरति विदेहन में गई है कहावत विदेह हौ यासों
या जनायो कि भोग राज्यको करत हौ यश जीवनयुक्त तपस्विनमें गायो है
याते तुमसम कोऊ राजा नहीं हैं ॥ २५ ॥
मू०-जनक--दोहा ॥ इहिंविधिकीचिंतचातुरी, तितको
कहा अकत्थ ॥ लोकनकीरचनारुचिर, रचिबेकोसमरत्थ ॥
( ४८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
॥ २६ ॥ सवैया ॥ लोकनकौरचनारचिबेकोजहींपरिपूरणबु
द्धिविचरी । ह्वैगइकेशवदासतहीसबभूमिअकाशप्रकाशि
तभारी । शुद्धसलाकसमानलसी अतिरोषमईदृगदीठिति-
हारी । होतभयेतब सूरसुधाधर पावकशुभ्रसुधारँगधारी ॥
॥ २७ ॥ दोहा ॥ केशवविश्वामित्रके, रोषमईदृगजानि ॥
संध्यासीतिहुँलोकमें; किहिनिउपासीआनि ॥ २८ ॥ जनक-
दोधकछंद ॥ एसुतकोनकेशोभहिसाजे । सुंदरश्यामलगौ
रविराजे ॥ जानतहौजियसोदरदोऊ । कैकमलाविमला
पतिकोऊ ॥ २९ ॥
टी०-जिनके लोक रचना रचिबेकी सामर्थ्य है तिनको वचन रचना करिबो
कहा है ॥ २६ ॥ परिपूरण बुद्धि कहे निश्चयबुद्धि सों बुद्धि भूमि औ आकाशमें
प्रकाशित भई अर्थ-फैलत भई अथवा भूमिअकाश सहित प्रकाशित भयो प्रगट भई
अर्थ सब विषय हस्तामलकवत् देखि परचो तासमय शुद्ध कहे तीक्ष्ण शलाक बाण
समान तिहारी रोषमयी दृष्टि लसी तासों सूर सूर्य सुधाकर चंद्रमा सरिस भयो औ
अग्नि अमृतके रंगभये अर्थ अति भयसों तेजहीन श्वेतभये “शलाका शल्य
मदन शारिका शल्यकीपुच ॥ छत्रादि काष्ठो शरयोरिति मेदिनी” ॥ २७ ॥
संध्यासम अरुणनेत्र भये तब जैसे तीनों लोकमें सब दोष निवारणार्थ संध्याकी
उपासना करतहैं तैसे रोष निवारणार्थ ब्रह्मादि सब उपासना करतभये अर्थ
सब आधीनह्वै स्तुति करतभये ॥ २८ ॥ दुहुनको सम सौंदर्यादि देखि यह मैं
जीमें जानत हौं कि ए दूनों सहोदर सगे भाई हैं औ कै कोऊ कहे कौनों रूप-
धारी कमलापति विष्णु विमलापति ब्रह्मा हैं आशय यह कि इनमें विष्णु ब्रह्मा-
सम सौंदर्यादि गुण हैं ॥ २९ ॥
मू०-विश्वामित्र ॥ चौ०-सुंदरश्यामलरामसुजानों । गौ
रसुलक्ष्मणनामबखानों ॥ आशिषदेहुइन्हेंसबकोऊ । सूरज
केकुलमंडनदोऊ ॥ ३० ॥ दोहा ॥ नृपमणिदशरथनृपति
के, प्रगटेचारिकुमार ॥ रामभरतलक्ष्मणललित, अरु शत्रु
घ्नउदार ॥ ३१ ॥ घनाक्षरी ॥ दानिनकेशीलपरदानकेप्र
हारी दीनदानवारिज्योनिदानदेखियेसुभायके ॥ दीपदीपहू-
केअवनीपनकेअवनीपपृथुसमकेशोदासदासद्विजगायके ।
आनँदकेकंदसुरपालकसेबालकयेपरदारप्रियसाधुमनवचका-
यके । देहधर्मधारीपैविदेहराजजूसेजराजराजतकुमारऐसेदश-
रथरायके ॥ ३२ ॥
टीका-॥ ३० ॥ ३१ ॥ यामें विरोधाभास है दानी जे हरिश्चंद्रादि राजाहैं
तिनके ऐसे शील सुभाव हैं जिनके अपर जे शत्रु हैं तिनसों दान दंडके प्रहारों
लेवैया हैं औ दिन प्रति दान वारि विष्णुके जैसे सुभाय हैं ऐसे सुभायनके निदान
कहे आदिकारण हैं अर्थ विष्णुके ऐसे शौर्यादि सुभायनको प्रगट करत हैं औ
दीपक हैं प्रकाश कहें दीपकहू के अर्थ अति कांति युक्त हैं औ अवनीपनके
अवनीप राजा हैं अथवा दीप दीपके अवनीपन के अवनीप राजा हैं अर्थ सातों
डीपनके राजनके राजा हैं औ राजा पृथुके समान हैं औ गो ब्राह्मणके दासहैं तौ
एते बडे राजाको अतिदीन गो ब्राह्मणकी सेवा विरोध है अविरोध यह गो
ब्राह्मणकी सेवा क्षत्रीको उचित है परदार लक्ष्मी अथवा पृथी विदेह राजकाम
अथवा जन वा राजाजनकको संबोधन है दानवारि सम सुभाव कहि औ लक्ष्मी
प्रियकहि जनकको जनायो कि ये विष्णु अवतार हैं अथवा ऐसे जे दशरथ-
राय हैं तिनके ए कुमार राजत हैं सुरपाल कैसे हैं बालकही ने ये दशरथ राय
जिनको वर्णन करियत हैं ॥ ३२ ॥
मू०-सोरठा ॥ जबतेंबैठेराज, राजादशरथभूमिमें ।
सुखसोयोसुरराज, तादिनतेसुरलोकमें ॥ ३३ ॥ स्वाग-
ताछंद ॥ राजराजदशरत्थतनैजू । रामचन्द्रभुवचन्द्रबनै
जू॥ त्योंविदेहतुमहूंअरुसीता ॥ ज्योंचकोरतनयाशुभगीता
॥ ३४ ॥ तारकछंद ॥ रघुनाथशरासनचाहतदेख्यो ।
अतिदुष्करराजसमाजनिलेख्यो ॥ जनक ॥ ऋषिहैवहम-
न्दिरमाँझमगाऊं । गहिल्यावहिंहौंजनयूथबुलाऊं ॥ ३५ ॥
पद्धटिकाछन्द ॥ अबलोगकहाकरिबेअपार । ऋषिराजक-
पञ्चम से अष्टम प्रकाश: धनुर्भंग, राम-सीता विवाह एवं अयोध्या प्रवेश
( ५० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
हीयहबारबार ॥ इनराजकुमारहिदेहुजान । सबजानतहैं
बलकेनिधान ॥ ३६ ॥ जनकदंडक ॥ वज्रते
कठोरहै कैलासते विशाल कालदंडते कराल सब काल
कालगावैं । केशवत्रिलोकेकेबिलोकिहारे देवसबछोडचंद्रचू-
ड़एकऔरकोचढावई ॥ पन्नगप्रचंडपतिप्रभुकीपनचपीनपर्व
तारिपर्वतप्रमानमानपावई ॥ विनायकएकहूपैआवैनपिना-
कताहिकोमलकमलपाणिरामकैसेल्यावई ॥ ३७ ॥
टी०-यासों या जनायो कि इंद्रकी सहाय करत हैं ॥ ३३ ॥ राजनके
राजा दशरथके तनय पुत्र श्रीरामचन्द्र जैसे भूतलके चन्द्रमा बने हैं अर्थ
राजनका राजा ऐसो तौ जाको पिता है आपु चन्द्रमा सरिस सबको सुखदहै
औ चांदनी सम यशप्रकाशक है याते बडे भाग्यवान हैं इति भावार्थः ॥
तैसे हे विदेह ! तुमहूं औ सीता हौ अर्थ तुम राजनके राजा हौ औ सीता चकोर
तनया सरिस शुभगीता हैं तौ जाको तुमसो पिता है आपु ऐसे यशको प्राप्त हैं
तैसो सीता हू बडी भाग्यवती हैं इति भावार्थः ॥ औ चकोरी को औ चंद्रहीको
प्रेम उचित है तैसे सीताको औ श्रीरामचन्द्र को है है इति व्यंग्यार्थः ॥ ३४ ॥
॥ ३५ ॥ इनको बलके निधान अर्थ बडे बलवान सब जानत हैं औ विधान
पाठ होइ तौ विधान कहे विधि जहां जा प्रकार चाहिये तहां ता प्रकार बल
करबो ॥ ३६ ॥ या प्रकार जाको सब प्राणी काल कालमें कहे समय समय में
गावत हैं अथवा काल जे यम हैं तिनहूं को काल नाश कर्त्ता चन्द्रचूड महादेव
प्रचण्ड जे पन्नग सर्पनके पति हैं बडे सर्प तिनहुँन के जे प्रभु वासुकी हैं तिन
हींकी पीन कहे मोटी पनच रोदा है अथवा पन्नग प्रचंड पति जे वासुकी ।
तेई प्रभुकी महादेवकी पनच हैं आशय यह और रोदा जाको बल नहीं सा-
सकत औ पर्वतादि इंद्र और जे पर्वतन के प्रभा सदृश हैं दैत्यादि ते जा-
गुरुवाई के मान प्रमानको नहीं पावत औ ए कहे अकेले जो विनायक गणेश
ल्यायो चहैं तौ नहीं आइ सकत ॥ ३७ ॥
मू०-मुनि-दोहा ॥ रामहत्योमारीचज्यहि, अरुताड़का
सुबाहु ॥ लक्ष्मणकोयहधनुषदै, तुमपिनाककोजाहु ॥ ३८ ॥
जनक-त्रिभंगीछन्द ॥ सिगरेनरनायकअसुरविनायकराक्ष-
पंचमप्रकाशः ५. ( ५१ )
सपतिहियहारिगये । काहूनउठायोथलनछुडायोटरचोनटा-
रचोभीतभये ॥ इनराजकुमारनिअतिसुकुमारनिलैआयोहोंपै
जकरे ॥ व्रतभंगहमारोभयोतुम्हारोऋषितपतेजनजानिप-
रे ॥ ३९ ॥ विश्वामित्र-तोमर ॥ सुनिरामचन्द्रकुमार-
धनुआनियेयहिबार ॥ पुनिवेगताहिचढ़ाव ॥ यशलोकलोक
बढ़ाव ॥ ४० ॥
टी०-जनक कोमलपाणि कहेउ ताल ए मारीचादि को वध सुनाइ कठोर
पाणि जनायो ॥ ३८ ॥ असुर बाणासुरादि विनायक गणेश अथवा असुरनमें
विनायक श्रेष्ठबाणासुर औ राक्षस पति रावण पैज कहे धनुष उठाइबेमें
पराक्रम करिबेको लै आये हैं अथवा पैजकहे श्रमको करिकै तुम इन्हें ल्यायै हौ
अथवा पैज प्रतिज्ञा ॥ ३९ ॥ ४० ॥
मु०-दोहा ॥ ऋषिहिदेखिहरषैहियो, रामदेखिकुम्हिलाइ ॥
धनुषदेखिडरपैमहा, चिन्ताचत्तडोलाइ ॥ ४१ ॥ स्वाग
ताछन्द ॥ रामचन्द्रकटिसोंपटुबांध्यो । लीलयैवहरको
धनुसाध्यो ॥ नेकुताहिकरपल्लवसोंछ्वै ॥ फूलमूलाजिमिटूक
करचोद्वै ॥ ४२ ॥ सवैया ॥ उत्तमगाथसनातजबै धनुश्री
रघुनाथजुहाथकैलीनो । निर्गुणतेगुणवंतकियो सुखकेशव
संतअनंतनदीनो । ऐंचोजहींतबहींकियोसंयुत तिच्छकटाक्ष
नराच नवीनो । राजकुमारनिहारिसनेहसोशंभुकोसांचोश-
रासनकीन्हो ॥ ४३ ॥ प्रथमतंकोर झुकिझारिसंसारमदचंड
कोदंडरह्योमांडिनवखंडको । चालिअचलाअचलघालिदि-
गपालबलपालिऋषिराजकेवचनपरचंडको । सोधुदईशको
बोधुजगदीशकोक्रोधउपजाइभृगुनंदबरिबंडको । बांधिवरस्वर्ग
कोसाधिअपवर्गधनुभंगकोशब्दगयोभेदिब्रह्मांडको ॥ ४४ ॥
टी०- ॥ ४१ ॥ कटिसों कहे कटिमेंफूल मूलपोनारी लीलहि सों हरको
धनु साध्यो यहौ पाठ है ॥ ४२ ॥ उत्तम गाथकहे गान जिनको औ सनाथ
विश्वामित्र सहित गुणवन्त रोदायुक्त औ धनुष खैंचत में तिरछी दृष्टि परतिहै
सोई नराच बाण हैं तासों संयुत कियो राजकुमार जे रामचन्द्र हैं ते स्नेह
सहित निहारिकै शंभुको शरासन सांचो “ कीन्हो शरान् अस्यति क्षिपतीति
शरासनः” अर्थ धन्वी शरनूका चलावत है जासों तासों शरासन कहावत है सो
कटाक्षरूपी शरयुक्त करि सत्य कियो ॥ ४३ ॥ धनुभंगको जो शब्द है सो
चण्ड कहे प्रचण्ड जो कोदण्ड धनुष है ताको जो प्रथम टङ्गोर खैंचिबेको शब्द
है ताके साथ ही इति शेषः ॥ यासों प्रथम टंकोरहीके संग धनुषटूटिबो जनायो
झुकि कहे क्रुद्धहै अर्थ क्रूरताको प्राप्तहै कै संसारकोमदझारिकै अर्थ संसार के
सब प्राणिनको कादर करिकै नौहूखंडमें मंडिकहे छाइरह्मौ औ फेरि अचला जो
पृथ्वी है औ अचल पर्वतनको चालि कहे चलाइकै औ दिगपाल इंद्रादिकनके
बलको घालिकै अर्थ विह्वल करिकै औ रामचंद्र धनुष उठाइ हैं यह वचन विश्वा-
मित्रको जनक प्रति रह्यो ताको पालिकै औ ईश महादेवको सोधु कहे खोज
संदेश इति दैके औ क्षीरसागरमें सोवत जे जगदीश विष्णु हैं तिन्हें बोधि कहे
जगाइ कै औ भृगुनंदन परशुराम के क्रोध उपजाय कै औ स्वर्गको बांधि कै
कहैं स्वर्ग भरेमां व्याप्त ह्वैकै औ बाँधि पाठ होइ तौ स्वर्ग को बाधा करिकै अर्थ-
की वेधि कै अथवा स्वर्ग के प्राणिनको विह्वल करिकै या प्रकार ब्रह्मांड को
वेधिकै मुक्तिको साधि साधन करिकै गयो अर्थ ब्रह्मांड फोरि विष्णुलोक को
प्राप्त भयो ऐसो उच्च शब्दभयो इति भावार्थः ॥ औ रामचन्द्र के करस्पर्श सों
याही विधि सबको मुक्ति मिलति है इति व्यंग्यार्थः ॥ ४४ ॥
मू०-जनक-दोहा ॥ सतानंदआनंदमति, तुमजोहुतेउन
साथ ॥ बरज्योकाहूनधनुषजब, तोरयोश्रीरघुनाथ ॥४५॥
सतानंद-तोमर ॥ सुनुराजराजविदेह । जबहौंगयोवहिगेह ॥
कछुमैनजानीबात । कबतोरियोधनुतात ॥ ४६ ॥ दोहा ॥
सीताजूरघुनाथको, अमलकमलकीमाल ॥ पहिराईजनुसब-
नकी, हृदयावलिभूपाल ॥ ४७ ॥
टी०-॥ ४५ ॥ ४६ ॥ सीतामें सब भूपालनके हृदय लगे रहें तिनकूं
वेधि माल बनाइ मानौं रामचन्द्र को पहिरायो हृदयको कमल सदृश वर्णन
तासों ॥ ४७ ॥
षष्ठप्रकाशः ६. ( ५३ )
मू०-चित्रपदाछंद ॥ सीयजहींपहिराई । रामहिमाल
सुहाई ॥ दुंदुभिदेवबजाये । फूलतहींबरसाये ॥ ४८ ॥
इति श्रीमत्सकलोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकाया-
मिन्द्रजिद्विरचितायांधनुर्भंगवर्णनंनामपंचमःप्रकाशः ॥ ५ ॥
टी०-॥ ४८ ॥ इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजान-
कीप्रसादनिर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकाया पचमःप्रकाशः ॥ ५ ॥
मू०-दोहा ॥ छठैप्रकाशकथारुचिर, दशरथआगमजा
नि ॥ लगनोत्सवश्रीरामको, व्याहविधानबखानि ॥ १ ॥
सतानंद-तोटकछंद ॥ विनतीऋषिराजकिचित्तधरौ । चहुँ
भयनकेअबव्याहकरौ ॥ अबबोलहुबेगिबरातसबै । दुहिता
समदौसुखपाइअबै ॥ २ ॥ दोहा ॥ पठईतबहींलगनलिखि-
अवधपुरिसबबात ॥ राजादशरथसुनतहीं, चाह्योचलीबरा-
त ॥ ३ ॥ मोटक-छंद ॥ आयेदशरथबरातसजे । दिगपा-
लगयंदनिदेखिलजे ॥ चारयोंदलदूलहचारुबने । मोहेसुरऔ-
रनिकोनगनै ॥ ४ ॥
टी०-॥ १ ॥ दशरथ की प्रभुता सुनि औ रामचन्द्रको पराक्रम देखि जनक
चारों एतनके व्याह करिवेको विश्वामित्रसों विनती कीन्ही सो सतानंद विश्वा-
मित्रको समुझावत हैं कि, हे ऋषिराज ! जनककी विनती चित्तमें धरौ समदौ ।
विवाहौ ॥ २ ॥ राजा दशरथके लगनपत्री सुनतही चारोंबरातें चलीं अर्थ चारोँ
बरातें साजि राजादशरथ व्याहिबेको चले ॥ ३ ॥ ४ ॥
मू०-तारकछंद ॥ बनिचारिबरातचहूँदिशिआई । नृप
चारिचमूअगवानपठाई ॥ जनुसागरकोसरितापगुधारी ।
तिनकेमिलिबेकहँबाहँपसारी ॥ ५ ॥ दोहा ॥ बारोठेकोचा-
र्करि, कहिकेशवअनुरूप । द्विजदूलहपहिराइयो, पहिराये
सबभूप ॥ ६॥ त्रिभंगीछंद ॥ दशरथसंघातीसकलबरा-
तीबनिबनिमंडपमाहँगये । आकाशविलासीप्रभाप्रकाशी ज-
लजगुच्छजनुनखतनये ॥ अतिसुंदरनारीसबसुखकारीमंगल
गारीदेनलगीं । बाजेबहुबाजतजनुघनगाजतजहांतहांशुभ
शोभजगीं ॥ ७ ॥ दोहा ॥ रामचन्द्रसीतासहित, शोभतहैं
त्यहिंठौर । सुवरणमयमणिमयखचित, शुभसुंदरशिर
मौर ॥ ८ ॥
टीका-एकही दिशासों चारों बरातें आवतीं तौ एक एक बरातकी अगवानी-
में बेर होती व्याहकी लगन टरिजाती तासों एकही बार अगवानी होबेके लिये
चारों बरातें चारों दिशाह्वै आईं सागर सरिस राजा जनक हैं सरिता सरिस चारों
बरातें हैं बाहै सरिस अगवानी की चारोंचमू हैं ॥ ५ ॥ बारोठे को चारकहे द्वार-
पूजा अनुरूप यथोचित पहिराइयो पदते भूषण वस्त्र पहिराइयो जानौं ॥ ६ ॥
बारोठेको चारकरि जनवासमंदिरको गये इति कथाशेषः जनवास मंदिर ते भां-
वरि करिबेके लिये मंडपकहे माँडवमें गये सो मंडप कैसो है आकाश विलासी
कहे आकाश को ऐसो है विलास कौतुक जाको अर्थ अति दीर्घ अति उच्च है औ
आकाश में नक्षत्र हैं इहां झालरन में लगे प्रभा प्रकाशी कहे अति शोभायुक्त
जे जलजमोतिनके गुच्छ हैं तेई नये नवीन नक्षत्र हैं ॥ ७ ॥ खचित कहे
चित्रित ॥ ८ ॥
मू०-षट्पद ॥ बैठेमागधसूतविविधविद्याधरचारण ।
केशवदासप्रसिद्धसिद्धशुभअशुभनिवारण ॥ भरद्वाजजाबा-
लिअत्रिगौतमकश्यपमुनि । विश्वामित्रपवित्रचित्रमतिवामदेव
पुनि ॥ सबभांतिप्रतिष्ठितनिष्ठमतितहँवाशिष्ठपूजतकलश ।
शुभसतानंदमिलिउच्चरतशाखोच्चारस बैसरस ॥ ९ ॥ अनु-
कूलछंद ॥ पावकपूज्योसमिधसुधारी । आहुतिदीनीसबसु
खकारी ॥ दैतबकन्याबहुधनदीन्हों । भाँवरिपारिजगतयश
लीन्हों ॥ १० ॥ स्वागताछन्द ॥ राजपुत्रकनिसोंछबिछा-
ये । राजराजसवडेरहिआये ॥ हीरचीरगजबाजिलुटाये ।
सुंदरिन बहुमंगलगाये ॥ ११ ॥ सोरठा ॥ वासरचौथेयाम,
सतानंदआगू दिये ॥ दशरथनृपकेधाम । आयेसकलविदेहब-
नि ॥ १२ ॥ भुजंगप्रयातछंद ॥ कहूँशोभनादुंदुभीदीहबा
जैं । कहूँभीमझंकारकर्नालसाजैं ॥ कहूँसुंदरीवेनुवीनाबजा-
वैं । कहूँकिन्नरीकिन्नरैलैसुगावैं ॥ १३ ॥ कहूंनृत्यकारीनचैं
शोभसाजैं । कहूँभांडबोलैंकहूँमल्लगाजैं ॥ कहूँभाटभाव्यो
करैंमानपावैं । कहूँलोलिनीबेदिनीगीतगावैं ॥ १४ ॥ कहूँ
बैलभैंसाभिरैंभीमभारे । कहूँएणएनीनकेहेतकोरे ॥ कहूँवोक
बाँकेकहूँमेषशूरे । कहूॅमत्तदंतीलरैंलोहपूरे ॥ १५ ॥
टीका-मागध वंशावली वर्णन करैया सूत स्तुति करैया चारण प्रेष्य ए भाट-
की जाति हैं शुभ अशुभ निवारण कहे शुभमें अशुभ के निवारण मेटनहार निष्क-
मति कहे उत्तम मति ॥ ९ ॥ समिध होमकी लकड़ी ॥ १० ॥ ११ ॥ वासर
के चौथे याम कहे तीनि पहर दिनबीतेके उपरांत दशरथ के धामकहे जनवास-
मंदिरमें विदेह कहे जनकके गोत्री ॥ १२ ॥ तीनि छंदको अन्वय एक है राजा
दशरथके फौजमें ऐसो कौतुक देखत भये किन्नरी सारंगी ऐनी हरिणीनसौं हेत
करियत हरिण परस्पर भिरतहैं भिरत पदको अनुषंग एतहू मे है मेष भेडा लोह पूरे
जंजीरहू कौ पहिरे अथवा वीरतासों युक्त ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥
मू०-दोहा ॥ आगेह्वैदशरथलियो, भूपतिआवतदेखि ॥
राजराजमिलिबैठियो, ब्रह्मब्रह्मऋषिलेखि ॥ १६ ॥ सता-
नंद-शोभनाछंद ॥ मुनिभरद्वाजवशिष्ठअरुजाबालिविश्वामि-
त्र । सबैहौतुमब्रह्मऋषिसंसारशुद्धचरित्र ॥ कीन्होंजोतुमया
वंशपैकहिएकअंशनजाइ । स्वादकहिबेकोसमर्थनगूँगज्योंगु
रखाइ ॥ १७ ॥ अन्यच्च-सुखदाछंद ॥ ज्योंअतिप्यासोपा-
वैमगमेंगंगजुलु ॥ प्यासनएकबुझाईबुझैनैतापबलु ॥ त्यों
( ५६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
तुमतेहमकोनभयोअबएकसुख ॥ पूजैंमनकेकामजोदेख्यो
राममुख ॥ १८ ॥
टी०-राजर्षि दशरथादि राजर्षि जनकादिकन सों मिलिकै बैठे ब्रह्मर्षि वशिष्ठादि
ब्रह्मर्षि सतानन्दादिकन सों मिलिकै बैठे ऋषिपद् की अनुषंगराजपद हम
हैं ॥ १६ ॥ संसार में शुद्ध है चरित्र जिनको अथवा संसारको शुद्ध कर्त्ता है
चरित्र जिनको अर्थ जिनके चरित्र कहि सुनि संसारके प्राणी शुद्ध होतेहैं ॥ १७॥
जैसे मगमें अति प्यासो प्राणी जलमात्रको चाहत है औ वह भाग्ययोग ते
गंगाजलपावै तौ बाकी एक प्यासही नहीं बुझाति दैहिक दैविक भौतिक जे तीनों
ताप हैं तिनको बल बुझात है अर्थ त्रयताप दूरिहोत हैं तैसे केवल धनुष चढावै
ताही को व्याह करिये हमारी इतनी प्रतिज्ञा पूर्वक इच्छा रही सो तुमते हमको
केवल व्याह इच्छा पूर्ण रूपही सुख नहीं भयो रामचन्द्रको मुखदेखि रूपबल
विद्या कुलादिके काम अभिलाष पूजे पूर्ण भये ॥ १८ ॥
मू०-जनक-सवैया ॥ सिद्धसमाजसजैंअजहूँनकहूँजगयो
गिनदेखनपाई । रुद्रकेचित्तसमुद्रबसैनितब्रह्महुपैबरणीजोन
जाई॥रूपनरङ्गनरेषविशेषअनादिअनन्तजोवेदनगाई।केशव-
गाधिकेनन्दहमैंवहज्योतिसोमूरतिवंतदेखाई ॥ १९ ॥
अन्यच्च-तारकछंद ॥ जिनकेपुरिषाभुवंगंगाहिल्याये । नगरी
शुभस्वर्गसदेहसिधाये ॥ जिनकेसुतपाहनतेतियकीनी ।
हरकोधनुभंगभ्रमेंपुरतीनी ॥ २० ॥ जिनआपुअदेवअनेक-
सँहारे । सबकालपुरन्दरकेरखवारे ॥ जिनकीमहिमाहिअनंत
नपायो । हमकोबपुरायशवेदनिकायो ॥ २१ ॥ बिनती
करियेजनजोजियलेखो । दुखदेख्योजोकाल्हित्योंआजहु
देखो । यहजानिहियेढिठईमुखभाषी । हमहैंचरणोदकके
अभिलाषी ॥ २२ ॥
टी०-रुद्र महादेव के चित्तरूपी समुद्र में जो बसति है अर्थ जाको महादेव
आराधन करते हैं ॥ १९ ॥ तीनि छंद को अन्वय एक है भगीरथ सगरके सुत_
? In L4: क-ी-न-्-ह-ा-ँ -> looks like कीन्हां or कीन्हों? Wait, look at the matra: it's on the right of ह. There is a vertical bar with a top hook or dot? It's कीन्हीं or कीन्हां? Actually it has an 'ा' and a top mark, could be कीन्हों or कीन्हीं. Wait, L3 has कीन्हों. L4 has कीन्हीं - wait, भंग कीन्हीं जा -> धनुष भंग कीन्हीं or कीन्हों? In Braj, often 'कीन्हीं' or 'कीन्हों'. Let's look at the character: क-ी-न-्-ह-ा-ँ -> कीन्हां or कीन्हीं. It really looks like कीन्हीं).
धनुषको तीनों लोक के प्राणिन उठायो ना उठ्यो तब भ्रमें कहे संदेहको प्राप्त भये
अथवा ऐसी अवस्था में ऐसो धनुष तोर्यो यासों तीनहूं लोक भ्रमें औ आपु कैसे
हैं कि जिन अनेक अदेव दैत्यनको मार्यो है औ मदापुरन्दर इन्द्रकी रक्षा करतहौं
यासों या जनायो कि ऐसे उद्धत कर्म करिवे को तुम्हारे घरकी परम्परा की रीति है
अनंत
( ५८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
यासों या जनायो कि जो प्रति पुरुष बडो है ताके कुलमें लघुहु होइ तौ बडो
है औ तुमप्रति पुरुषानहूं बड़े हौ औ तुम्हारे दुःख सुखादि जीतिबेकी सामर्थ्य
है तासों तुमसमान कोऊ नहीं है अथवा और कोई अपने कुलमें बडो लघु होत
है अर्थ कोऊ प्राणी बडो भयो कोऊ छोटो भयो औ ई कहे जनक प्रति
पुरुषान बडो सो बडोकहे बड़ेते बडे हैं अर्थ इनके कुलमें क्रमसों एक ते एक
बड़े होत आवत हैं॥ २५॥
मू०-वशिष्ठ-विजयछंद ॥ एकसुखीयहिलोकबिलोकि
यैहैंवहिलोकनिरैपगुधारी । एकइहांदुखदेखतकेशवहोतवहां
सुरलोकविहारी ॥ एकइहांऊउहांअतिदीनसोदेतदुहूं दिशि-
केजनगारी । एकहिभाँतिसदासबलोकनिहैप्रभुतामिथिले-
शतिहारी ॥ २६॥ जाबालि-विजयछंद ॥ ज्योंमणिमय
अतिज्योतिहुतीरवितेकछुऔरमहाछबिछाई । चंद्रहिबंदन
हैंसबकेशवईशतेवंदनताअतिपाई ॥ भागीरथीहुतिपै अ-
तिपावनबावनतेअतिपावनताई । त्योंनिमिवंशबडोईहतो
भइसीयासँयोगबडीयबडाई ॥ २७ ॥ विश्वामित्र--मालिनीछ-
न्द ॥ गुणगणमणिमाला । चित्तचातुर्यशाला ॥ जनकसुखद
गीता । पुत्रिकापाइसीता ॥ अखिलभुवनभर्त्ता । ब्रह्मरुद्रादि
कर्त्ता ॥ थिरचरअभिरामौ । कीयजामातुनामी ॥ २८॥
॥ दोहा ॥ पूजिराजऋषिब्रह्मऋषि, दुंदुभिदीन्हिबजाइ ।
जनककनकमन्दिरगये, गुरुसमेतसुखपाइ ॥ २९॥
टी०-॥ २६॥ ईशमहादेव ॥२७॥जनक संबोधन है गुणगणरूपी जे मणि
मुक्तादिहैं तिनकी माला है अर्थ अनेक गुणनसों युक्त है औ चित्तको जो चातु
चातुरी है ताकी शालादार है अथवा चित्तहै चातुर्य्यको शाला जाको अथ
चित्त की चातुर्य्यसे शाला कहे गुह्यो है औ सुखद है गीतागानजाको अ
जाको गानकरे सुने सबके सुख होत हैं ऐसी सीता नामा पुत्रिकाको पाइ
अथवा ये तीनों लक्ष्मीके विशेषण हैं विशेषण नहीं सो लक्ष्मी जनायो कि ऐ-