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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

केशवदास निहारि । जनु विश्वरूप को अमल आरसी रची
विरंचि विचारि ॥ ४४ ॥ सोरठा ॥ जगयशवन्तविशाल,
राजादशरथकी पुरी ॥ चंद्रसहित सबकाल, भालथली जनु
ईशकी ॥ ४५ ॥
टी०-दिनकहे दिनप्रति ॥ ४३ ॥ बहुत जे अतिउच्च अपार घरहैं बहु पदको
संबंध सर्वत्र है तिनकी जे बनी पगार परिखा हैं छार देवालीति कहूं शिरवंदी
कहतहैं तिनमें लगी अनेक पुर कौतुक देखिवेकों चिंतामणि सदृश नारी स्त्री
ठाढी हैं चिंतामणि सदृश जिनको देखि मनोभिलाष पूरे होत हैं या प्रकारके
स्त्रीभवन हैं औ बहुत घरसत कहे उत्तम जे मख यज्ञहैं तिनके धूपन कहे धुमन
करिकै धूपित अंगनिसों युक्त हैं ते हरिविष्णुके अनुहारि हैं अर्थ श्यामरूप
हैं ऐसे यज्ञशाला हैं औ बहुत घर परम विचित्र कहे अद्भुत चित्रनिसों चित्रित
हैं तिन्हें मानो विरंचि ब्रह्मा विचारि एकाग्र चित्त करिकै विश्वरूप जो संसार
है अथवा विराट्‌रूप ताकी आरसी ऐना बनायो है जैसे ऐनामें बिम्ब सदृश
प्रतिबिम्ब देखि परतहै तैसे संसारमें जो वस्तु हैं सो सब मंदिरनमें चित्रित हैं
ऐसे चित्रशाला हैं पुरीमें पैठि तिन्हें विश्वामित्र निहारि कहे देखत भये ॥ ४४॥
जगमें विशाल सुंदर औ यशवन्त कहें यशयुक्त जो राजा दशरथकी पुरी है सो
सबकाल चन्द्रमा सहित मानो ईश महादेवकी भालथली है चन्द्र सरिस यश है
विशाल दुवौ हैं यासों सदा निष्कलंक यश पुरीको जनायो ॥ ४५ ॥
मृ०-कुंडलिया ॥ पंडितअति सिगरीपुरी, मनहु गिरागु
ति गूढ़ । सिंहनि युत जनु चंडिका, मोहति मूढ अमूढ़ ॥
मोहति मूढ़ अमूढ़, देव सँग दितिसों सोहै । सब शृंगार
सँदेह, मनोरति मन्मथ मोहै ॥ सब शृंगार सदेह सकल
सुख सुखमा मंडित । मनो शची विधिरची विविधि विधि
वरणत पंडित ॥ ४६ ॥
टी०-सिगरी पुरी अति पंडित है अर्थ पुरीके निवासी जनसब पंडित हैं
यासों मानों गति कहे दशा है गूढ जाकी अर्थरूपं पुरी है अपनी दशाको
छपाये मानो गिरा सरस्वतीहैं गिराहूके आसतजन अतिपंडित होतहैं अथवा

( २० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

मनहूँको औ गिराकहें वचननहूँकी गति है गूढजाकी कथ जाकीदशाको अंत-
मन वचन नहीं पावत चंडिकाको सिंहवाहन है औ विकराल रूपदेखि मूढ औ
अमूढके भयसे मोह होत है पुरी पुरुष सिंहन सों युक्त है औ अति विचित्र
शोभा निरखि मूढ अमूढ के आनंदसे मोह होत है अदितिके देवता पुत्र हैं
तासों संगमें देव रहत हैं इहाँ अदिति पदकी अकार को लोपहै भाषाके कविन को
नियम है कहूं अकारादि पदकी अकारको लोपकरि डारत हैं यथा बिहारी
कृतसप्तशतिकायां । “अधिकअँधेरो जगकरै, मिलिमावस रविचंद” अथवा
दिति दैत्यमाता सम है जैसे दितिसों बडेवीर दैत्यभये हैं तैसे अयोध्याहूमं अनेक
वीर उत्पन्न होतहैं रतिमन्मथ कामकी स्त्रीहै तासों मनको मोहति है पुरी शोभा-
सों कामहूको मन मोहति है तासों अति शोभा युक्त जानौ शची इन्द्राणिहूं
राज्यादि सबसुख औ सब सुखमा शोभासों मंडित है औ अनेक विधिसों पंडित
वर्णन करत है ऐसी पूरीहू है अथवा सुखमासों मंडित युक्त सकल जे सुख हैं
तिनसों शची कहे संचित पूँजी भूत मानौ विधातें रच्यो है अर्थ पूर्ण सुख औ
पूर्ण शोभा एकत्र करि ताहीको पुरी बनायो है ॥ ४६ ॥
मू०-काव्यछंद ॥ मूलनहींकोजहांअधोगतिकेशवगाइय ।
होमहुताशनधूमनगरएकैक मलिनाइय ॥ दुर्गतिदुर्गनहीं
जोकुटिलगतिसरितनहीमें । श्रीफलकोअभिलाषप्रगटकवि
कलके जीमें ॥ ४७ ॥ दोहा ॥ अतिचंचलजहँचंचलदलै,
विधवाबनी न नारि ॥ मनमोह्योऋषिराजको, अद्भुतनगर
निहारि ॥ ४८ ॥ सोरठा ॥ नागरनगरअपार, महामोहतम
मित्रसे । तृष्णालताकुठार, लोभसमुद्रअगस्त्यसे ॥ ४९ ॥
दोहा ॥ विश्वामित्रपवित्रमुनि, केशवबुद्धिउदार ॥ देखत
शोभानगरकी, गये राजदरबार ॥ ५० ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचंद्र
चंद्रिकायामिन्द्रजिद्विरचितायांविश्वामित्रस्याऽयो-
ध्यागमनंनामप्रथमःप्रकाशः ॥ १ ॥

द्वितीयप्रकाशः २. ( २१ )
टी०-मूलजर अधोगति नर्क औ नीचेको गति गमन हुताशन अग्नि दुर्गति
नर्क औ दुष्कारि कहेगति जिनमें कुटिलता इति श्री फलद्रव्य औ विल्वफल
कूचनकी उपमा देवेको परिसंख्यालंकार है ॥ ४७ ॥ चलदल पीपर वृक्षवनी
वाटिका सोइ विधवाहै याहूमें परिसंख्या है ॥ ४८ ॥ नागर प्रवीण मित्र सूर्य जो
सदा सब वस्तु पाइवेकी इच्छाहै सो तृष्णा जानो औ जो कछू वस्तु देखि
सुनिकै इच्छा चलै सो लोभ जानो ॥ ४९ ॥ ५० ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां प्रथमः प्रकाशः ॥ १ ॥
मू०-दोहा ॥ या द्वितीय प्रकाशमें, मुनि आगमन प्रकाश ॥
राजासों रचना वचन, राघव चलन विलास ॥ १ ॥
हंस छंद ॥ आवत जात राजके लोग । मूरति धारी मानहुँ
भोग ॥ २ ॥ मालतीछंद ॥ तहँदरबारी । सबसुखकारी ॥
कृतयुग कैसे । जनुजन वैसे ॥ ३ ॥ दोहा ॥ महिष मेष
मृग वृषभ कहुँ, भिरत मल्ल गजराज ॥ लरत कहूँ, पायक
नटत, बहु नर्तक नटराज ॥ ४ ॥ समानिका छंद ॥ देखि
देखिकै सभा । विप्र मोहियो प्रभा ॥ राजमंडली लसै ।
देवलोकको हँसै ॥ ५ ॥ मल्लिकाछंद ॥ देशदेशके नरेश ।
शोभिजैसैबैसुवेश ॥ जानियेनआदिअंत । कौनदासकौन
संत ॥ ६ ॥ दोहा ॥ शोभितबैठे तेहिसभा, सातद्वीपके
भूप ॥ तहँराजादशरथलसै, देवदेव अनुरूप ॥ ७ ॥ देखि
तिन्हैंतबदूरिते, गुदरानो प्रतिहार ॥ आयेविश्वामित्रजू, जनु
दूजोकरतार ॥ ८ ॥ उठिदौरेनृपसुनतहीं, जाइगहेतबपाइ ॥
लै आयेभीतरभवन, ज्यौंसुरगुरुसुरराइ ॥ ९ ॥ सोरठा ॥
सभामध्येबैताल, ताहिसमयसोपढिउठ्यो ॥ केशवबुद्धिवि-
शाल, सुंदरमूरतिभूपसो ॥ १० ॥

( २२ ) राजचन्द्रिका-सटीक ।
टी०-॥ १ ॥ २ ॥ कृतयुग सत्ययुग ॥ ३ ॥ मल्ल बाहु युद्धंकर पायक
पटंवाज नटककहे नाचत हैं नर्तक नृत्यकारी ॥ ४ ॥ ५ ॥ जहाँ सिंहासनमें
राजा दशरथ बैठे हैं सो आदिहै तहाँते जहाँ पर्यंत दरबारी बैठे हैं सो अंत है
सो आदिते अंततक दरबारिनमें कौन दास कहे सेवकहै औ कौन संत कहे स्वामीहै
यह नहीं जानियत अर्थ सब दरबारी राजसाज सँवारे हैं। “सद्भिद्यमाने सत्ये च
प्रशस्तांचितसाधुषु” इत्यभिधानचिंतामणिः ॥ इहाँ अर्चितपदको पर्याय
स्वामीजानो ॥ ६ ॥ देवदेव इंद्र ॥ ७ ॥ गुदरानो जाहिर कियो करतार
ब्रह्मा ॥ ८ ॥ ९ ॥ बेताल भाट ॥ १० ॥
मू०-बैतालाघनाक्षरी ॥ बिधिके समानहैंविमानीकृतरा-
जहंस, विविधविबुधयुतमेरुसो अचलहै । दीपतिदीपतिअ-
तिसातौंदीपदीपियतु, दूसरोदिलीपसोसुदक्षिणाकोबलहै ।
सागरउजागरकीबहुवाहिनीकोपति, छनदानप्रियकियौसूर-
जअमलहै । सबविधिसमरथराजैराजादशरथ भगीरथपथ-
गामीगंगाकैसोजलहै ॥ ११ ॥ दोहा ॥ यद्यपिईंधनजरिगये,
अरिगणकेशवदास ॥ तदपिप्रतापानलनके, पलपल बढ़त
प्रकाश ॥ १२ ॥ तोमरछन्द ॥ बहुभाँतिपूजिसुराई । कर-
जोरिकैपरेपाई ॥ हँसिके कह्योऋषिमित्र । अबबैठराजप-
वित्र ॥ १३ ॥ मुनिसुनिदानमानसहंस । रघुवंशके अवतंस ॥
मनमाँहजोअतिनेहु । यकबातमाँगिदेहु ॥ १४ ॥
टीका-बिमानी कृत कहं वाहनी कृतहैं राजहंस जिन करिकै ब्रह्माको हंस-
वाहन है और राजा विमानीकृत कहे मानरहित कियेहैं राजनकेहंस जीवजिनक-
रिकै अथवा विमानीकृत वाहनीकृतहैं राजनके हंसजीव जिन करिकै अर्थ--शत्रु
भयसों मित्र प्रेम सों मनमें चढ़ाये रहत है विबुध देवता औ पंडित दिलीप की
स्त्रीको सुदक्षिणा नाम रह्यो ताके पातिब्रत को बल रह्यो औ सुष्ठु जो दक्षिणा
दानद्रव्यहै वाहिनी नदी औ चमूक्षण दारा त्रिनहौ हे प्रिय ! जाकी सूरजके अमल-
में अर्थ सूर्यके प्रकाशमें रात्रिको नाश होत है अथवा क्षणनदान कहे जलांजलि

द्वितीयप्रकाशः २. (२३)

दान औ क्षणक्षण प्रतिहैं दानही प्रिय जिनको क्षणक्षण में दानदीवो करत हैं
गंगाजल सगर के सुतन के तारिवेको भागीरथके पीछे पीछे आयौ है औ राजा
कुल पंथ गामी हैं श्लेष धर्मोपमा हैं कोउ परंपरित रूपक कहत हैं ॥ ११॥१२॥
ऋषिनमें मित्र सूर्यसम हैं ॥ १३ ॥ दानरूपी जो मानस मानसर है ताके तुम
हंस हौ अर्थ दानहीं में है विहार जिनको वडेदाता हौ अवतंस कर्ण-
भूषण ॥ १४ ॥
मू०-राजा-अमृतगतिछंद ॥ सुमितमहामुनिसुनिये ।
तनमनधनसबगुनिये ॥ मनमहँहोइसोकहिये । धनिसोजोआ
पुनलहिये ॥ १५ ॥ ऋषिदोधकछंद ॥ रामभयेजवनेवन
माहीं । राक्षसकैरवैरैवहुधाहीं ॥ रामकुमारहमैंनृपदीजै । तौ
परिपूरणयज्ञकरीजै ॥ १६॥ तोटकछंद॥ यहबातसुनीनृपनाथ
जबै । शरसेलगेआखरचित्तसबै ॥ मुखतेकछुबातनजाइक
ही । अपराधविनाऋषिदेहदही ॥ १७ ॥ राजा-अतिकोम
लकैसबबालकता ॥ बहुदुष्करराक्षसघालकता ॥ हमहींच
लिहैक़षिसंगअबै । सजिसैनचलैचतुरंगसबै ॥ १८ ॥ वि-
श्वामित्र-षट्पद ॥ जिनहाथनहठिहरषि हनतहरिणी-
रिपुनन्दनि ॥ तिननकरतसंहारकहाँमदमत्तगयन्दनि॥जिनवे
धतसुखलक्षलक्षनृपकुँवरकुँवरमनि । तिनबाणनिवारहबा
घमारतनहिंसिंहनि । नृपनाथनाथदशरथसुनियअकथक
थायहमानिये । मृगराजराजकुलकलशअबबालकवृद्धन
जानिये ॥ १९ ॥
टीका-जो वस्तु आप लहिये लीजिये सो धन्यहै ॥ १५ ॥ रामपरशुराम ॥
॥ १६ ॥ १७ ॥ हाथी घोडा रथ पियादा चारों सेनाके अंग हैं ॥ १८ ॥
हरिणीके साहचर्यते रिपुपद ते हरिणी रिपु कहे सिंहजानौ जिन हाथन सिंह
हरिणी मारत हैं तिन सों कहा गजनको नहीं मारत अर्थ गजहू मारत है औ
कुँवरन में मणिश्रेष्ठ ऐसे नृपकुँवर जिन बाणनि सुख कहे सहजही लक्ष कहे

( २४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
लाखन लक्ष निशाना बेधत हैं तिनसों वाराह वाघसिंहनहूंको नहीं मारत अर्थ
मारत हैं हे नृपनाथ ! यह कथा अकथ कहे अतर्क मानौ निश्चय इति । अथवा
अकथकहे अद्भुत जो यह कथा है ताकी मानिबेकहे निश्चय मानौ आशय यह
रामचन्द्र राक्षसनको वध करिहैं यामें संदेह ना करौ ॥ १९ ॥
सुंदरीछंद ॥ राजनमें तुमराजबड़ेअति । मैंमुखमाँगों
सोदेहुमहामति ॥ देवसहायकहौंनृपनायक । हैयहकारज
रामहिंलायक ॥ २० ॥ राजा-मैंजोकह्योऋषिदेनसोलीजि
य । काजकरोहठभूलिनकीजिय ॥ प्राणदियेधनजाहिंदि
येसब । केशवरामनजाहिंदियेअब ॥ २१ ॥ ऋषिराजतज्यौं
धनधामतज्यौंसब । नारितजी सुतशोचतज्यौंतब ॥ आपन-
पौजोतज्यौजगवंदहैं । सत्यनएकतज्यौहरिचंदहैं ॥ २२ ॥
टी०-॥ २० ॥ २१ ॥ एकसमय इन्द्र नारदसों हरिश्चन्द्रके सत्यप्रतापादिको
माहात्म्य सुनि इंद्रासन लेबेको भयमानि दुःखितभयेहैं तब ब्रह्मादि देवन इंद्रको
धीरजदैकै हरिश्चंद्रके सत्वभंगकरिवेकेलिये नारदको विश्वामित्रकेपासपठायो
विश्वामित्र नारद मुखसों देवनकी आज्ञासुनि काहूकामरूपी राक्षसको बोलाइ
कह्यो कि तू शूकर रूपह्वै अयोध्या में जाइ राजा हरिश्चंद्र को मृगया मिष
हमारे आश्रम में ल्याउ राक्षस सोकियो विश्वामित्रके आश्रममें राजाको ल्याइ
लुप्त भयो आश्चर्य युक्त ह्वै राजा आश्रम नदी में न्हाइ कपट द्विजरूपधारि
विश्वामित्र को सब पृथिवी औ सर्वस्वदान करचो है फेरि विश्वामित्र कह्यो है
कि शतभार सुवर्ण दक्षिणा देउ तौ सर्वस्वलेउ नाहिं तौ सत्यको छोड़ो तब
काशीमें जाइकै मदना नामस्त्री औ रोहिताश्व नामा पुत्रको देवशर्मा ब्राह्म-
णके हाथ साठिभार सुवर्ण को बेंच्यो है औ चालिस भार सुवर्ण को कालसेन
चांडाल के हाथ अपना बिकाई सौभार सुवर्ण विश्वामित्र को दियो फेरि
चांडालकी आज्ञाते श्मशान घाटपर उचित द्रव्यलेबेको बैठेहैं कछू दिनमें पुष्प
तोरत मैं रोहिताश्व को सर्प काट्यो मरचौ ताको लै मदना बहाइबे को गई
तहाँ चांडालको उचित पंचमुद्रा लैहि कै बहावन दियौहै या प्रकार सुतको
शोच छोड़चौ सत्यपाल्यो यह संक्षेप कथा लिख्यो है विशेष सो हरिश्चंद्रो-
पाख्यान पुराणनमें प्रसिद्ध है ॥ २२ ॥

•मू०-राजवैहवैहसाजवहैपुर । नामवैहवहधामवैहैगुर ॥
झूठेसोंझूठई बांधतहौमन । छोड़तहौनृपसत्यसनातन ॥२३॥
॥ दोहा ॥ जान्योविश्वामित्रके, कोपबढ्योउरआइ । राजा-
दशरथसों कह्यो, वचनवशिष्ट बनाइ ॥ २४ ॥ षटपद ॥
इनहींकेतपतेजयज्ञकीरक्षाकरिहैं । इनहींकेतपतेज सकलरा-
क्षसबलहरिहैं ॥ इनहीकेतपतेजबढिहै तनतूरण । इनहीकेतप
तेज होहिंगेमंगलपूरण । कहिकेशवजैयुतआइहैंइनहीकेतपते-
ज घर । नृपबेगिराम लक्ष्मण दुवौसौंपौविश्वामित्रकर ॥२५॥
टी०-साजछत्र चामर चमू आदि नाम यश गुरु वशिष्ठ झूठे जे पुत्रादि
हैं तिनसों झूठई कहे वृथाहैी मनको बांधतहौ लगावतहौ अथवा
झूठेसां कहे झूठे न सहित है अर्थ पुत्रादि झूठे माया के प्रपंच हैं तिनसों मिलिकै
झूठइ जो झुठाई है तासों मनको बांधत हौ अर्थ की ना बांधौ अथवा झूठेकी सो
कहें झूठेकी तरह जैसे झूठामाणी झूठाइमें मनलगावतहै तैसे तुमहूं लगावतहौ
औ सनातन कहे परंपराको सत्य छोड़त हौ देनकहि अब नहीं देत सो ना
चाहिये ॥ २३ ॥ २४ ॥ तेजप्रताप तूरन जलदी मंगल विवाहादि ॥ २५ ॥
म०-सोरठा ॥ ॥राजाऔरनमित्र, जानहुँ विश्वामित्रसे ॥
जिनकोअमितचरित्र, रामचन्द्रमय मानिये ॥२६॥ दोहा ॥
नृपपैवचनवशिष्ठको, कैसेमेटयोजाइ ॥ सौंप्यो विश्वामित्र
कर, रामचन्द्रअकुलाइ ॥ २७ ॥ पंकजवाटिकाछंद ॥ राम-
चलत नृपके युगलोचन । वारिभरितभये वारिदरोजन ॥
पायनपरिकृषिकेसजिमौनाहिं । केशवउठिगयेभीतरभौनाहिं ॥
॥ २८ ॥ चामरछन्द ॥ वेदमंत्रतंत्रशोधिअस्त्रशस्त्रदैभले ॥
रामचन्द्रलक्ष्मणैसोविप्रक्षिप्रलैचले ॥ लोभक्षोभमोहगर्वका
मकामनाहई । नींदभूखप्यासत्रासवासनासवेगई ॥ २९ ॥
टी०-राक्षसवधमें अमित कहे संपूर्ण जो चरित्र हैं सो राम-चन्द्रमय कहे
रामचन्द्रचरित्र मय रामचन्द्र चरित स्वरूपति जिनको विश्वामित्रहीको चरित्र-

मानौ अर्थ जो राक्षसवधमें वा वेधनादिकृत रामचन्द्र करि हैं सो कृत रामचन्द्र
द्वार है विश्वामित्रही करि हैं आशय यह कि यामें कछू श्रम रामचंद्र को नहीं
है ये केवल तुम्हारे पुत्रको यश दियो चाहत हैं याते इन सम मित्र दूसरो न जानौ
अथवा रामचन्द्रमय कहे रामचन्द्र प्रति समर्पित मानिये अर्थ जो करत है सो
रामचन्द्र को समर्पण करत हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥ वारि जलसों भरित रोचनकों
वारिद मेघ भये अरुण रंग हैं आंशुनकी वर्षा करन लागे ॥ २८ ॥ वेदके मंत्र
औ तन्त्र शास्त्र के मन्त्र शोधि शोधि कै दियो अथवा वेदके मंत्र दिये बलातिबला
विद्या दियो है सो वाल्मीकीयरामायणमें लिख्यौ है औ तंत्रशास्त्रके मंत्रनसों
शोधिकै मंत्रि करिकै अस्त्रशस्त्र दिये क्षिप्र कहे जल्दी तिन विद्यानके प्रभाव सों
लोभादिक वासना दूरि भई यथा । रघुवंशे । “ तौ बलातिबलयोः प्रभावतो
विच्ययोः पथि मुनिप्रदिष्टयोः । मम्लतुर्न मणिकुट्टिमोर्जितो मातृपार्श्वपरिवर्त्ति
नाविव ” ॥ २९॥
मू०-निशिपालिकाछन्द ॥ कामवनरामसबबासतहरुदे-
खियो । नैनसुखदैनमनमैनमलैलेखियो । ईशजहँकाम-
तनु कैअतनुडारियो । छोडिवहयज्ञथलकेशवनिहारियो॥३०॥
दोहा ॥ रामचंद्रलक्ष्मणसहित, तनमन अतिसुखपाइ ॥
देख्यो विश्वामित्रको, परमतपोवनजाइ ॥ ३१ ॥
इंति श्रीमत्सकलो कलोचनचकोरचिन्तामणि-श्रीरामचन्द्रचन्द्रिकाया-
मिंद्रजिद्विरचितायां रामचन्द्रलक्ष्मणयोर्विश्वामित्रतपो वनगमनं
नाम द्वितीयः प्रकाशः ॥ २ ॥
टी०-जा वनमें महादेव कामको जारयो है ताको कामवन नाम है अथवा
कामवन कहे अभिलाषको दाता वनतवनमें रामचन्द्र सब वास कहे ऋषिन के
वास कुटीति औ तरुवृक्ष देख्यो अथवा वासतरु सुगंधयुक्त तरुमैनमय कहे काम
स्वरूपता बनमें ईश महादेव जहाँ जा स्थान में काम को जारयो हैता स्थानको
देखि छोडिकै विश्वामित्र को यज्ञ थल जाइकै देख्यो ॥ ३० ॥ ३१.॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां द्वितीयःप्रकाशः ॥ २ ॥

•मू०-॥ दोहा ॥ कथातृतीयप्रकाशमें, वनवर्णनशु-
भजानि ॥ रक्षणयज्ञमुनीशको, श्रवणस्वयंवरमानि ॥ १ ॥
षट्पद ॥ तरुतालीसतमालतालहिंतालमनोहर । मंजुलबंजु
लतिलककलकुचकुलनारिकेरवर ॥ एलाललितलवंगसंगपुं
गीफलसीहैं । सारीशुककुलकलितचित्तकोकिलअलिमोहैं ॥
शुभराजहंसकलहंसकुलनाचतमत्तमयूरगन । अतिप्रफु-
लितफलितसदारहैकेशवदासविचित्रवन॥२॥सुप्रियाछंद ॥ क
हुँद्विजगणमिलिसुखश्रुतिपढहीं । कहुँहरिहरिहरहररटरटहीं ॥
कहुँमृगपतिमृगशिशुपयपियहीं । कहुँमुनिगणचितवतहरि
हियहीं॥३॥नराचछंद ॥ बिचारमानब्रह्मदेवअर्चमानमानिये ।
अदीयमानदुःखसुखदीयमानजानिये ॥ अदंडमानदीनगर्व
दंडमानभेदवै । अपठ्यमानपापग्रन्थपठ्यमानवेदवै ॥ ४ ॥
टी०-तालीश वृक्ष विशेष हिंताल खजूरिवंजुल अशोक लकुच बडहर ॥ १ ॥
मृगपति पढते सिंहकी स्त्री पुरुष जातिमात्र जानौ अर्थ सिंहिनीन को पय दूध
मृग बालक पियत हैं यासों यां जनायो कि जहाँ सहजहूं बैर नहीं है कृत्रिमकी
कहावत ह औ कहुंतेई मृग शिशु मुनिन के हियको हरिकै मुनिन की ओर चित-
वत हैं यासों मृग बालकन की अति सुन्दरता जानौ ॥ २ ॥ ३ ॥ जहाँ सदा ब्रह्म
जो वेद है सोई विचार्यमान है विचारचो जात है अथवा परब्रह्म देव पढते यहां
विष्णु जानौ अथवा सदेवयासों या जनायो कि सुदेव सेवामें सब रहत हैं कोऊ
कुदेव यक्षिणी आदि की सेवा नहीं करत औ दुःख अदीयमान है कोऊ काहू को
दुःख नेंहा देत सुख दीयमान है दीन अदंडमान है दीन को कोऊ दंड ताडन
नहीं करत औ वै कहे निश्चय करत औ बै कहे निश्चय करि गर्व औ भेददंड-
मान है पाप ग्रंथ मारन मोहनादिके ग्रंथ अपठ्यमान हैं कोऊ नहीं पढत ॥ ४ ॥
मू०-विशेषकछंद ॥ साधुकथाकथियेतहँकेशवदासजहाँ ।
विग्रहकेवलहैमनकोदिनमानतहां ॥ पावनवाससदाऋषिको
सुखकोबरषै । कोबरनैकविताहिविलोक तजीहरषै ॥ ५ ॥

(२८) रामचन्द्रिका-सटीक ।
चंचला ॥ रक्षिवेकोयज्ञकुलबैठेवीर सावधान । होंनलगेहो-
मकेजहांतहांसबैविधान ॥ भीमभाँति ताड़ुकासो भंगलागिक-
र्नआइ । वाननानिरानपै ननारिजानि छाँडिजाइ ॥ ६ ॥
ऋषि-सोरठा ॥ कर्मकरतियहघोर, विप्रनकोदशहूदिशा ।
मत्तसहसगजजोर, नारीजानिनछाँडिये ॥ ७ ॥ राम-शशिव-
दना ॥ सुनुमुनिराई जगसुखदाई । कहिअबसोई । जेहि
यशहोई ॥ ८ ॥ ऋषि-कुंडलिया ॥ सुताविरोचनकीहुतीदी-
रघजिह्वानाम् । सुरनायकहैसंहरीपरमपापिनीवाम ॥ पर-
मपापिनीबाम बहुरिउपजीकविमाता । नारायणसोहतीचक्र
चिंतामणिदाता ॥ नारायणसोहती सकलद्विजदूषणसंयुत ।
त्योंअबत्रिभुवननाथ ताड़कातारुहसहसुत ॥ ९ ॥
टीका-साधु कथा उत्तम कथा विष्णुविषयकीनी आदि अथवा साधु जे संत-
जन हैं नारदादि तिनकी कथा तहाँ तेहि आश्रम में मुनि जनन करि कै कथिये
कथन करियतहैं औ जहाँ केवल मनही को निग्रहहै मनइंद्रिन को राजा है
मनके निग्रहसों सब इन्द्रिनंको निग्रह जानो औ तहां मानदिनहीं के है और
काहूके नाहीं है दिनपक्ष में मानप्रमाण दिन मान कैतो है यह पूछिवे की रीति
लोकमें प्रसिद्ध है अन्यत्र मानगर्व परिसंख्यालंकार है अथवा दिनही को मान
आदर है यज्ञादिसत्कर्म दिनही में होत हैं तासो ॥ ५ ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥
विरोचन बलिके पिताकी सुता दीरघजिह्वानामा पापिनी रही ताको सुरनायक
इंद्र मारचो है औ फेरि अति पापिनी कविजे शुक्र हैं तिनकी माता भई ताको
नारायण मारचो है एक समय देवनके युद्ध में हारिकै दैत्य ब्राह्मणके शरणमें
बचिवो जानिकैं शुक्र माताके शरण जाइ लुकाने तहां शत्रुको रक्षक जानि
इंद्रकी आज्ञा सों विष्णु शुक्र माता को शिर चक्रसे खंडन करि दैत्यनको
मारचो है ताही कोपसों भृगुमुनि जाइ विष्णुके उरमें लात मारचो है औ आपने
पुत्र शुक्र को दैत्यगुरु कियो है यह कथा पुराणनमें प्रसिद्धहैं कैसे हैं नारायण
चिन्तामणि के दाता हैं अथवा चिंतामणि सरिस दातहैं सकल द्विज दूषण
संयुत ताड़ुका को विशेषण है औ सहसुत कहे मारीच सहित यासों या जनायो
इन्द्र विष्णुहूं दुष्टस्त्री वध कियो है ॥ ९ ॥

तृतीयप्रकाशः ३. ( २९ )

•मू०-॥ दोहा ॥ द्विजदोषीनविचारिये, कहापुरुषकह
नारि ॥ रामविरामनकीजिये, वामताडुकातारी ॥ १० ॥
मरहट्टाछंद ॥ यहसुनिगुरुवानीधनुगुनतानीजानीद्विजदुख
दानि । ताडुकासंहारीदारुणभारीनारीअतिबलजानि ॥
· मारीचबिडारयोजलधिउतारयो मारयोसबबलसुबाहु ॥ देव
निगुनपर्य्योंपुष्पनिवर्य्योंहर्ष्योंअतिसुरनाहु ॥ ११ ॥ दोहा ॥
पूरणयज्ञभयोजहीं, जान्योविश्वामित्र ॥ धनुषयज्ञकीशुभ
कथा, लागेसुननविचित्र ॥ १२ ॥
टीका-विराम कहे बेर ॥ १० ॥ ताडुकादि वध मों गुणनकी परीक्षा कियो
कि ये गुण विष्णुही में हैं तासों विष्णु को अवतार भयो अब रावण वध ह्वै है
यह जानि इंद्र हर्षित भये ॥ ११ ॥ १२ ॥
मू०-॥ चंचरीछंद ॥ आयोंतेहिकालब्राह्मणयज्ञको
थलदेखिकै । ताहिपूंछतबोलिकैऋषिभाँतिभाँतिविशेषिकै ॥
संगसुंदररामलक्ष्मणदेखिदेखिसोहर्षई । बैठिकैसोइराज
मंडलवर्णईसुखवर्षई ॥ १३ ॥ ब्राह्मण ॥ शार्दूलविक्रीड़ि-
तछंद ॥ सीताशोभनव्याहउत्सवसभासंभारसंभावना तत्त-
त्कार्यसमग्रव्यग्रमिथिलावासीजनाशोभना ॥ राजाराजपुरो-
हितादिसुहृदोमंत्रीमहामंत्रदानानादेशसमागतानृपगणा पू-
जापराःसर्वदा ॥ १४ ॥
टीका-जनकपुरको ब्राह्मण सीयस्वयंवर के अर्थ काहू राजाको निमंत्रण
लिये जात रह्यो सो यज्ञ को स्थान देखिवे को सुभावही आयो अथवा ऋषिही-
को निमंत्रण ल्यायो है अथवा कोउ साधारण पथिक ब्राह्मणहै ताको निकट
बोलिकहे बोलाइकै विश्वामित्र भाँति भाँति विशेषसों जनकपुरकी कथा पूंछत हैं
सो ब्राह्मण ऋषिकेसंग रामलक्ष्मणको देखि ऋषिकी स्त्रीके वचन सत्य जानि
अब सीताको व्याह है है यह निश्चय करि हर्षित आनंदित होतहैं काहेतै

(३०) रामचन्द्रिका-सटीक ।
पंचमप्रकाशके तृतीयछंदमें ब्राह्मणकहि है कि काहू ऋषिकी स्त्री चित्रमें सीताका
ऐसो कोऊ बरलिखिल्याई जैसो रामचन्द्रको देखियत है ॥ १३ ॥ सीताको
जो शोभन कहे सुंदर ब्याह है ताकी जो उत्सव सभा कहे कौतुक सभा है स्वयंवर
सभा इति । ताके जे अनेक संभार सामग्री हैं अनेक राज सत्कारादि वस्तु तिनकी
जो संभावना विचार है तासों राजा जनक औ राजपुरोहित सतानंद तिन्हें आदि
दै और जे सुहृद मित्र हैं औ महामंत्रके देनहार जे मंत्री हैं औ समग्र कहे
सम्पूर्ण मिथिलावासी जे शोभन कहे सुबुद्धिजनहैं ते सब तत्तत्कार्य कहे अपने
अपने उचित कार्य में व्यग्रकहे आसक्त हैं। संलग्न इति अथवा आकुल हैं
"व्यग्रो व्यासक्त आकुले इति मेदिनी" औ सर्वदापूज्य औ पर कहें उत्कृष्ट ऐसे
नाना देश अनेकदेशके नृपगण समागत कहे आये हैं ॥ १४ ॥
मू०-दोहा ॥ खण्डपरसकोशोभिजै, सभामध्यकोदंड ।
मानहुँशेषअशेषधर, धरनहारबरिबंड ॥ १५ ॥ सवैया ॥ शो
भतिमंचनकीअवलीगजदंतमईछबिउज्ज्वलछाई । ईशमनौ-
वसुधामेंसुधारिसुधाधरमंडलमंडिजोन्हाई । तामहँकेशवदा-
सविराजतराजकुमारसबैसुखदाई । देवनसोंजनुदेवसभाशुभ
सीयस्वयंवरदेखनआई ॥ १६ ॥ दोहा ॥ नवतिमंचपंचालि
का, करसंकलितअपार । नाचतिहैजनुनृपतिकी, चित्तवृ-
त्तिसुकुमार ॥ १७ ॥ सोरठा ॥ सभामध्यगुणग्राम, बंदीसु-
तद्वैशोभहीं ॥ सुमतिविमतियहनाम, राजनकोवर्णनकरैं ॥
॥ १८ ॥ सुमति-दोहा ॥ कोयहनिरखतआपनी, पुलकित
बाहुविशाल ॥ सुरभिस्वयंवरजनुकरो, मुकुलितशाखर-
साल ॥ १९ ॥
टी०-जामें देशांतरनके राजा लोग आय आय बैठत हैं ऐसे स्वयंवर सभामें
चारों ओर मंच कहे मचाननकी अवली पंक्तिबनतिहै ॥ १५ ॥ सोमंचावली
सीयस्वयंवरमें गजदंत हाथी दाँतन की बनी है तामें ब्राह्मण उत्प्रेक्षा करते
१ महादेव.

तृतीयप्रकाशः ३. ( ३१ )
हैं कि, ईश जे विधाता हैं ते मानो जुन्हाई सों मंडिकै युक्त करिकै वसुधा पृथ्वी-
में सुधाधर चंद्रमा को मंडल कहे परिवेष सुधारि कहे सुधारयो बनायो है जोत्स्ना-
युक्त चंद्रपरिवेष सम कहे मंचावली की अति श्वेतता जनायो ईश बनायो सम-
कहे अति रुचिर रचना जनायो औ देव सरिस राजकुमार हैं देवमन्दिरसरिसमंचा-
वलीजानो ॥ १६ ॥ पंचालिका नृत्यकी जातिविशेष है अपार कर कहे हस्तक
भेदोंसों संकलित युक्त ॥ १७ ॥ १८ ॥ सुरभि कहे वसंतरूपी जो स्वंयवर है
त्यहि मानो रसाल आँब की शाखा को मुकुलित बौरयुक्त कर्यो है जैसे
वसंतमें आँबकी शाखा बौरति है तैसे धनुष उठाइवे को मोद करि बाहु रोमा-
ञ्चित भयो अथवा सुरभीरूपी जो है स्वयं कहे अपना त्यहि वर कहे सुंदर रसाल
शाख को मुकुलित किये हैं ॥ १९ ॥
मू०-विमति-सोरठा । ज्यहिंयशपरिमलमत्त, चंचरीक
चारणफिरत ।। दिशिविदिशिनअनुरक्त, सोतौमलिकापीडनृप
॥२०॥ सुमति-दोहा॥ जाकेसुखमुखवासते,वासितहोतदिगंत
सोपुनिकहयहकौन नृप, शोभितशोभअनंत ॥ २१ ॥ विम-
ति-सोरठा ॥ राजराजदिगबाम । भाललाललोभीसदा ॥ अति
प्रसिद्धजगनाम । काश्मीरकोतिलकयह ॥ २२ ॥
टी०-पांचछंदनमें विमतिके पांचप्रश्नोंकोश्लेषसों उत्तरदियो है मल्लिका नामा
जो पर्वत है ताको आपीड कहे शिखा भूषण है अर्थ मल्लिक पर्वतको राजा
है । यथाचपद्मपुराणे । “मल्लिकाख्यो महाशैलो मोक्षदः पश्यतां नृणाम् । यत्रांगे-
षु नृणांतोयं श्यामं वा निर्मलम्भवेत् । पातकस्यापहारीदं मया दृष्टं तु तीर्थकम्”
॥ ४ ॥ औ मल्लिका जो चंबेलीहैं ताको आपीड शिखा भूषण बेनी मालादि
“शिखास्वापीडशेखरौ । इत्यमरः” कैसो है राजा औ मालती माला ज्यहिं के
यशरूपी जो परिमल सुगंध है तासों मत्त चंचरीक भ्रमर सदृश जे चारण
भाट हैं ते दिशि विदिशिन में अनुरक्त संलग्न फिरत हैं अर्थ जाको यश दिशि
विदिशिन में भाट गावत फिरत हैं औ यश अर्थ सदृश जो परिमल . सुगंध है
तामें मत्त चारण सदृश जे चंचरीक भ्रमर हैं ते दिशि विदिशिन में अनुरक्त
फिरत हैं ॥ अर्थ जाके सुगंधमें मत्त ह्वै भ्रमर दिशि विदिशिन में उडत
फिरत हैं ॥ २० ॥ सुख कहे सहज मुख के वास सुगंध ते ॥ २१ ॥

( ३२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
काश्मीर को तिलक कहे काश्मीर देशको राजा औ काश्मीर कहे केशरिको
तिलक कैसोंहै राजा औ तिलकराज जे कुबेर हैं तिनकी दिशा उत्तर दिशारूपी
जो वाम स्त्री है ताके भालको लाल रक्त जो सुमेरु है सो है लोभी सदा ज्यहि
राजाको अर्थ सुमेरु के यह इच्छा रहति है कि इन्द्रको राज छोडि या राजाको
राज हमपर होय यासों या जनायो कि राजा रूपगुण करि इन्द्र हूं सों अधिक
है अथवा यह राज सुमेरु को सदा लोभीहै इन्द्र को जीति सुमेरु पर राज्य करि-
बे की इच्छा राखत है औ राजराज दिग सदृश जे वाम स्त्री हैं राजराज दिक
सदृश कहे या जनायो जैसे द्रव्यरूप लक्ष्मीसों युक्त उत्तर दिशा है तैसे शोभा-
रूप लक्ष्मी सों युक्त स्त्री हैं तिनके भाल को जो लाल रत्न है शोभा है सदा
जातिकको अर्थ जो तिलक लाल हू की शोभा बढावत है तासों तिलकके
निकट रहिबे की भाल लाल के इच्छा रहतिहै आशय यह कि अति भूषणनसों
भूषित औ अति सुंदरीहू स्त्रीनकौ शोभा बढावत है साधारण नहीं है और अर्थ
राजराज कहे राजनको राजा है और दिशारूपी जो वाम स्त्री है ताको भाल को
लाल है औ लोभी है सदा कहे याचकनकी याचकता को याचकन को याचिबो
सर्वदा जाको भावत है अर्थ बडो दाता है सदा पर सो मैं याचकताकी कहत
हैं औ अर्थराजदिग जो उत्तर दिशा है ताके वाम भाग जो पूरव दिशा है ताके
भाल को लाल सूर्य ताको सदा लोभी ऐसा जो काश्मीर देश है ताको राजा है
अति जाडे सों जा देश वासिन के सदा सूर्योदय की इच्छा रहति है ॥ २२ ॥
मूल ॥ सुमति-दोहा ॥ निजप्रतापदिनचरकरत,लोचन
कमलप्रकाश॥ पानखातमुसुकातमृदु, कोयहकेशवदास॥२३॥
टी०-अर्थ यह जाके अंगनमें प्रताप कांतिकी झलक सब लोचन पसारिकै
निहारत हैं ॥ २३ ॥
मूल-बिमति-सोरठा ॥ नृपमाणिक्यसुदेश, दक्षिणतिय
जियभावती । कटितटसुपटसुवेश, कलकाचीशुभमण्डई ॥
॥ २४ ॥ सुमति-दोहा ॥ कुण्डलपरसतमिसकहत, कहौ
कौनयहराज ॥ शंभुशरासनगुनकरो, करनालम्बितआज ॥
॥ २५ ॥ बिमतिसोरठा ॥ जानहिं बुद्धिनिधान, मत्स्यराज
यहिराजको॥समरसमुद्रसमान, जानतसबअवगाहिकै॥२६॥

तृतीयप्रकाशः ३. ( ५३ )

सुमति-दोहा ॥ अंगरागरंजितरुचिर, भूषणभूषितदेह ॥
कहतबिक्षूपकसोंकछू, सोपुनिकोमछनृपयेह ॥ २७ ॥
टी०-नृपमाणिक्य नृपश्रेष्ठ औ उत्तम माणिक्य राजा कैसो है कि सुन्दर हैं
देश द्रविडादि जामें ऐसी जो दक्षिण दिशा रूपी तिय है ताको अति भावत हैं
जा दक्षिण दिशाके कटितट में कहे मध्यभाग में सुन्दरहै पटपद्धति जाको औ
कल कहे दुःख रहित ऐसी जो कांची नामा पुरी है ताको मंडत है भूषित करत
अर्थ कि याके देश में मध्यभाग में विष्णुकांची शिवकांची पुरी हैं तामें जाको
बास है माणिक्य कैसो है कि सुदेश कहे सुंदरी दक्षिण कहे प्रवीण जे तिय स्त्री
हैं तिनको अति भावती है फेरि कैसोहै कि सुष्ठु पट वस्त्र युक्त जो कटितट है
तामें कल कहे अव्यक्त मधुर स्वरयुक्त जो कांची क्षुद्रघण्टिका है ताको मण्डई
कहे भूषित शोभित करै है ॥ २४ ॥ कर्णालंबित करौ कर्ण पर्यंत खैंचौ ॥२५॥
मत्स्य नामा जो देश विशेष है मच्छीबन्दर करि प्रसिद्ध है ताको यह राजा है
औ मत्स्यराज राघव मत्स्य सो जैसे समुद्रको अवगाहि मँझाइकै सब जानन है
ऐसे राजा समररूपी समुद्रको मँझाइ कै सब समर भेदको जानतहै अर्थ कि बडो
शूर है 'मत्स्योमीनेपुमान्भूम्निदेशे' इति मेदिनी ॥२६॥ विदूषक मसखरा, “हास्य
कारी विदूषक इत्यमरः” ॥ २७ ॥
मूल बिमति-सोरठा ॥ चन्दनचित्रतरंग, सिंधुराजयह-
हजानिये ॥ बहुतवाहिनीसंग, मुक्तामालविशालउर ॥ २८॥
दोहा ॥ सिगरेराजसमाजके, कहेगोत्रगुणग्राम ॥ देशसुभा-
वप्रभावअरु, कुलबल विक्रमनाम ॥ २९ ॥ घनाक्षरी ॥
पावकपवनमणिपन्नगपतंगपितृजेते ज्योतिवंतजगज्योति-
षिनगायेहैं । असुरप्रसिद्धसिद्धतीरथसहित सिंधु के-
शवचराचरजेवेदनबतायेहैं । अजरअमर अजअंगीऔ
अनंगीसबबरणिसुनावै ऐसेकोनेगुणपायेहैं । सीताकेस्व-
यंवरकोरूपअवलोकिबेकों भूपनकोरूपधरिबिश्वरूपआये
हैं ॥ ३० ॥ सोरठा ॥ कह्यो विमतिवहटेरि, सकलसभाहिसु
नाइकै ॥ चहूओरकरफेरि, सबहीकोसमुझाइकै ॥ ३१ ॥
३

( ३४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
गीतिकाछंद ॥ कोइआजुराजसमाजमेंबलशंभुकोधनुक-
र्षि है ॥ पुनिश्रवणकेपरिमाणतानिसोचित्तमेंअति हर्षि है ॥
वहराजहोइकरंककेशवदाससोसुखपाइहै । नृपकन्यका यह
तासुके उर पुष्पमालहिनाइहै ॥ ३२ ॥
: टी०-सिंधुराज सिंधुदेश लहावरकोराजा औ समुद्रचन्दनके चित्रकीतरंगहैं
अंगनमें जाके अर्थ चित्रविचित्रचन्दनअंगनमें लाये हैं औ चन्दन वृखनसों चित्र-
विचित्र हैं तरंगजाकी अनेक चन्दन वृक्ष जाकी तरंगन में बहत हैं ॥ वाहिनी
चमू औ नदी मुक्तन की माला पहिरे हैं औ मुक्तनकी माल पंगति समूहेति सो है
उरमें बदनमें जाके ॥ “ सिंधुर्वी मधुदेशाब्धिनदे नासरिति स्त्रियाम् ” ॥इति मेदिनी
॥ २८ ॥ बलअंग बल विक्रम बुद्धिबल ॥ २९ ॥ पन्नग सर्प शेषादि पतंग
पक्षी गरुडादि असुर दैत्य राक्षस बाणासुर रावणादि सिद्धदेवजाति विशेष ।
अथवा तपस्वी अजर कहे जराबुढाई सो रहित देवता अमर हनुमानादि अजब्र-
ह्मादि अंगी अंगधारी अनंगी कामादि विश्वरूप संसारभरके रूपप्राणी ॥३०॥
॥ ३१ कर्षि है उठाई है ॥ ३२ ॥
दोहा ॥ नेकशरासनआसनै, तजैनकेशवदास ॥ उद्यमकै
थाक्योसबै, राजसमाजप्रकास ॥ ३३ ॥ बिमति-सुन्दरी
छंद ॥ शक्तिकरीनहिंभक्तिकरीअब । सोननयोपलशीशन-
येसब ॥ देख्यो मैं राजकुमारनकेवर । चापचढयोनहिंआप
चढेखर॥३४॥विजय॥दिकूपालनकीभुवपालनकीलोकपाल-
नकीचैनमातुगईकिधै । भांडभयेउठि आसनतेकहिकेशव श-
म्भुशरासनकोछ्वै । काहूचढ़ायोनकाहूनवायोनकाहूउ
ठायोनआंगुरद्वै । स्वारथ भोनभयोपरमारथआयेहै वीर-
चले वनिता है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमत्सकललोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्रजिद्विर-
चितायांस्वयंवरसभावर्णननामतृतीयः प्रकाशः ॥ ३ ॥

चतुर्थप्रकाशः ४. ( ३५ )
टी०-जो या धनुषको उठाइ है ताको नृपकन्या ब्याहार्थ पुष्पमाला पहिराइ
है ऐसे विमतिके बचन सुनि सब गजसमाज समूह धनुष उठाईवेमें उद्यम कहे उपा-
यकरत भये परन्तु शरासन नेकु आसनकोहू न छोड़न भया अर्थ रंचकहूं ना उठयो
॥ ३३ ॥ जब धनुष काहूसों न उठयो तब क्रोधयुक्त ह्वै विमति कह्यो धनुष उठा
इबे में राजकुमारन शक्तिबल नहीं कियो धनुष की भक्ति कियो है काहेकी
धनुष बनायो औ बलमात्र सबके शीशनवत भये तौ जाकी जो भक्ति करत
है ताको शीश नवावत प्रनाम करत हैं तासों आप खर गर्दभमें चढे अर्थ-गर्दभमें
चढेप्राणी सब निन्दित भये ॥ ३४ ॥ किनि च्वै गई कहे गर्भ पतन काहे
ना भयो ॥ ३५ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननी जनकजानकी जानकीजानिप्रसादाय जानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्ति प्रकाशिकाया तृतीयः प्रकाशः ॥ ३ ॥
दोहा ॥ कथाचतुर्थप्रकाशमें, बाणासुरसम्बाद ॥ रावणसों
अरुधनुषसों; दशमुखबाणविषाद ॥ १ ॥ सबहीकोसमुझे
उसबन, बलबिक्रमपरिमाण ॥ सभामध्यताहीसमय; आये
रावणबाण ॥ २ ॥ डिल्लाछंद ॥ नरनारिसबै । भयभीत
तबै ॥ अचरिज्जुयहै ॥ सबदेखिकहै ॥ ३ ॥ दोहा ॥ हैरा
कसदशशीशको, दैयतबाहुहजार ॥ कियोसबनिकेचित्त
रस, अद्भुतभयसंसार ॥ ४ ॥ रावण-बिजोहाछंद ॥ शंभु
कोदंडदै राजपुत्रीकितै ॥ टूकद्वैतीनिकै जाहुंलंकाहितै ॥ ५ ॥
विमति-शशिबदनाछंद ॥ दशशिरआवो । धनुषउठावो ॥
कछुबलकीजै । जगयशलजै ॥ ६ ॥ बाण-गीतिका
छंद ॥ दशकंठरेशठछाँड़िदेहठबारबारनबोलिये । अब
आजुराजसमाजमेंबलसाजचित्तनडोलिये॥गिरिराजतेगुरुजा-
नियेसुरराजकोधनुहाथल्रै । सुखपायताहिचढ़ायकैघरजाहि
रे यश साथलै ॥ ७ ॥

( ३६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
टी०-रावण सों बाणासुर को संबाद है ना उठ्यो तासों दशमुख औ
बाणको धनुष सों विषाददुख है ॥ १ ॥ २ ॥ बाण रावण को देखि सब प्राणी
आश्चर्य है शब्द कहत भये ॥ ३ ॥ दशशीशको राक्षस औ हजारबाहुको दैत्य
सबनके चित्तमें अद्भुत औ भयरसको संसार रच्यो अर्थ अतिआश्चर्य औ भयसों
युक्त कियो दशशिरहजारबाहुदेखि अद्भुतरस भयो भयानकरूप देखि भय रस-
भयो ॥ ४ ॥ रावण विमतिसोंकह्यो की शंभु को दंड हमको दे कहे दीजिये
औ राजपुत्री कहां है ताको बतावो धनुष तोरि राजपुत्री लै लंकाहि जाऊं ॥ ५ ॥
॥ ६ ॥ विमति सों कहत ऐसे सबनके गर्व वचन सुनि रोषकरि बाण बोलत
भये राज सभामें बलको साज पराक्रम करु चित्त करिकै नाडोलु अर्थ मनोरथ
ना करु अथवा बलकी साज सों अथवा बल औ साज सैन्यादि सों चित्त ना
डोलावो मनोरथ ना करौ अर्थ इहां तुम्हारो बल ना चलि है सुरराज महादेव-
के गिरिराज ते कैलास ते सुरराज को धनुष गुरू गरु जानो सुरराजपदको संबंध
गिरिराजहू में है ॥ ७ ॥
मू०-मंथनाछंद ॥ बाणीकहीबान । कीन्हीनसौकान ॥
अद्यापि आनीन । रेवन्दिकानीन ॥ ८ ॥ वान-मालतीछंद ॥
जोपैजियजोर । तजौसबशोर ॥ शरासनतोरि । लहौंसुखको
रि ॥ ९ ॥ रावण--दंडक ॥ वज्रकोअखर्वगर्वगंज्योजेहिपर्वतारि
जीत्यौहैसुपर्बसर्वभाजैलेलैअंगना । खंडितअखंडआशुकी
न्हौहैजलेशपाशचन्दनसीचन्द्रिकासोंकीन्हीचंदबंदना ॥
दंडकमैंकीन्होकालकालहूकोमानखंड मानौकोहूकालहीकी
कालखंडखंडना । केशवकोदंडवीशदंडऐसेखंडेअबमेरेभुज
डंडन की बड़ीहै बिडंबना ॥ १० ॥
टी०-अति गर्वसों बाणकी बाणी कानमें ना कह्यो अर्थ ना सुन्यौ फेरि
विमति सों कह्यो कि रे कानीन क्षुद्रवंदि अद्यापि राजपुत्री को ना ल्यायो ॥ ८ ॥
अर्थ राजपुत्री प्राप्तिरूपी सुख शरासन तोरे बिना न पैहै ॥ ९ ॥ जिन भुजडंडन
बज्रको जो अखर्व बडो गर्व है ताको गंज्यौ बिदारबो अर्थ-इंद्रकी रक्षा औ
शत्रुबध करिवे में वज्रके अमोघता को गर्बरह्यो सो इनमें निष्फल भयो पर्वतारि

चतुर्थप्रकाशः ४. ( ३७ )

इन्द्रको इन जीत्यौ तब सर्व सुपर्व देवता अपनी अपनी स्त्रीलै लै भागत भये
फेरि अखंड काहूके खंडिवे योग नहीं ऐसो जो जलेश वरुणको पास फांस है
ताको आशु जल्दी जिनखंड काहू के खंडिवे योग नहीं ऐसो जो जलेश वरुण-
को पास फांस है ताको आशु जल्दी जिन खंडन कियो तोरचो औ जिनकी
वंदना पूजा चन्दनसी चन्द्रिका सों चन्द्र कह्यो अर्थ अति भय मानी चन्द्रमा
जिनको सुखद चांदनी सों सुखदियो युद्ध ना कियो औ कालदण्ड यमराजकी
आयुधताके यमराज रक्षा शत्रुवध करिवेको मानगर्व रह्यो ताको खंडनकियो
औ काल जे यमराज हैं तिन्हीं की खंड खंडना इन ऐसी कियो मानो काल
कहे यमके काल ईश्वर कीन्हों अर्थ जैसे यमको काल निर्भय है यमको खंडन
करत है तैसे कह्यो यासों या जनायो कि मैं इन भुज दंडन सों इन सबको जीत्यौ
है केशवकवि को दंड धनुष विसरचो नारी विडंवना निंदा ॥ १० ॥
मू०--बान--तुरंगमछंद ॥ बहुतबदनजाके ॥ विविधिवचन
ताके ॥ रावण ॥ बहुभुजयुतसोई । सबलकहियसौई ॥
॥ ११ ॥ रावण-दोहा ॥ अतिअसारभुजभारहीं, बलीहोहुगे
बान ॥ ममबाहुनकोजगतमें, सुनिदशकंठविधान ॥ १२ ॥
सवैया ॥ हौं जबहीं जबपूजनजातपितापदपावनपापप्रणासी ।
देखिफिरोंतबहीं तबरावणसातौंसातलकेजेविलासी । लैअ
पनेभुजदंड अखंड करोंछितिमंडलछत्रप्रभासी । जानैकोके-
शवकेतिकबार मैंशेषकेशीशनदीनउसासी ॥ १३ ॥ रावण
कमलछंद ॥ तुमप्रबलजोहुते । भुजबलनिसंयुते । पितहिभु
वल्यावते । जगतयशपावते ॥ १४ ॥ बान--तोमरछंद ॥
पितुआनिएकेहिओक । दियदक्षिणासबलोक॥ यहजानिएँ ब
नदीन । पितुब्रह्मकेरसलीन ॥ १५ ॥
टी०-रावण के वचन में काकोक्ति है ॥ ११ ॥ असार बल रहित ॥१२॥
अखंड संपूर्ण ॥ १३ ॥ १४ ॥ हे रावण ! दीन हमारो पिता ब्रह्म परब्रह्मके
रस स्वादमें लीन है तू यह जानि कहे जानु ॥ १५ ॥

सवैया ॥ कैटभसोंनरकासुरसोंपलमेंमधुसोंमुरसोंज्यहि
मारचो । लोकचतुर्दशरक्षककेशवपूरणवेदपुराणबिचारचो ।
श्रीकमलाकुचकुंकुममंडितपंडितदेवअदेवनिहारचो । सोक
रमांगनकोबलिपै करतारहुनेकरतारपसारचो ॥ १६ ॥
रावण-दोहा ॥ हमैंततुम्हैनहिंबुझिये, बिक्रमबादअखंड ।
अबजोयहकहिदेहिगो, मदनकदनकोदंड ॥ १७ ॥ संयुत-
तछंद ॥ ब्रतबाणरावणकीसुन्यो । शिरराजमंडलमेंधुन्यो ॥
बिमति ॥ जगदीशअबरक्षाकरो । विपरीतबातसबैहरो ॥
॥ १८ ॥ दोहा ॥ रावणबाणमहाबली । जानतसबसंसार ।
जोदोऊधनुकर्षीहैं, ताकोकहाविचार ॥ १९ ॥ बाण-
सवैया । केशवऔरतेऔरभईगतिजानिनजाइकछूकरतारी ।
शूरनकेमिलिबेकहँआयमिल्योदशकंठसदाअविचारी ।
बाढ़िगयोबकवादवृथायहभूलिनभाटसुनावहिंगारी । चापच
ढ़ायेकिकीरतिकोयहराजकरैतेरीराजकुमारी ॥ २० ॥
टी०-जा कर ने कैटभादि बली दैत्यनको मारचो फेरि चौदहौ लोककी रक्षा
करतहैं यों कहि कर कि बडी शक्ति जनायो फेरि श्रीकमलालक्ष्मी के
कुचन में कुंकुम केशरि के मंडित में भूषित करै मो अर्थ मकरिका पत्र बनावै में
पण्डित है यासों या जनायो कि जिन विष्णुके लक्ष्मी स्त्री हैं तासों सबसब
पदार्थ सों पूरण जानौ जामेंती शक्ति है शारद् कर हाथ करता करतार जे ब्रह्मा
हैं तिनहुन के करतार जे विष्णु हैं तिन् बलिपै मांगिबे को पसारचो ऐसे बली
विष्णु बलिपैं भिक्षाही मांगि पायो जीतिकै न पाई तासों विष्णु हूं सों अधिक
बलि औ दाता जानौ इति भावार्थ ॥ १६ ॥ १७ ॥ ब्रत धनुष उठाइबेकी
प्रतिज्ञा ॥ १८ ॥ १९ ॥ विमति के ऐसे विकल वचन सुनि बाण कह्यो कि हे
भाट ! सीताके व्याहिबेको बाणधनुष उठावत है ऐसी जो गारी है ताको
भूलिहू न सुनाउ सीता हमारी माता हैं उनतिसयें दोहा में कह्यो है कि सीता
मेरी माई है ॥ २० ॥