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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 269 में से

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पृष्ठ 48

हू । तुममममनतेकहूंनजाहू ॥ ७ ॥ कलहंसछन्द ॥ तहँता-
हिदैबरुकोचलेरघुनाथजू । अतिशूरसुन्दरयोंलसैंऋषिसाथ
जू ॥ जनुसिंहकेसुतदोउसिद्धिश्रीरये । बनजीवदेखतयोंसबै
मिथिलागये ॥ ८ ॥
टीका- ॥ १ ॥ २ ॥ जबधनुषकाहुसों नाउठयो तब सब के जनकादिके
मनमें दुचितई भई कि सीताको व्याह अब ना ह्वै है तादुचितई मेटिबेके
लिये त्रिकालदर्शिनी काहू ऋषिकी स्त्री एक राजकुमार सीताके संग चित्रमें
लिखिकै ल्याई किं सीताको या प्रकारको वरु मिलि है आशय कि जब या
प्रकारको राजकुमार आवै तब शम्भु धनुष चढ़ाइक सीताको व्याहै ॥ ३ ॥
सो हे ऋषि ! जैसो इन रामकुमारको देखियतहै तैसोई वरु ऋषिकी स्त्री सीताको
लिखिल्याई ॥ ४ ॥ ५ ॥ दुर्गति दुर्दशाको गई कहे प्राप्त भई ॥ ६ ॥ रूरेसुंदर
॥ ७ ॥ अति शूर औ सुंदर दुवौ राम लक्ष्मण ऋषिके साथमें ऐसे शोभित भये
मानो सिद्धि जो तप सिद्धिहै ताकी श्रीशोभा में रमे कहे अनुराग सिंहके सुत पुत्र
हैं सिंहादि बन जीव तपस्विनके वश्य होत हैं यह प्रसिद्ध है औ सिद्ध है श्रीरये
पाठ होइ तौ सिद्ध स्वाभाविक श्रीशोभा सों रये युक्त ॥ ८ ॥
मू०-दोहा ॥ काहूकोनभयोकहूं, ऐसोसगुन न होत । पुर
पैठतश्रीरामके भयोमित्रउदोत ॥ ९ ॥ राम-चौपाई ॥
कछुराजतसूरयअरुनपरे । जनुलक्ष्मणकेअनुरागभरे ॥
चितवतचित्तकुमुदिनीत्रसै । चोरचकोरचितासोलसै ॥१०॥
लक्ष्मण-षटपद् ॥ अरुणगातअतिप्रातपद्मिनीप्राणनाथ
भय । मानहुँकेशवदासकोकनदकोकप्रेममय ॥ परिपूरण
सिंदूरपूरकैधौंमंगलघट । किधौं शक्रकोछत्रमढयोमानिक-
मयूषपट ॥ कैशोणितकलितकपालयह किलकपा-
लिकाकालको । यहललितलालकैधौंलसतदिग्भामिनिके
भालको ॥ ११ ॥
टी०-अति अनुराग करि पुरमें पैठतही लक्ष्मणके सगुनार्थ उदित भये ताही
अनुराग प्रेमसों मानो भरेकहे पूरित हैं अथवा लक्ष्मणको ब्याज करि सगुन