रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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( ४६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
हनछंद ॥ जनराजवंत जगयोगवंत । तिनकोउदोत । केहि
भाँतिहोत ॥ २२ ॥ श्रीराम-विजय ॥ सबछत्रिनआदिदै
काहूछुईंनछुयेबिजनादिकबातउगै । न घटैनबढैनिशिबासरके
शवलोकनकोतमतेजभगै । भवभूषणभूषितहोतनहींमदमत्त
गजादिमसीनलगै । जलहूंथलहूंपरिपूरणश्रीनमिकेकुलअ
द्भुतज्योतिजगै ॥ २३ ॥
टी०-जब विश्वामित्र जनककी स्तुति करचुके तब जनक अपने मंत्री आदि
सों विश्वामित्रकी बड़ाई करते हैं उत्तमवर्ण ब्राह्मण औ अरुणरंग अर्थ-तप-
स्याकरि क्षत्रिय सों ब्राह्मण भये ॥ २१ ॥ जब विश्वामित्र जनकके राज्य औ
योगकी स्तुति कियो तब संदेह युक्त है लक्ष्मण पूछयो कि, जे जन जगतमें राज्य
औ योग दुवौ साधत हैं ते कैसे उदयको प्राप्त होत हैं काहेते राज्य औ योग
परस्पर कर्म विरुद्ध हैं ॥ २२ ॥ लक्ष्मण पूछयो कि जेजन राजवंत योगवंत हैं
तिनको उद्योत कैसे होत है सो सुनिकै कहिबेकी अद्भुत युक्ति मनमें प्राप्त भई
तासों विश्वामित्र सों प्रथमहीं रामचंद्रही उद्योतके हेतुकहन लगे उद्योत ज्योतिको
होत है तालिये ज्योतिरूप करि कहत हैं कि निमि जे जनकके पुरिखा हैं तिनके
कुलकी जो ज्योतिप्रकाशकी शिखा है सो अद्भुत जगै कहे जगति है दीपित है
है इति अर्थ और दीप ज्योतिके सम नहीं है सो अद्भुतता कहत हैं कि,
दीप ज्योति को और दीप ज्योति छ्वै सकति है अर्थ समता करि सकति
है अर्थ जैसे एक दीपकी ज्योति होति है तैसी सजातीय औरहू दीप की होती
है औ या निमिकुलकी ज्योतिको आदि दै कहे आदिही सों जबसों प्रगट भई
है. अर्थ-जबसों निमिवंश भयो तब सों काहू क्षत्रिन नहीं छुयो अर्थ-समता
कर्यो फेरि कैसी है कि और ज्योति व्यजनादि बातसों डगमगाती है यह ज्योति
व्यजनादि बातसों नहीं उगती आदि पदते चामरादि जानौ अर्थ व्यजनादि
बात भोगादिको सुख जामें लिप्त नहीं हैसकत फेरि कैसी है कि और दीप ज्योति
दिनमें घटतिहै औ यह निशिवासर कहे रात्यौंदिन घटति बढति नहीं है अर्थ-
सबप्राणी जा वंशमें बराबर होत जात हैं तासों घटति नहीं औ पूर्णताको प्राप्त
है तासों बढति नहीं औ और दीप ज्योतिसों थल मात्रहीकौ तम अंधकार दूरि
होत है यासों कनकोत्तम तेज कहे अज्ञानको तेज दूरि होत है अर्थ-जिनके उप-