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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 269 में से

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पृष्ठ 55

हारी दीनदानवारिज्योनिदानदेखियेसुभायके ॥ दीपदीपहू-
केअवनीपनकेअवनीपपृथुसमकेशोदासदासद्विजगायके ।
आनँदकेकंदसुरपालकसेबालकयेपरदारप्रियसाधुमनवचका-
यके । देहधर्मधारीपैविदेहराजजूसेजराजराजतकुमारऐसेदश-
रथरायके ॥ ३२ ॥
टीका-॥ ३० ॥ ३१ ॥ यामें विरोधाभास है दानी जे हरिश्चंद्रादि राजाहैं
तिनके ऐसे शील सुभाव हैं जिनके अपर जे शत्रु हैं तिनसों दान दंडके प्रहारों
लेवैया हैं औ दिन प्रति दान वारि विष्णुके जैसे सुभाय हैं ऐसे सुभायनके निदान
कहे आदिकारण हैं अर्थ विष्णुके ऐसे शौर्यादि सुभायनको प्रगट करत हैं औ
दीपक हैं प्रकाश कहें दीपकहू के अर्थ अति कांति युक्त हैं औ अवनीपनके
अवनीप राजा हैं अथवा दीप दीपके अवनीपन के अवनीप राजा हैं अर्थ सातों
डीपनके राजनके राजा हैं औ राजा पृथुके समान हैं औ गो ब्राह्मणके दासहैं तौ
एते बडे राजाको अतिदीन गो ब्राह्मणकी सेवा विरोध है अविरोध यह गो
ब्राह्मणकी सेवा क्षत्रीको उचित है परदार लक्ष्मी अथवा पृथी विदेह राजकाम
अथवा जन वा राजाजनकको संबोधन है दानवारि सम सुभाव कहि औ लक्ष्मी
प्रियकहि जनकको जनायो कि ये विष्णु अवतार हैं अथवा ऐसे जे दशरथ-
राय हैं तिनके ए कुमार राजत हैं सुरपाल कैसे हैं बालकही ने ये दशरथ राय
जिनको वर्णन करियत हैं ॥ ३२ ॥
मू०-सोरठा ॥ जबतेंबैठेराज, राजादशरथभूमिमें ।
सुखसोयोसुरराज, तादिनतेसुरलोकमें ॥ ३३ ॥ स्वाग-
ताछंद ॥ राजराजदशरत्थतनैजू । रामचन्द्रभुवचन्द्रबनै
जू॥ त्योंविदेहतुमहूंअरुसीता ॥ ज्योंचकोरतनयाशुभगीता
॥ ३४ ॥ तारकछंद ॥ रघुनाथशरासनचाहतदेख्यो ।
अतिदुष्करराजसमाजनिलेख्यो ॥ जनक ॥ ऋषिहैवहम-
न्दिरमाँझमगाऊं । गहिल्यावहिंहौंजनयूथबुलाऊं ॥ ३५ ॥
पद्धटिकाछन्द ॥ अबलोगकहाकरिबेअपार । ऋषिराजक-

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक) · पृष्ठ 55, कुल 269 में से · SarvaKosh