रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठप्रकाशः ६. ( ५३ )
मू०-चित्रपदाछंद ॥ सीयजहींपहिराई । रामहिमाल
सुहाई ॥ दुंदुभिदेवबजाये । फूलतहींबरसाये ॥ ४८ ॥
इति श्रीमत्सकलोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकाया-
मिन्द्रजिद्विरचितायांधनुर्भंगवर्णनंनामपंचमःप्रकाशः ॥ ५ ॥
टी०-॥ ४८ ॥ इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजान-
कीप्रसादनिर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकाया पचमःप्रकाशः ॥ ५ ॥
मू०-दोहा ॥ छठैप्रकाशकथारुचिर, दशरथआगमजा
नि ॥ लगनोत्सवश्रीरामको, व्याहविधानबखानि ॥ १ ॥
सतानंद-तोटकछंद ॥ विनतीऋषिराजकिचित्तधरौ । चहुँ
भयनकेअबव्याहकरौ ॥ अबबोलहुबेगिबरातसबै । दुहिता
समदौसुखपाइअबै ॥ २ ॥ दोहा ॥ पठईतबहींलगनलिखि-
अवधपुरिसबबात ॥ राजादशरथसुनतहीं, चाह्योचलीबरा-
त ॥ ३ ॥ मोटक-छंद ॥ आयेदशरथबरातसजे । दिगपा-
लगयंदनिदेखिलजे ॥ चारयोंदलदूलहचारुबने । मोहेसुरऔ-
रनिकोनगनै ॥ ४ ॥
टी०-॥ १ ॥ दशरथ की प्रभुता सुनि औ रामचन्द्रको पराक्रम देखि जनक
चारों एतनके व्याह करिवेको विश्वामित्रसों विनती कीन्ही सो सतानंद विश्वा-
मित्रको समुझावत हैं कि, हे ऋषिराज ! जनककी विनती चित्तमें धरौ समदौ ।
विवाहौ ॥ २ ॥ राजा दशरथके लगनपत्री सुनतही चारोंबरातें चलीं अर्थ चारोँ
बरातें साजि राजादशरथ व्याहिबेको चले ॥ ३ ॥ ४ ॥
मू०-तारकछंद ॥ बनिचारिबरातचहूँदिशिआई । नृप
चारिचमूअगवानपठाई ॥ जनुसागरकोसरितापगुधारी ।
तिनकेमिलिबेकहँबाहँपसारी ॥ ५ ॥ दोहा ॥ बारोठेकोचा-
र्करि, कहिकेशवअनुरूप । द्विजदूलहपहिराइयो, पहिराये