रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
तुमतेहमकोनभयोअबएकसुख ॥ पूजैंमनकेकामजोदेख्यो
राममुख ॥ १८ ॥
टी०-राजर्षि दशरथादि राजर्षि जनकादिकन सों मिलिकै बैठे ब्रह्मर्षि वशिष्ठादि
ब्रह्मर्षि सतानन्दादिकन सों मिलिकै बैठे ऋषिपद् की अनुषंगराजपद हम
हैं ॥ १६ ॥ संसार में शुद्ध है चरित्र जिनको अथवा संसारको शुद्ध कर्त्ता है
चरित्र जिनको अर्थ जिनके चरित्र कहि सुनि संसारके प्राणी शुद्ध होतेहैं ॥ १७॥
जैसे मगमें अति प्यासो प्राणी जलमात्रको चाहत है औ वह भाग्ययोग ते
गंगाजलपावै तौ बाकी एक प्यासही नहीं बुझाति दैहिक दैविक भौतिक जे तीनों
ताप हैं तिनको बल बुझात है अर्थ त्रयताप दूरिहोत हैं तैसे केवल धनुष चढावै
ताही को व्याह करिये हमारी इतनी प्रतिज्ञा पूर्वक इच्छा रही सो तुमते हमको
केवल व्याह इच्छा पूर्ण रूपही सुख नहीं भयो रामचन्द्रको मुखदेखि रूपबल
विद्या कुलादिके काम अभिलाष पूजे पूर्ण भये ॥ १८ ॥
मू०-जनक-सवैया ॥ सिद्धसमाजसजैंअजहूँनकहूँजगयो
गिनदेखनपाई । रुद्रकेचित्तसमुद्रबसैनितब्रह्महुपैबरणीजोन
जाई॥रूपनरङ्गनरेषविशेषअनादिअनन्तजोवेदनगाई।केशव-
गाधिकेनन्दहमैंवहज्योतिसोमूरतिवंतदेखाई ॥ १९ ॥
अन्यच्च-तारकछंद ॥ जिनकेपुरिषाभुवंगंगाहिल्याये । नगरी
शुभस्वर्गसदेहसिधाये ॥ जिनकेसुतपाहनतेतियकीनी ।
हरकोधनुभंगभ्रमेंपुरतीनी ॥ २० ॥ जिनआपुअदेवअनेक-
सँहारे । सबकालपुरन्दरकेरखवारे ॥ जिनकीमहिमाहिअनंत
नपायो । हमकोबपुरायशवेदनिकायो ॥ २१ ॥ बिनती
करियेजनजोजियलेखो । दुखदेख्योजोकाल्हित्योंआजहु
देखो । यहजानिहियेढिठईमुखभाषी । हमहैंचरणोदकके
अभिलाषी ॥ २२ ॥
टी०-रुद्र महादेव के चित्तरूपी समुद्र में जो बसति है अर्थ जाको महादेव
आराधन करते हैं ॥ १९ ॥ तीनि छंद को अन्वय एक है भगीरथ सगरके सुत_