रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
यासों या जनायो कि जो प्रति पुरुष बडो है ताके कुलमें लघुहु होइ तौ बडो
है औ तुमप्रति पुरुषानहूं बड़े हौ औ तुम्हारे दुःख सुखादि जीतिबेकी सामर्थ्य
है तासों तुमसमान कोऊ नहीं है अथवा और कोई अपने कुलमें बडो लघु होत
है अर्थ कोऊ प्राणी बडो भयो कोऊ छोटो भयो औ ई कहे जनक प्रति
पुरुषान बडो सो बडोकहे बड़ेते बडे हैं अर्थ इनके कुलमें क्रमसों एक ते एक
बड़े होत आवत हैं॥ २५॥
मू०-वशिष्ठ-विजयछंद ॥ एकसुखीयहिलोकबिलोकि
यैहैंवहिलोकनिरैपगुधारी । एकइहांदुखदेखतकेशवहोतवहां
सुरलोकविहारी ॥ एकइहांऊउहांअतिदीनसोदेतदुहूं दिशि-
केजनगारी । एकहिभाँतिसदासबलोकनिहैप्रभुतामिथिले-
शतिहारी ॥ २६॥ जाबालि-विजयछंद ॥ ज्योंमणिमय
अतिज्योतिहुतीरवितेकछुऔरमहाछबिछाई । चंद्रहिबंदन
हैंसबकेशवईशतेवंदनताअतिपाई ॥ भागीरथीहुतिपै अ-
तिपावनबावनतेअतिपावनताई । त्योंनिमिवंशबडोईहतो
भइसीयासँयोगबडीयबडाई ॥ २७ ॥ विश्वामित्र--मालिनीछ-
न्द ॥ गुणगणमणिमाला । चित्तचातुर्यशाला ॥ जनकसुखद
गीता । पुत्रिकापाइसीता ॥ अखिलभुवनभर्त्ता । ब्रह्मरुद्रादि
कर्त्ता ॥ थिरचरअभिरामौ । कीयजामातुनामी ॥ २८॥
॥ दोहा ॥ पूजिराजऋषिब्रह्मऋषि, दुंदुभिदीन्हिबजाइ ।
जनककनकमन्दिरगये, गुरुसमेतसुखपाइ ॥ २९॥
टी०-॥ २६॥ ईशमहादेव ॥२७॥जनक संबोधन है गुणगणरूपी जे मणि
मुक्तादिहैं तिनकी माला है अर्थ अनेक गुणनसों युक्त है औ चित्तको जो चातु
चातुरी है ताकी शालादार है अथवा चित्तहै चातुर्य्यको शाला जाको अथ
चित्त की चातुर्य्यसे शाला कहे गुह्यो है औ सुखद है गीतागानजाको अ
जाको गानकरे सुने सबके सुख होत हैं ऐसी सीता नामा पुत्रिकाको पाइ
अथवा ये तीनों लक्ष्मीके विशेषण हैं विशेषण नहीं सो लक्ष्मी जनायो कि ऐ-