रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 51, कुल 269 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोधकछन्द ॥ आइगयेऋपिराजहिंलीने ॥ मुख्यसतानँदवि
प्रप्रवीने । देखिदुवौभयेपांयनिलाने । आशिपशीरषवासुलै
दीने ॥ १९ ॥ विश्वामित्र-सवैया ॥ केशवयेमिथिलाधि
पहैंजगमेंजिनकीरतिबेलिबईहै । दानकृपान विधातनसोंसिग
रीवसुधाजिनहाथलई है । अंगछतासकआठकसोंभवतीनिहु
लोकमैंसिद्धिभई है । वेदत्रयी अरुराजसिरी परिपूरणताशुभ
योगमई है ॥ २० ॥
टी०-घनश्याम रामचन्द्र औ सजलमेघ जैसे सजल मेघन्के आगमनसों
वृक्षकनकी दावाग्नि बुझातीहै औ हरित है जात हैं तैसे धनुष काहूसों ना उठ्यो
अब सीताको ब्याह ना है है ऐसे गाढ समयमें हम कछु सहाय ना कियो यह जासों
कहै ताको आगि जनकादिके पुण्य वृक्षनमें लगीरहै सो रामागमन सों
धनुष उठिबो निश्चय करि बुझानी औ फूलि उठे प्रफुल्लित है उठे हरित है उठे
इति ॥ १८ ॥ मुख्य जे सतानन्द प्रवीने विप्र ऋषि हैं ते राजा जनकको लीन्हें
विश्वामित्रको आगे है लेवेको आइ गये विश्वामित्रको देखि दुवौ सतानन्द औ
जनक पांयनमें लीनभये विश्वामित्र शीश सूंघी आशिष दयो ॥ १९ ॥ विश्वा-
मित्र रामादिसों जनककी बडाई करत हैं वेदत्रयी कहे तीनोंवेद ऋग्वेद, सामवेद
यजुर्वेद, तिनके अंगसों औ राजश्रीके सात अंग सों औ योगके आठ अंग सों
भव जो संसार है तामें तीनिहुँ लोकमें जनककी