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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

पंचमप्रकाशः ५. ( ४३ )

समय उदयसों आपने ऊपर सूर्यको प्रेम जनायो यह कहनूति लोकरीति है
॥ १० ॥ पद्मिनी प्राणनाथ सूर्य अरुण तामें तर्कहैं कोकनद कमलनको
फुलावत हैं कोक चक्रवानको संयोगी करत हैं तासों मानो तिनके प्रेममयीहै
अर्थ तिन प्रति जो प्रेम है सो ऊपर छाइ रह्यो है सिंदूरकी पूर प्रवाह जलेति अर्थ-
सिंदूर मिश्रित जलसों भरचो अथवा परिपूर्ण सिंदूरसों पूर कहे पूरित अर्थ
सिंदूरहीसों भरयो अथवा सिंदूर सों रँग्योकै मंगल विवाहादिको घट पूजन
कलशहै मानिक रत्नकी मयूष किरण तिनको वीन्यो पटवस्त्र औ कोकिलकहै
निश्चयकरि यह कपालिकाकाली पै श्रोणितरुधिर कलितकालको कपालशीश
है अथवा कपालिकाको व कालको श्रोणित कलितकपाल है कालीको
रुधिर मांसभक्षकतासों कालको सर्वभक्षक तासों 'कालो जगद्भक्षकः' इति
प्रमाणात् ॥ ११ ॥
मू०-तोटकछन्द ॥ पसरेकरकुमुदिनिकाजमनो । कि
धौंपद्मिनिकोसुखदेनघनो ॥ जनुऋक्षसबैबहित्रासभगे ।
जियजानिचकोरफंदानठगे ॥ १२ ॥ रामचन्द्र-चंचरीछन्द ॥
व्योममेंमुनिदेखियेअतिलालश्रीमुखसाजहीं । सिंधुमेंबड़वा-
ग्निकीजनुज्वालमालबिराजहीं । पद्मरागनिकोकिधौंदिविविधू-
रिपूरितसोभई । शुरवाजिनकीखुरीअतितिक्षतातिनकी
हई ॥ १३ ॥ विश्वामित्र-सोरठा ॥ चढ्योगगनतरुधाइ,
दिनकर बानरअरुणमुख ॥ कीन्होंझुकिझहराइ, सकलतार
काकुसुमबिन ॥ १४ ॥
टी०-कुमुदिनि कोई के काजकहै गहिबेको कुमुदिनि भयसों संकोचको प्राप्त
होती है तासों ऋक्ष नक्षत्र यहि त्रास कहे फंदाभ्रमके त्रास ॥ १२ ॥ यामें आका-
शमें सूर्यकी लाली छाई रही है ताको वर्णन है मुनि विश्वामित्र को
संबोधन है ॥ १३ ॥ सूर्योदय सो नक्षत्रअस्त भये तामें विश्वामित्रने तर्ककरचो
दिनकर सूर्यरूपी जो अरुणमुख वानरहै सो गगन आकाशरूपी तरुवृक्षमें धाइक
चढयो है सो झुकि कहे रिसायकै झहराइकहे हलाइकै सकल तारका नक्षत्ररूपी
जे कुसुम फूले हैं तिन बिन कीन्ही सकल नक्षत्रास्तभयो तासों झुकि पद
करचो ॥ १४ ॥