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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 269 में से

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पृष्ठ 56

( ५० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
हीयहबारबार ॥ इनराजकुमारहिदेहुजान । सबजानतहैं
बलकेनिधान ॥ ३६ ॥ जनकदंडक ॥ वज्रते
कठोरहै कैलासते विशाल कालदंडते कराल सब काल
कालगावैं । केशवत्रिलोकेकेबिलोकिहारे देवसबछोडचंद्रचू-
ड़एकऔरकोचढावई ॥ पन्नगप्रचंडपतिप्रभुकीपनचपीनपर्व
तारिपर्वतप्रमानमानपावई ॥ विनायकएकहूपैआवैनपिना-
कताहिकोमलकमलपाणिरामकैसेल्यावई ॥ ३७ ॥
टी०-यासों या जनायो कि इंद्रकी सहाय करत हैं ॥ ३३ ॥ राजनके
राजा दशरथके तनय पुत्र श्रीरामचन्द्र जैसे भूतलके चन्द्रमा बने हैं अर्थ
राजनका राजा ऐसो तौ जाको पिता है आपु चन्द्रमा सरिस सबको सुखदहै
औ चांदनी सम यशप्रकाशक है याते बडे भाग्यवान हैं इति भावार्थः ॥
तैसे हे विदेह ! तुमहूं औ सीता हौ अर्थ तुम राजनके राजा हौ औ सीता चकोर
तनया सरिस शुभगीता हैं तौ जाको तुमसो पिता है आपु ऐसे यशको प्राप्त हैं
तैसो सीता हू बडी भाग्यवती हैं इति भावार्थः ॥ औ चकोरी को औ चंद्रहीको
प्रेम उचित है तैसे सीताको औ श्रीरामचन्द्र को है है इति व्यंग्यार्थः ॥ ३४ ॥
॥ ३५ ॥ इनको बलके निधान अर्थ बडे बलवान सब जानत हैं औ विधान
पाठ होइ तौ विधान कहे विधि जहां जा प्रकार चाहिये तहां ता प्रकार बल
करबो ॥ ३६ ॥ या प्रकार जाको सब प्राणी काल कालमें कहे समय समय में
गावत हैं अथवा काल जे यम हैं तिनहूं को काल नाश कर्त्ता चन्द्रचूड महादेव
प्रचण्ड जे पन्नग सर्पनके पति हैं बडे सर्प तिनहुँन के जे प्रभु वासुकी हैं तिन
हींकी पीन कहे मोटी पनच रोदा है अथवा पन्नग प्रचंड पति जे वासुकी ।
तेई प्रभुकी महादेवकी पनच हैं आशय यह और रोदा जाको बल नहीं सा-
सकत औ पर्वतादि इंद्र और जे पर्वतन के प्रभा सदृश हैं दैत्यादि ते जा-
गुरुवाई के मान प्रमानको नहीं पावत औ ए कहे अकेले जो विनायक गणेश
ल्यायो चहैं तौ नहीं आइ सकत ॥ ३७ ॥
मू०-मुनि-दोहा ॥ रामहत्योमारीचज्यहि, अरुताड़का
सुबाहु ॥ लक्ष्मणकोयहधनुषदै, तुमपिनाककोजाहु ॥ ३८ ॥
जनक-त्रिभंगीछन्द ॥ सिगरेनरनायकअसुरविनायकराक्ष-