रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वामित्र सहित गुणवन्त रोदायुक्त औ धनुष खैंचत में तिरछी दृष्टि परतिहै
सोई नराच बाण हैं तासों संयुत कियो राजकुमार जे रामचन्द्र हैं ते स्नेह
सहित निहारिकै शंभुको शरासन सांचो “ कीन्हो शरान् अस्यति क्षिपतीति
शरासनः” अर्थ धन्वी शरनूका चलावत है जासों तासों शरासन कहावत है सो
कटाक्षरूपी शरयुक्त करि सत्य कियो ॥ ४३ ॥ धनुभंगको जो शब्द है सो
चण्ड कहे प्रचण्ड जो कोदण्ड धनुष है ताको जो प्रथम टङ्गोर खैंचिबेको शब्द
है ताके साथ ही इति शेषः ॥ यासों प्रथम टंकोरहीके संग धनुषटूटिबो जनायो
झुकि कहे क्रुद्धहै अर्थ क्रूरताको प्राप्तहै कै संसारकोमदझारिकै अर्थ संसार के
सब प्राणिनको कादर करिकै नौहूखंडमें मंडिकहे छाइरह्मौ औ फेरि अचला जो
पृथ्वी है औ अचल पर्वतनको चालि कहे चलाइकै औ दिगपाल इंद्रादिकनके
बलको घालिकै अर्थ विह्वल करिकै औ रामचंद्र धनुष उठाइ हैं यह वचन विश्वा-
मित्रको जनक प्रति रह्यो ताको पालिकै औ ईश महादेवको सोधु कहे खोज
संदेश इति दैके औ क्षीरसागरमें सोवत जे जगदीश विष्णु हैं तिन्हें बोधि कहे
जगाइ कै औ भृगुनंदन परशुराम के क्रोध उपजाय कै औ स्वर्गको बांधि कै
कहैं स्वर्ग भरेमां व्याप्त ह्वैकै औ बाँधि पाठ होइ तौ स्वर्ग को बाधा करिकै अर्थ-
की वेधि कै अथवा स्वर्ग के प्राणिनको विह्वल करिकै या प्रकार ब्रह्मांड को
वेधिकै मुक्तिको साधि साधन करिकै गयो अर्थ ब्रह्मांड फोरि विष्णुलोक को
प्राप्त भयो ऐसो उच्च शब्दभयो इति भावार्थः ॥ औ रामचन्द्र के करस्पर्श सों
याही विधि सबको मुक्ति मिलति है इति व्यंग्यार्थः ॥ ४४ ॥
मू०-जनक-दोहा ॥ सतानंदआनंदमति, तुमजोहुतेउन
साथ ॥ बरज्योकाहूनधनुषजब, तोरयोश्रीरघुनाथ ॥४५॥
सतानंद-तोमर ॥ सुनुराजराजविदेह । जबहौंगयोवहिगेह ॥
कछुमैनजानीबात । कबतोरियोधनुतात ॥ ४६ ॥ दोहा ॥
सीताजूरघुनाथको, अमलकमलकीमाल ॥ पहिराईजनुसब-
नकी, हृदयावलिभूपाल ॥ ४७ ॥
टी०-॥ ४५ ॥ ४६ ॥ सीतामें सब भूपालनके हृदय लगे रहें तिनकूं
वेधि माल बनाइ मानौं रामचन्द्र को पहिरायो हृदयको कमल सदृश वर्णन
तासों ॥ ४७ ॥