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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 269 में से

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पृष्ठ 46

मू०-मधुभारछंद ॥ तजिकैसुरारि । रिसचित्तमारि ॥ दश
कंठआनि । धनुछुयोपानि ॥ २५ ॥ विमति ॥ तुमबलनि-
धान । धनुअतिपुरान ॥ पीसजहुअंग । नहिंहोहिभंग॥२६॥
सवैया ॥ खंडितमानुभयोसबकोनृपमंडलहारिरह्योजगती
को ॥ व्याकुलबाहुनिराकुलबुद्धिथक्योबलविक्रमलंकपतीको
कोटिउपाय कियेक हिकेशवकेहून छाँडत भूमिरतीको । भूरि
बिभूतिप्रभावसुभावहिज्यॉ न चलैचितयोगयतीको ॥ २७ ॥
पद्धटिका ॥ धनुअतिपुरानलंकेशजानि । यहबातबानसोंक
हीआनि ॥ हौं पलकमाहँ लैहौंचढाइ । कछु तुम्हूँतोदेखोउठाइ ॥२८॥
टी०--सुकहे सोरारि वाग्विवाद अथवा सुरारि । बाणासुर ॥ २५ ॥ २६ ॥
निराकुल शिथिल बलदेह बल विक्रम उपाय विभूति ऐश्वर्य सुवर्ण रत्न गजादि
योग यती योगी ॥ २७ ॥ धनुष मोसों उठन लायक नहीं है यह जानिकै लंके-
शरावण अपनो भ्रमर राखि धनुष छोडि कै बाण सो यह बात कह्यो कि धनुष
अति पुरान है ॥ २८ ॥
मू०--वाण०--दोहा ॥ मेरेगुरुकोधनुषयह, सीतामेरीमाइ ॥
दुहूँभाँति असमंजसै, बाणचलेसुखपाइ ॥ २९ ॥ रावण-तो
टकछन्द ॥ अबसीय लियेबिनहौनटरौं । कहुँ जाहुँ नतौलगि
नेमधरौं ॥ जबलों न सुनौअपनेजनको । अति आरतशब्द
हतेतनको ॥ ३० ॥ ब्राह्मण-मोदकछंद ॥ काहू कहूँ शरआ-
शरमारिय । आरतशब्द आकाशपुकारिय ॥ रावणकेवहका
नपरयोजब ॥ छॉडिस्वयंवरजातभयोतब ॥ ३१ ॥ दोहा ॥
जबजान्योसबकोभयो, सबहीविधिव्रतभंग ॥ धनुषधरचोलै
भवनमें, राजाजनक अनंग ॥ ३२ ॥
इति श्रीमत्सकळलोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रि-
कायामिन्द्रजिद्विरचितायांबाणरावणयोर्वाग्विवादवर्णनं
नामचतुर्थः प्रकाशः ॥ ४ ॥