रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
तृतीयप्रकाशः ३. ( २९ )
•मू०-॥ दोहा ॥ द्विजदोषीनविचारिये, कहापुरुषकह
नारि ॥ रामविरामनकीजिये, वामताडुकातारी ॥ १० ॥
मरहट्टाछंद ॥ यहसुनिगुरुवानीधनुगुनतानीजानीद्विजदुख
दानि । ताडुकासंहारीदारुणभारीनारीअतिबलजानि ॥
· मारीचबिडारयोजलधिउतारयो मारयोसबबलसुबाहु ॥ देव
निगुनपर्य्योंपुष्पनिवर्य्योंहर्ष्योंअतिसुरनाहु ॥ ११ ॥ दोहा ॥
पूरणयज्ञभयोजहीं, जान्योविश्वामित्र ॥ धनुषयज्ञकीशुभ
कथा, लागेसुननविचित्र ॥ १२ ॥
टीका-विराम कहे बेर ॥ १० ॥ ताडुकादि वध मों गुणनकी परीक्षा कियो
कि ये गुण विष्णुही में हैं तासों विष्णु को अवतार भयो अब रावण वध ह्वै है
यह जानि इंद्र हर्षित भये ॥ ११ ॥ १२ ॥
मू०-॥ चंचरीछंद ॥ आयोंतेहिकालब्राह्मणयज्ञको
थलदेखिकै । ताहिपूंछतबोलिकैऋषिभाँतिभाँतिविशेषिकै ॥
संगसुंदररामलक्ष्मणदेखिदेखिसोहर्षई । बैठिकैसोइराज
मंडलवर्णईसुखवर्षई ॥ १३ ॥ ब्राह्मण ॥ शार्दूलविक्रीड़ि-
तछंद ॥ सीताशोभनव्याहउत्सवसभासंभारसंभावना तत्त-
त्कार्यसमग्रव्यग्रमिथिलावासीजनाशोभना ॥ राजाराजपुरो-
हितादिसुहृदोमंत्रीमहामंत्रदानानादेशसमागतानृपगणा पू-
जापराःसर्वदा ॥ १४ ॥
टीका-जनकपुरको ब्राह्मण सीयस्वयंवर के अर्थ काहू राजाको निमंत्रण
लिये जात रह्यो सो यज्ञ को स्थान देखिवे को सुभावही आयो अथवा ऋषिही-
को निमंत्रण ल्यायो है अथवा कोउ साधारण पथिक ब्राह्मणहै ताको निकट
बोलिकहे बोलाइकै विश्वामित्र भाँति भाँति विशेषसों जनकपुरकी कथा पूंछत हैं
सो ब्राह्मण ऋषिकेसंग रामलक्ष्मणको देखि ऋषिकी स्त्रीके वचन सत्य जानि
अब सीताको व्याह है है यह निश्चय करि हर्षित आनंदित होतहैं काहेतै
(३०) रामचन्द्रिका-सटीक ।
पंचमप्रकाशके तृतीयछंदमें ब्राह्मणकहि है कि काहू ऋषिकी स्त्री चित्रमें सीताका
ऐसो कोऊ बरलिखिल्याई जैसो रामचन्द्रको देखियत है ॥ १३ ॥ सीताको
जो शोभन कहे सुंदर ब्याह है ताकी जो उत्सव सभा कहे कौतुक सभा है स्वयंवर
सभा इति । ताके जे अनेक संभार सामग्री हैं अनेक राज सत्कारादि वस्तु तिनकी
जो संभावना विचार है तासों राजा जनक औ राजपुरोहित सतानंद तिन्हें आदि
दै और जे सुहृद मित्र हैं औ महामंत्रके देनहार जे मंत्री हैं औ समग्र कहे
सम्पूर्ण मिथिलावासी जे शोभन कहे सुबुद्धिजनहैं ते सब तत्तत्कार्य कहे अपने
अपने उचित कार्य में व्यग्रकहे आसक्त हैं। संलग्न इति अथवा आकुल हैं
"व्यग्रो व्यासक्त आकुले इति मेदिनी" औ सर्वदापूज्य औ पर कहें उत्कृष्ट ऐसे
नाना देश अनेकदेशके नृपगण समागत कहे आये हैं ॥ १४ ॥
मू०-दोहा ॥ खण्डपरसकोशोभिजै, सभामध्यकोदंड ।
मानहुँशेषअशेषधर, धरनहारबरिबंड ॥ १५ ॥ सवैया ॥ शो
भतिमंचनकीअवलीगजदंतमईछबिउज्ज्वलछाई । ईशमनौ-
वसुधामेंसुधारिसुधाधरमंडलमंडिजोन्हाई । तामहँकेशवदा-
सविराजतराजकुमारसबैसुखदाई । देवनसोंजनुदेवसभाशुभ
सीयस्वयंवरदेखनआई ॥ १६ ॥ दोहा ॥ नवतिमंचपंचालि
का, करसंकलितअपार । नाचतिहैजनुनृपतिकी, चित्तवृ-
त्तिसुकुमार ॥ १७ ॥ सोरठा ॥ सभामध्यगुणग्राम, बंदीसु-
तद्वैशोभहीं ॥ सुमतिविमतियहनाम, राजनकोवर्णनकरैं ॥
॥ १८ ॥ सुमति-दोहा ॥ कोयहनिरखतआपनी, पुलकित
बाहुविशाल ॥ सुरभिस्वयंवरजनुकरो, मुकुलितशाखर-
साल ॥ १९ ॥
टी०-जामें देशांतरनके राजा लोग आय आय बैठत हैं ऐसे स्वयंवर सभामें
चारों ओर मंच कहे मचाननकी अवली पंक्तिबनतिहै ॥ १५ ॥ सोमंचावली
सीयस्वयंवरमें गजदंत हाथी दाँतन की बनी है तामें ब्राह्मण उत्प्रेक्षा करते
१ महादेव.
तृतीयप्रकाशः ३. ( ३१ )
हैं कि, ईश जे विधाता हैं ते मानो जुन्हाई सों मंडिकै युक्त करिकै वसुधा पृथ्वी-
में सुधाधर चंद्रमा को मंडल कहे परिवेष सुधारि कहे सुधारयो बनायो है जोत्स्ना-
युक्त चंद्रपरिवेष सम कहे मंचावली की अति श्वेतता जनायो ईश बनायो सम-
कहे अति रुचिर रचना जनायो औ देव सरिस राजकुमार हैं देवमन्दिरसरिसमंचा-
वलीजानो ॥ १६ ॥ पंचालिका नृत्यकी जातिविशेष है अपार कर कहे हस्तक
भेदोंसों संकलित युक्त ॥ १७ ॥ १८ ॥ सुरभि कहे वसंतरूपी जो स्वंयवर है
त्यहि मानो रसाल आँब की शाखा को मुकुलित बौरयुक्त कर्यो है जैसे
वसंतमें आँबकी शाखा बौरति है तैसे धनुष उठाइवे को मोद करि बाहु रोमा-
ञ्चित भयो अथवा सुरभीरूपी जो है स्वयं कहे अपना त्यहि वर कहे सुंदर रसाल
शाख को मुकुलित किये हैं ॥ १९ ॥
मू०-विमति-सोरठा । ज्यहिंयशपरिमलमत्त, चंचरीक
चारणफिरत ।। दिशिविदिशिनअनुरक्त, सोतौमलिकापीडनृप
॥२०॥ सुमति-दोहा॥ जाकेसुखमुखवासते,वासितहोतदिगंत
सोपुनिकहयहकौन नृप, शोभितशोभअनंत ॥ २१ ॥ विम-
ति-सोरठा ॥ राजराजदिगबाम । भाललाललोभीसदा ॥ अति
प्रसिद्धजगनाम । काश्मीरकोतिलकयह ॥ २२ ॥
टी०-पांचछंदनमें विमतिके पांचप्रश्नोंकोश्लेषसों उत्तरदियो है मल्लिका नामा
जो पर्वत है ताको आपीड कहे शिखा भूषण है अर्थ मल्लिक पर्वतको राजा
है । यथाचपद्मपुराणे । “मल्लिकाख्यो महाशैलो मोक्षदः पश्यतां नृणाम् । यत्रांगे-
षु नृणांतोयं श्यामं वा निर्मलम्भवेत् । पातकस्यापहारीदं मया दृष्टं तु तीर्थकम्”
॥ ४ ॥ औ मल्लिका जो चंबेलीहैं ताको आपीड शिखा भूषण बेनी मालादि
“शिखास्वापीडशेखरौ । इत्यमरः” कैसो है राजा औ मालती माला ज्यहिं के
यशरूपी जो परिमल सुगंध है तासों मत्त चंचरीक भ्रमर सदृश जे चारण
भाट हैं ते दिशि विदिशिन में अनुरक्त संलग्न फिरत हैं अर्थ जाको यश दिशि
विदिशिन में भाट गावत फिरत हैं औ यश अर्थ सदृश जो परिमल . सुगंध है
तामें मत्त चारण सदृश जे चंचरीक भ्रमर हैं ते दिशि विदिशिन में अनुरक्त
फिरत हैं ॥ अर्थ जाके सुगंधमें मत्त ह्वै भ्रमर दिशि विदिशिन में उडत
फिरत हैं ॥ २० ॥ सुख कहे सहज मुख के वास सुगंध ते ॥ २१ ॥
( ३२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
काश्मीर को तिलक कहे काश्मीर देशको राजा औ काश्मीर कहे केशरिको
तिलक कैसोंहै राजा औ तिलकराज जे कुबेर हैं तिनकी दिशा उत्तर दिशारूपी
जो वाम स्त्री है ताके भालको लाल रक्त जो सुमेरु है सो है लोभी सदा ज्यहि
राजाको अर्थ सुमेरु के यह इच्छा रहति है कि इन्द्रको राज छोडि या राजाको
राज हमपर होय यासों या जनायो कि राजा रूपगुण करि इन्द्र हूं सों अधिक
है अथवा यह राज सुमेरु को सदा लोभीहै इन्द्र को जीति सुमेरु पर राज्य करि-
बे की इच्छा राखत है औ राजराज दिग सदृश जे वाम स्त्री हैं राजराज दिक
सदृश कहे या जनायो जैसे द्रव्यरूप लक्ष्मीसों युक्त उत्तर दिशा है तैसे शोभा-
रूप लक्ष्मी सों युक्त स्त्री हैं तिनके भाल को जो लाल रत्न है शोभा है सदा
जातिकको अर्थ जो तिलक लाल हू की शोभा बढावत है तासों तिलकके
निकट रहिबे की भाल लाल के इच्छा रहतिहै आशय यह कि अति भूषणनसों
भूषित औ अति सुंदरीहू स्त्रीनकौ शोभा बढावत है साधारण नहीं है और अर्थ
राजराज कहे राजनको राजा है और दिशारूपी जो वाम स्त्री है ताको भाल को
लाल है औ लोभी है सदा कहे याचकनकी याचकता को याचकन को याचिबो
सर्वदा जाको भावत है अर्थ बडो दाता है सदा पर सो मैं याचकताकी कहत
हैं औ अर्थराजदिग जो उत्तर दिशा है ताके वाम भाग जो पूरव दिशा है ताके
भाल को लाल सूर्य ताको सदा लोभी ऐसा जो काश्मीर देश है ताको राजा है
अति जाडे सों जा देश वासिन के सदा सूर्योदय की इच्छा रहति है ॥ २२ ॥
मूल ॥ सुमति-दोहा ॥ निजप्रतापदिनचरकरत,लोचन
कमलप्रकाश॥ पानखातमुसुकातमृदु, कोयहकेशवदास॥२३॥
टी०-अर्थ यह जाके अंगनमें प्रताप कांतिकी झलक सब लोचन पसारिकै
निहारत हैं ॥ २३ ॥
मूल-बिमति-सोरठा ॥ नृपमाणिक्यसुदेश, दक्षिणतिय
जियभावती । कटितटसुपटसुवेश, कलकाचीशुभमण्डई ॥
॥ २४ ॥ सुमति-दोहा ॥ कुण्डलपरसतमिसकहत, कहौ
कौनयहराज ॥ शंभुशरासनगुनकरो, करनालम्बितआज ॥
॥ २५ ॥ बिमतिसोरठा ॥ जानहिं बुद्धिनिधान, मत्स्यराज
यहिराजको॥समरसमुद्रसमान, जानतसबअवगाहिकै॥२६॥
तृतीयप्रकाशः ३. ( ५३ )
सुमति-दोहा ॥ अंगरागरंजितरुचिर, भूषणभूषितदेह ॥
कहतबिक्षूपकसोंकछू, सोपुनिकोमछनृपयेह ॥ २७ ॥
टी०-नृपमाणिक्य नृपश्रेष्ठ औ उत्तम माणिक्य राजा कैसो है कि सुन्दर हैं
देश द्रविडादि जामें ऐसी जो दक्षिण दिशा रूपी तिय है ताको अति भावत हैं
जा दक्षिण दिशाके कटितट में कहे मध्यभाग में सुन्दरहै पटपद्धति जाको औ
कल कहे दुःख रहित ऐसी जो कांची नामा पुरी है ताको मंडत है भूषित करत
अर्थ कि याके देश में मध्यभाग में विष्णुकांची शिवकांची पुरी हैं तामें जाको
बास है माणिक्य कैसो है कि सुदेश कहे सुंदरी दक्षिण कहे प्रवीण जे तिय स्त्री
हैं तिनको अति भावती है फेरि कैसोहै कि सुष्ठु पट वस्त्र युक्त जो कटितट है
तामें कल कहे अव्यक्त मधुर स्वरयुक्त जो कांची क्षुद्रघण्टिका है ताको मण्डई
कहे भूषित शोभित करै है ॥ २४ ॥ कर्णालंबित करौ कर्ण पर्यंत खैंचौ ॥२५॥
मत्स्य नामा जो देश विशेष है मच्छीबन्दर करि प्रसिद्ध है ताको यह राजा है
औ मत्स्यराज राघव मत्स्य सो जैसे समुद्रको अवगाहि मँझाइकै सब जानन है
ऐसे राजा समररूपी समुद्रको मँझाइ कै सब समर भेदको जानतहै अर्थ कि बडो
शूर है 'मत्स्योमीनेपुमान्भूम्निदेशे' इति मेदिनी ॥२६॥ विदूषक मसखरा, “हास्य
कारी विदूषक इत्यमरः” ॥ २७ ॥
मूल बिमति-सोरठा ॥ चन्दनचित्रतरंग, सिंधुराजयह-
हजानिये ॥ बहुतवाहिनीसंग, मुक्तामालविशालउर ॥ २८॥
दोहा ॥ सिगरेराजसमाजके, कहेगोत्रगुणग्राम ॥ देशसुभा-
वप्रभावअरु, कुलबल विक्रमनाम ॥ २९ ॥ घनाक्षरी ॥
पावकपवनमणिपन्नगपतंगपितृजेते ज्योतिवंतजगज्योति-
षिनगायेहैं । असुरप्रसिद्धसिद्धतीरथसहित सिंधु के-
शवचराचरजेवेदनबतायेहैं । अजरअमर अजअंगीऔ
अनंगीसबबरणिसुनावै ऐसेकोनेगुणपायेहैं । सीताकेस्व-
यंवरकोरूपअवलोकिबेकों भूपनकोरूपधरिबिश्वरूपआये
हैं ॥ ३० ॥ सोरठा ॥ कह्यो विमतिवहटेरि, सकलसभाहिसु
नाइकै ॥ चहूओरकरफेरि, सबहीकोसमुझाइकै ॥ ३१ ॥
३
( ३४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
गीतिकाछंद ॥ कोइआजुराजसमाजमेंबलशंभुकोधनुक-
र्षि है ॥ पुनिश्रवणकेपरिमाणतानिसोचित्तमेंअति हर्षि है ॥
वहराजहोइकरंककेशवदाससोसुखपाइहै । नृपकन्यका यह
तासुके उर पुष्पमालहिनाइहै ॥ ३२ ॥
: टी०-सिंधुराज सिंधुदेश लहावरकोराजा औ समुद्रचन्दनके चित्रकीतरंगहैं
अंगनमें जाके अर्थ चित्रविचित्रचन्दनअंगनमें लाये हैं औ चन्दन वृखनसों चित्र-
विचित्र हैं तरंगजाकी अनेक चन्दन वृक्ष जाकी तरंगन में बहत हैं ॥ वाहिनी
चमू औ नदी मुक्तन की माला पहिरे हैं औ मुक्तनकी माल पंगति समूहेति सो है
उरमें बदनमें जाके ॥ “ सिंधुर्वी मधुदेशाब्धिनदे नासरिति स्त्रियाम् ” ॥इति मेदिनी
॥ २८ ॥ बलअंग बल विक्रम बुद्धिबल ॥ २९ ॥ पन्नग सर्प शेषादि पतंग
पक्षी गरुडादि असुर दैत्य राक्षस बाणासुर रावणादि सिद्धदेवजाति विशेष ।
अथवा तपस्वी अजर कहे जराबुढाई सो रहित देवता अमर हनुमानादि अजब्र-
ह्मादि अंगी अंगधारी अनंगी कामादि विश्वरूप संसारभरके रूपप्राणी ॥३०॥
॥ ३१ कर्षि है उठाई है ॥ ३२ ॥
दोहा ॥ नेकशरासनआसनै, तजैनकेशवदास ॥ उद्यमकै
थाक्योसबै, राजसमाजप्रकास ॥ ३३ ॥ बिमति-सुन्दरी
छंद ॥ शक्तिकरीनहिंभक्तिकरीअब । सोननयोपलशीशन-
येसब ॥ देख्यो मैं राजकुमारनकेवर । चापचढयोनहिंआप
चढेखर॥३४॥विजय॥दिकूपालनकीभुवपालनकीलोकपाल-
नकीचैनमातुगईकिधै । भांडभयेउठि आसनतेकहिकेशव श-
म्भुशरासनकोछ्वै । काहूचढ़ायोनकाहूनवायोनकाहूउ
ठायोनआंगुरद्वै । स्वारथ भोनभयोपरमारथआयेहै वीर-
चले वनिता है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमत्सकललोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्रजिद्विर-
चितायांस्वयंवरसभावर्णननामतृतीयः प्रकाशः ॥ ३ ॥
चतुर्थप्रकाशः ४. ( ३५ )
टी०-जो या धनुषको उठाइ है ताको नृपकन्या ब्याहार्थ पुष्पमाला पहिराइ
है ऐसे विमतिके बचन सुनि सब गजसमाज समूह धनुष उठाईवेमें उद्यम कहे उपा-
यकरत भये परन्तु शरासन नेकु आसनकोहू न छोड़न भया अर्थ रंचकहूं ना उठयो
॥ ३३ ॥ जब धनुष काहूसों न उठयो तब क्रोधयुक्त ह्वै विमति कह्यो धनुष उठा
इबे में राजकुमारन शक्तिबल नहीं कियो धनुष की भक्ति कियो है काहेकी
धनुष बनायो औ बलमात्र सबके शीशनवत भये तौ जाकी जो भक्ति करत
है ताको शीश नवावत प्रनाम करत हैं तासों आप खर गर्दभमें चढे अर्थ-गर्दभमें
चढेप्राणी सब निन्दित भये ॥ ३४ ॥ किनि च्वै गई कहे गर्भ पतन काहे
ना भयो ॥ ३५ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननी जनकजानकी जानकीजानिप्रसादाय जानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्ति प्रकाशिकाया तृतीयः प्रकाशः ॥ ३ ॥
दोहा ॥ कथाचतुर्थप्रकाशमें, बाणासुरसम्बाद ॥ रावणसों
अरुधनुषसों; दशमुखबाणविषाद ॥ १ ॥ सबहीकोसमुझे
उसबन, बलबिक्रमपरिमाण ॥ सभामध्यताहीसमय; आये
रावणबाण ॥ २ ॥ डिल्लाछंद ॥ नरनारिसबै । भयभीत
तबै ॥ अचरिज्जुयहै ॥ सबदेखिकहै ॥ ३ ॥ दोहा ॥ हैरा
कसदशशीशको, दैयतबाहुहजार ॥ कियोसबनिकेचित्त
रस, अद्भुतभयसंसार ॥ ४ ॥ रावण-बिजोहाछंद ॥ शंभु
कोदंडदै राजपुत्रीकितै ॥ टूकद्वैतीनिकै जाहुंलंकाहितै ॥ ५ ॥
विमति-शशिबदनाछंद ॥ दशशिरआवो । धनुषउठावो ॥
कछुबलकीजै । जगयशलजै ॥ ६ ॥ बाण-गीतिका
छंद ॥ दशकंठरेशठछाँड़िदेहठबारबारनबोलिये । अब
आजुराजसमाजमेंबलसाजचित्तनडोलिये॥गिरिराजतेगुरुजा-
नियेसुरराजकोधनुहाथल्रै । सुखपायताहिचढ़ायकैघरजाहि
रे यश साथलै ॥ ७ ॥
( ३६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
टी०-रावण सों बाणासुर को संबाद है ना उठ्यो तासों दशमुख औ
बाणको धनुष सों विषाददुख है ॥ १ ॥ २ ॥ बाण रावण को देखि सब प्राणी
आश्चर्य है शब्द कहत भये ॥ ३ ॥ दशशीशको राक्षस औ हजारबाहुको दैत्य
सबनके चित्तमें अद्भुत औ भयरसको संसार रच्यो अर्थ अतिआश्चर्य औ भयसों
युक्त कियो दशशिरहजारबाहुदेखि अद्भुतरस भयो भयानकरूप देखि भय रस-
भयो ॥ ४ ॥ रावण विमतिसोंकह्यो की शंभु को दंड हमको दे कहे दीजिये
औ राजपुत्री कहां है ताको बतावो धनुष तोरि राजपुत्री लै लंकाहि जाऊं ॥ ५ ॥
॥ ६ ॥ विमति सों कहत ऐसे सबनके गर्व वचन सुनि रोषकरि बाण बोलत
भये राज सभामें बलको साज पराक्रम करु चित्त करिकै नाडोलु अर्थ मनोरथ
ना करु अथवा बलकी साज सों अथवा बल औ साज सैन्यादि सों चित्त ना
डोलावो मनोरथ ना करौ अर्थ इहां तुम्हारो बल ना चलि है सुरराज महादेव-
के गिरिराज ते कैलास ते सुरराज को धनुष गुरू गरु जानो सुरराजपदको संबंध
गिरिराजहू में है ॥ ७ ॥
मू०-मंथनाछंद ॥ बाणीकहीबान । कीन्हीनसौकान ॥
अद्यापि आनीन । रेवन्दिकानीन ॥ ८ ॥ वान-मालतीछंद ॥
जोपैजियजोर । तजौसबशोर ॥ शरासनतोरि । लहौंसुखको
रि ॥ ९ ॥ रावण--दंडक ॥ वज्रकोअखर्वगर्वगंज्योजेहिपर्वतारि
जीत्यौहैसुपर्बसर्वभाजैलेलैअंगना । खंडितअखंडआशुकी
न्हौहैजलेशपाशचन्दनसीचन्द्रिकासोंकीन्हीचंदबंदना ॥
दंडकमैंकीन्होकालकालहूकोमानखंड मानौकोहूकालहीकी
कालखंडखंडना । केशवकोदंडवीशदंडऐसेखंडेअबमेरेभुज
डंडन की बड़ीहै बिडंबना ॥ १० ॥
टी०-अति गर्वसों बाणकी बाणी कानमें ना कह्यो अर्थ ना सुन्यौ फेरि
विमति सों कह्यो कि रे कानीन क्षुद्रवंदि अद्यापि राजपुत्री को ना ल्यायो ॥ ८ ॥
अर्थ राजपुत्री प्राप्तिरूपी सुख शरासन तोरे बिना न पैहै ॥ ९ ॥ जिन भुजडंडन
बज्रको जो अखर्व बडो गर्व है ताको गंज्यौ बिदारबो अर्थ-इंद्रकी रक्षा औ
शत्रुबध करिवे में वज्रके अमोघता को गर्बरह्यो सो इनमें निष्फल भयो पर्वतारि
चतुर्थप्रकाशः ४. ( ३७ )
इन्द्रको इन जीत्यौ तब सर्व सुपर्व देवता अपनी अपनी स्त्रीलै लै भागत भये
फेरि अखंड काहूके खंडिवे योग नहीं ऐसो जो जलेश वरुणको पास फांस है
ताको आशु जल्दी जिनखंड काहू के खंडिवे योग नहीं ऐसो जो जलेश वरुण-
को पास फांस है ताको आशु जल्दी जिन खंडन कियो तोरचो औ जिनकी
वंदना पूजा चन्दनसी चन्द्रिका सों चन्द्र कह्यो अर्थ अति भय मानी चन्द्रमा
जिनको सुखद चांदनी सों सुखदियो युद्ध ना कियो औ कालदण्ड यमराजकी
आयुधताके यमराज रक्षा शत्रुवध करिवेको मानगर्व रह्यो ताको खंडनकियो
औ काल जे यमराज हैं तिन्हीं की खंड खंडना इन ऐसी कियो मानो काल
कहे यमके काल ईश्वर कीन्हों अर्थ जैसे यमको काल निर्भय है यमको खंडन
करत है तैसे कह्यो यासों या जनायो कि मैं इन भुज दंडन सों इन सबको जीत्यौ
है केशवकवि को दंड धनुष विसरचो नारी विडंवना निंदा ॥ १० ॥
मू०--बान--तुरंगमछंद ॥ बहुतबदनजाके ॥ विविधिवचन
ताके ॥ रावण ॥ बहुभुजयुतसोई । सबलकहियसौई ॥
॥ ११ ॥ रावण-दोहा ॥ अतिअसारभुजभारहीं, बलीहोहुगे
बान ॥ ममबाहुनकोजगतमें, सुनिदशकंठविधान ॥ १२ ॥
सवैया ॥ हौं जबहीं जबपूजनजातपितापदपावनपापप्रणासी ।
देखिफिरोंतबहीं तबरावणसातौंसातलकेजेविलासी । लैअ
पनेभुजदंड अखंड करोंछितिमंडलछत्रप्रभासी । जानैकोके-
शवकेतिकबार मैंशेषकेशीशनदीनउसासी ॥ १३ ॥ रावण
कमलछंद ॥ तुमप्रबलजोहुते । भुजबलनिसंयुते । पितहिभु
वल्यावते । जगतयशपावते ॥ १४ ॥ बान--तोमरछंद ॥
पितुआनिएकेहिओक । दियदक्षिणासबलोक॥ यहजानिएँ ब
नदीन । पितुब्रह्मकेरसलीन ॥ १५ ॥
टी०-रावण के वचन में काकोक्ति है ॥ ११ ॥ असार बल रहित ॥१२॥
अखंड संपूर्ण ॥ १३ ॥ १४ ॥ हे रावण ! दीन हमारो पिता ब्रह्म परब्रह्मके
रस स्वादमें लीन है तू यह जानि कहे जानु ॥ १५ ॥
सवैया ॥ कैटभसोंनरकासुरसोंपलमेंमधुसोंमुरसोंज्यहि
मारचो । लोकचतुर्दशरक्षककेशवपूरणवेदपुराणबिचारचो ।
श्रीकमलाकुचकुंकुममंडितपंडितदेवअदेवनिहारचो । सोक
रमांगनकोबलिपै करतारहुनेकरतारपसारचो ॥ १६ ॥
रावण-दोहा ॥ हमैंततुम्हैनहिंबुझिये, बिक्रमबादअखंड ।
अबजोयहकहिदेहिगो, मदनकदनकोदंड ॥ १७ ॥ संयुत-
तछंद ॥ ब्रतबाणरावणकीसुन्यो । शिरराजमंडलमेंधुन्यो ॥
बिमति ॥ जगदीशअबरक्षाकरो । विपरीतबातसबैहरो ॥
॥ १८ ॥ दोहा ॥ रावणबाणमहाबली । जानतसबसंसार ।
जोदोऊधनुकर्षीहैं, ताकोकहाविचार ॥ १९ ॥ बाण-
सवैया । केशवऔरतेऔरभईगतिजानिनजाइकछूकरतारी ।
शूरनकेमिलिबेकहँआयमिल्योदशकंठसदाअविचारी ।
बाढ़िगयोबकवादवृथायहभूलिनभाटसुनावहिंगारी । चापच
ढ़ायेकिकीरतिकोयहराजकरैतेरीराजकुमारी ॥ २० ॥
टी०-जा कर ने कैटभादि बली दैत्यनको मारचो फेरि चौदहौ लोककी रक्षा
करतहैं यों कहि कर कि बडी शक्ति जनायो फेरि श्रीकमलालक्ष्मी के
कुचन में कुंकुम केशरि के मंडित में भूषित करै मो अर्थ मकरिका पत्र बनावै में
पण्डित है यासों या जनायो कि जिन विष्णुके लक्ष्मी स्त्री हैं तासों सबसब
पदार्थ सों पूरण जानौ जामेंती शक्ति है शारद् कर हाथ करता करतार जे ब्रह्मा
हैं तिनहुन के करतार जे विष्णु हैं तिन् बलिपै मांगिबे को पसारचो ऐसे बली
विष्णु बलिपैं भिक्षाही मांगि पायो जीतिकै न पाई तासों विष्णु हूं सों अधिक
बलि औ दाता जानौ इति भावार्थ ॥ १६ ॥ १७ ॥ ब्रत धनुष उठाइबेकी
प्रतिज्ञा ॥ १८ ॥ १९ ॥ विमति के ऐसे विकल वचन सुनि बाण कह्यो कि हे
भाट ! सीताके व्याहिबेको बाणधनुष उठावत है ऐसी जो गारी है ताको
भूलिहू न सुनाउ सीता हमारी माता हैं उनतिसयें दोहा में कह्यो है कि सीता
मेरी माई है ॥ २० ॥
मू०-रावण-मधुछंद ॥ मोकहँरोकिसकेकहिकोरे ।
युद्धजुरैयमहूंकरजोरे ॥ राजसभातिनुकाकरिलेखों । देखिकै
राजसुताधनुदेखौं ॥ २१ ॥ सवैया ॥ बानकह्योतबरावणसों
अबवेणिचढाउशरासनको । वातबनाइबनाइकहाकहछोडि
देआसनवासनको । जानतहैकैधौं जानतनाहिंनतू अपनेमद
नाशनको । ऐसेहिकैसेमनोरथपूरतपूजेबिना नृपशासनको
॥ २२॥ रावण-बंधुछन्द ॥ बाननबाततुम्हैकहिआवै॥ बान॥
सोईकहौंजियतौहिंजोभावै ॥ रावण ॥ काकरिहौहमतौंहीं
बरैंगे ॥ बान ॥ हैहयराजकरीसोकरेंगे ॥ २३ ॥ रावण-दं
डक ॥ भौंरज्यौंभवतभूतवासुकीगणेशयुतमानोमकरन्द
बुन्दमालगंगाजलकी । उडतपरागपटनालसीविशालवाहुक
हाकहौंकेशोदासशोभापलपलकी । आयुधसघनसर्वमंगला
समेतिसर्वपर्वतउठाइगतिकीन्हीहैकमलकी । जानतसकललो
कलोकपालदिगपालजानतनबानबातमेरेबाहुबलकी॥ २४ ॥
टी०-॥ २१॥ आसन बिछावने औ वासन वस्त्रनको छोडिदे अर्थ मलरूप
काचिधनुष उठावोआइ अथवा सीताके लेवेकी जे आशा है तिनकी कामना स्मरण
छोडिदे अपने मदनाशनको मोको तू जानतहै कि नहीं जानत जो ऐसी बात कहत
हैं कि सीताको बिना धनुष तोरेही बरिहों अथवा अपने मदनाशनको धनुषको अर्थ
यह धनुष तुम्हारे मदको नाश करिहै नृपशासन धनुष उठाइबो ॥२२॥ हैहय राजा
सहस्रार्जुन ॥ २३ ॥ वासुकी सर्प औ गणेश सहित भूतगण जा पर्वत में कमल-
के भौंरसम भंवत भये औ महादेवके शीशको जो गंगाजल गिर्यो ताकी माल
मकरंद पुष्परस भयो औ उडत ये पार्वती आदि के पटवस्त्र हैं तेई पराग पुष्प-
धूलि औ मेरो बाहु जो हैं सो नाल कमलदंड भयो एने में या जनायो कि जब
मैं कैलास उठायो तब अतिशीघ्र उठायो तासों शंभुशीश को गंगाजल गिर्यो औ
वस्त्र उडत भये औ आयुध सघन कहि या जनायो कि तुम एक शंभु धनुष
उठाइबो कठिन मानत हौ वा पर्वतमें ऐसे अनेक आयुध रहे सर्व मंगला
पार्वती ॥ २४ ॥
मू०-मधुभारछंद ॥ तजिकैसुरारि । रिसचित्तमारि ॥ दश
कंठआनि । धनुछुयोपानि ॥ २५ ॥ विमति ॥ तुमबलनि-
धान । धनुअतिपुरान ॥ पीसजहुअंग । नहिंहोहिभंग॥२६॥
सवैया ॥ खंडितमानुभयोसबकोनृपमंडलहारिरह्योजगती
को ॥ व्याकुलबाहुनिराकुलबुद्धिथक्योबलविक्रमलंकपतीको
कोटिउपाय कियेक हिकेशवकेहून छाँडत भूमिरतीको । भूरि
बिभूतिप्रभावसुभावहिज्यॉ न चलैचितयोगयतीको ॥ २७ ॥
पद्धटिका ॥ धनुअतिपुरानलंकेशजानि । यहबातबानसोंक
हीआनि ॥ हौं पलकमाहँ लैहौंचढाइ । कछु तुम्हूँतोदेखोउठाइ ॥२८॥
टी०--सुकहे सोरारि वाग्विवाद अथवा सुरारि । बाणासुर ॥ २५ ॥ २६ ॥
निराकुल शिथिल बलदेह बल विक्रम उपाय विभूति ऐश्वर्य सुवर्ण रत्न गजादि
योग यती योगी ॥ २७ ॥ धनुष मोसों उठन लायक नहीं है यह जानिकै लंके-
शरावण अपनो भ्रमर राखि धनुष छोडि कै बाण सो यह बात कह्यो कि धनुष
अति पुरान है ॥ २८ ॥
मू०--वाण०--दोहा ॥ मेरेगुरुकोधनुषयह, सीतामेरीमाइ ॥
दुहूँभाँति असमंजसै, बाणचलेसुखपाइ ॥ २९ ॥ रावण-तो
टकछन्द ॥ अबसीय लियेबिनहौनटरौं । कहुँ जाहुँ नतौलगि
नेमधरौं ॥ जबलों न सुनौअपनेजनको । अति आरतशब्द
हतेतनको ॥ ३० ॥ ब्राह्मण-मोदकछंद ॥ काहू कहूँ शरआ-
शरमारिय । आरतशब्द आकाशपुकारिय ॥ रावणकेवहका
नपरयोजब ॥ छॉडिस्वयंवरजातभयोतब ॥ ३१ ॥ दोहा ॥
जबजान्योसबकोभयो, सबहीविधिव्रतभंग ॥ धनुषधरचोलै
भवनमें, राजाजनक अनंग ॥ ३२ ॥
इति श्रीमत्सकळलोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रि-
कायामिन्द्रजिद्विरचितायांबाणरावणयोर्वाग्विवादवर्णनं
नामचतुर्थः प्रकाशः ॥ ४ ॥
पञ्चमप्रकाशः ५. (४१)
टीका-॥ २९ ॥ हतेकहेबाणादि सों वेधे अर्थ-मेरे दास इहां उहां यज्ञादि
विघ्नकरत फिरत हैं तिनको जो कोऊ सताइहै तो तिनकी रक्षाको जैहौं ॥ ३० ॥
जब मारीचादिको रामचन्द्र मारयो है तब तिनको आरत पीडित दुःखितेति शब्द
सुनि रावण स्वयंवर सभाते गयो सो भेद कछू ब्राह्मण तौ जानत नहीं तासों
संदेह विशिष्टहै कहतहै कि कहूँ बली कहूँ कौन्ह्यौ स्थानमें शर बाणसों आशग
कहे काहू राक्षसको मारचो “क्रव्यादोस्त्रप आस्र इत्यमरः” । सुद्भासुर मारिय
कहूँ यह पाठ है तौ सुद् नामा राक्षसते भा कहे उत्पन्न जो असुर राक्षस है मारीच
ताको सुद् नाम राक्षसकी स्त्री ताड़का है ताको पुत्रमारीच है औ कहूँ शरमारीच
मारिय पाठ है तौ शरसों मारीच नामा राक्षसको मारचो ॥ ३१ ॥
अनंग विदेह ॥ ३२ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीप्रसादाय जनजानकीप्र-
सादनिर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकायाचतुर्थःप्रकाशः ॥ ४ ॥
मू०--दोहा ॥ यहप्रकाशपंचमकथा, रामगवनमिथिला
हि ॥ उद्धारणगौतमघरनि, स्तुतिअरुणोदयआहि ॥ १ ॥
मिथिलापतिकेवचनअरु, धनुभंजनउरधार ॥ जैमालादुंडु
भिअमर, वर्षनफूलअपार ॥ २ ॥ ब्राह्मण-तारकछंद ॥ जब
आनिभईसबकोदुचिताई । कहिकेशवकाहूपैमेटिनजाई ।
सियसंग लियेऋषिकीतियआई। इकराजकुमारमहासुखदाई ३॥
मोहनछंद।सुंदरवपुअतिश्यामलसोहै। देखतसुरनरकोमनमोहै
आनिलखीसियकोबरुऐसो । रामकुमारहिदेखियजैसो ॥४॥
तोटकछंद ॥ ऋषिराजसुनीयहबातजहीं । सुखपायचलेमि
थिलाहितहीं ॥ बनरामशिलादरशीजबहीं । तियसन्दररूप
भईतबहीं ॥ ५ ॥ विश्वामित्र-सोरठा ॥ गौतमकीयहनारि,
इन्द्रदोषदुर्गतिभई ॥ देखितुम्हेंनरकारि, परमपतितपावनभ
इ ॥ ६ ॥ कुसुमवि-चित्राछन्द ॥ तेहिअतिहरषेरघुपतिदे-
ख्यो । सबगुणपूरेतनमनलेख्यो ॥ यहबरमाँग्योदियोनका
हू । तुममममनतेकहूंनजाहू ॥ ७ ॥ कलहंसछन्द ॥ तहँता-
हिदैबरुकोचलेरघुनाथजू । अतिशूरसुन्दरयोंलसैंऋषिसाथ
जू ॥ जनुसिंहकेसुतदोउसिद्धिश्रीरये । बनजीवदेखतयोंसबै
मिथिलागये ॥ ८ ॥
टीका- ॥ १ ॥ २ ॥ जबधनुषकाहुसों नाउठयो तब सब के जनकादिके
मनमें दुचितई भई कि सीताको व्याह अब ना ह्वै है तादुचितई मेटिबेके
लिये त्रिकालदर्शिनी काहू ऋषिकी स्त्री एक राजकुमार सीताके संग चित्रमें
लिखिकै ल्याई किं सीताको या प्रकारको वरु मिलि है आशय कि जब या
प्रकारको राजकुमार आवै तब शम्भु धनुष चढ़ाइक सीताको व्याहै ॥ ३ ॥
सो हे ऋषि ! जैसो इन रामकुमारको देखियतहै तैसोई वरु ऋषिकी स्त्री सीताको
लिखिल्याई ॥ ४ ॥ ५ ॥ दुर्गति दुर्दशाको गई कहे प्राप्त भई ॥ ६ ॥ रूरेसुंदर
॥ ७ ॥ अति शूर औ सुंदर दुवौ राम लक्ष्मण ऋषिके साथमें ऐसे शोभित भये
मानो सिद्धि जो तप सिद्धिहै ताकी श्रीशोभा में रमे कहे अनुराग सिंहके सुत पुत्र
हैं सिंहादि बन जीव तपस्विनके वश्य होत हैं यह प्रसिद्ध है औ सिद्ध है श्रीरये
पाठ होइ तौ सिद्ध स्वाभाविक श्रीशोभा सों रये युक्त ॥ ८ ॥
मू०-दोहा ॥ काहूकोनभयोकहूं, ऐसोसगुन न होत । पुर
पैठतश्रीरामके भयोमित्रउदोत ॥ ९ ॥ राम-चौपाई ॥
कछुराजतसूरयअरुनपरे । जनुलक्ष्मणकेअनुरागभरे ॥
चितवतचित्तकुमुदिनीत्रसै । चोरचकोरचितासोलसै ॥१०॥
लक्ष्मण-षटपद् ॥ अरुणगातअतिप्रातपद्मिनीप्राणनाथ
भय । मानहुँकेशवदासकोकनदकोकप्रेममय ॥ परिपूरण
सिंदूरपूरकैधौंमंगलघट । किधौं शक्रकोछत्रमढयोमानिक-
मयूषपट ॥ कैशोणितकलितकपालयह किलकपा-
लिकाकालको । यहललितलालकैधौंलसतदिग्भामिनिके
भालको ॥ ११ ॥
टी०-अति अनुराग करि पुरमें पैठतही लक्ष्मणके सगुनार्थ उदित भये ताही
अनुराग प्रेमसों मानो भरेकहे पूरित हैं अथवा लक्ष्मणको ब्याज करि सगुन
पंचमप्रकाशः ५. ( ४३ )
समय उदयसों आपने ऊपर सूर्यको प्रेम जनायो यह कहनूति लोकरीति है
॥ १० ॥ पद्मिनी प्राणनाथ सूर्य अरुण तामें तर्कहैं कोकनद कमलनको
फुलावत हैं कोक चक्रवानको संयोगी करत हैं तासों मानो तिनके प्रेममयीहै
अर्थ तिन प्रति जो प्रेम है सो ऊपर छाइ रह्यो है सिंदूरकी पूर प्रवाह जलेति अर्थ-
सिंदूर मिश्रित जलसों भरचो अथवा परिपूर्ण सिंदूरसों पूर कहे पूरित अर्थ
सिंदूरहीसों भरयो अथवा सिंदूर सों रँग्योकै मंगल विवाहादिको घट पूजन
कलशहै मानिक रत्नकी मयूष किरण तिनको वीन्यो पटवस्त्र औ कोकिलकहै
निश्चयकरि यह कपालिकाकाली पै श्रोणितरुधिर कलितकालको कपालशीश
है अथवा कपालिकाको व कालको श्रोणित कलितकपाल है कालीको
रुधिर मांसभक्षकतासों कालको सर्वभक्षक तासों 'कालो जगद्भक्षकः' इति
प्रमाणात् ॥ ११ ॥
मू०-तोटकछन्द ॥ पसरेकरकुमुदिनिकाजमनो । कि
धौंपद्मिनिकोसुखदेनघनो ॥ जनुऋक्षसबैबहित्रासभगे ।
जियजानिचकोरफंदानठगे ॥ १२ ॥ रामचन्द्र-चंचरीछन्द ॥
व्योममेंमुनिदेखियेअतिलालश्रीमुखसाजहीं । सिंधुमेंबड़वा-
ग्निकीजनुज्वालमालबिराजहीं । पद्मरागनिकोकिधौंदिविविधू-
रिपूरितसोभई । शुरवाजिनकीखुरीअतितिक्षतातिनकी
हई ॥ १३ ॥ विश्वामित्र-सोरठा ॥ चढ्योगगनतरुधाइ,
दिनकर बानरअरुणमुख ॥ कीन्होंझुकिझहराइ, सकलतार
काकुसुमबिन ॥ १४ ॥
टी०-कुमुदिनि कोई के काजकहै गहिबेको कुमुदिनि भयसों संकोचको प्राप्त
होती है तासों ऋक्ष नक्षत्र यहि त्रास कहे फंदाभ्रमके त्रास ॥ १२ ॥ यामें आका-
शमें सूर्यकी लाली छाई रही है ताको वर्णन है मुनि विश्वामित्र को
संबोधन है ॥ १३ ॥ सूर्योदय सो नक्षत्रअस्त भये तामें विश्वामित्रने तर्ककरचो
दिनकर सूर्यरूपी जो अरुणमुख वानरहै सो गगन आकाशरूपी तरुवृक्षमें धाइक
चढयो है सो झुकि कहे रिसायकै झहराइकहे हलाइकै सकल तारका नक्षत्ररूपी
जे कुसुम फूले हैं तिन बिन कीन्ही सकल नक्षत्रास्तभयो तासों झुकि पद
करचो ॥ १४ ॥
( ४४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०--लक्ष्मण-दोहा ॥ जहींबारुणीकीकरी, रंचकरुचिद्वि
जराज ॥ तहींकियोभगवन्तबिन, संपतिशोभासाज ॥ १५॥
तोमरछन्द ॥ चहुँभागबागतडाग । अबदेखियेबडभाग ॥
फलफूलसोंसंयुक्त । अलियोंरमैजनमुक्त ॥ १६॥राम-दोहा॥
तिननगरीतिननागरी, प्रतिपदहंसकहीन॥जलजहारशोभितन
जहँ, प्रगटपयोधरपीन ॥ १७ ॥
टी०--वारुणी पश्चिमदिशा औमदिरा द्विजराज चन्द्रमा औ ब्राह्मण भगवंत
सूर्य औ ईश्वर संपत्ति चांदनी औ द्रव्यशोभा अंग छबिदुवौमें जानो सूर्योदय-
सों पश्चिम दिशामें शोभारहित चंद्रबिंब देखि श्लेषोक्तिसों वर्णन करयो जो ब्राह्मण
मदिराकी रुचि इच्छा करतहै ताको ईश्वर संपत्त्यादि सों हीन करत हैं ॥ १५ ॥
चहुँ भागचारौंवोरमुक्त साधुजन ॥ १६ ॥ जा जनकदेशगेते नगरी पुरी औ
तेनागरी स्त्री नहीं हैं जे प्रतिपदस्थान स्थान प्रति औ चरण चरण प्रति हंसपक्षी
ओक कहे जल औ हंसक बिछुवन सों हीन है औ जहां कहे जिनमें पीन बडे
पयोधर वापी कूपतडागादि औ कुचनमें जलज कमल औ मोतिनके हार समूह औ
माला नहीं शोभित अर्थ सब नगरिनमें जलाशय जल युक्त हैं तिनमें कमल
फूलैहैं औ हंस बसत हैं औ स्त्री मोतिनके माला औ बिछुवा पहिरे हैं यासों या
जनायो कि विधवा नहीं है और अथ-जो देश तिन नगरिन औ तिन नागरिन
सों युक्त है युक्तेतिशेषः । जिनके प्रतिपद् कहे मग राजमार्गोंति औ पग चिह्न
जे धूरिमें अंकित होत हैं तेई हंसपक्षी औकजल औ बिछुवन करिहीन हैं अर्थ
नगरीमें राजमार्ग छोड़ि अन्यत्र हंसयुक्त जल शोभितहै औ स्त्रिनके पग चिन्हही-
में बिछुवा नहीं हैं औ पगनमें सब बिछुवा पहिरेंहैं ओप जहां कहे जिन नगरिनमें
औ स्त्रिनमें शोभितन जलज हारन कमल समूहन औ मोतीमालनसों युक्त पीन
बडे पयोधर तडागादि औ कुचहैं ॥ १७ ॥
मू०-सवैया ॥ सातहुदीपनकेअवनीपतिहारिरहेजियमें
जबजाने । बीसबिसेब्रतभंगभयोसोकहौ अबकेशवकोधनुता-
ने । शोककिआगिलगीपरिपूरणआइगयेघनश्यामबिहाने ।
जानकिकेजनकादिककेसबफूलिउठेतरुपुण्यपुराने ॥ १८॥
दोधकछन्द ॥ आइगयेऋपिराजहिंलीने ॥ मुख्यसतानँदवि
प्रप्रवीने । देखिदुवौभयेपांयनिलाने । आशिपशीरषवासुलै
दीने ॥ १९ ॥ विश्वामित्र-सवैया ॥ केशवयेमिथिलाधि
पहैंजगमेंजिनकीरतिबेलिबईहै । दानकृपान विधातनसोंसिग
रीवसुधाजिनहाथलई है । अंगछतासकआठकसोंभवतीनिहु
लोकमैंसिद्धिभई है । वेदत्रयी अरुराजसिरी परिपूरणताशुभ
योगमई है ॥ २० ॥
टी०-घनश्याम रामचन्द्र औ सजलमेघ जैसे सजल मेघन्के आगमनसों
वृक्षकनकी दावाग्नि बुझातीहै औ हरित है जात हैं तैसे धनुष काहूसों ना उठ्यो
अब सीताको ब्याह ना है है ऐसे गाढ समयमें हम कछु सहाय ना कियो यह जासों
कहै ताको आगि जनकादिके पुण्य वृक्षनमें लगीरहै सो रामागमन सों
धनुष उठिबो निश्चय करि बुझानी औ फूलि उठे प्रफुल्लित है उठे हरित है उठे
इति ॥ १८ ॥ मुख्य जे सतानन्द प्रवीने विप्र ऋषि हैं ते राजा जनकको लीन्हें
विश्वामित्रको आगे है लेवेको आइ गये विश्वामित्रको देखि दुवौ सतानन्द औ
जनक पांयनमें लीनभये विश्वामित्र शीश सूंघी आशिष दयो ॥ १९ ॥ विश्वा-
मित्र रामादिसों जनककी बडाई करत हैं वेदत्रयी कहे तीनोंवेद ऋग्वेद, सामवेद
यजुर्वेद, तिनके अंगसों औ राजश्रीके सात अंग सों औ योगके आठ अंग सों
भव जो संसार है तामें तीनिहुँ लोकमें जनककी
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
( ४६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
हनछंद ॥ जनराजवंत जगयोगवंत । तिनकोउदोत । केहि
भाँतिहोत ॥ २२ ॥ श्रीराम-विजय ॥ सबछत्रिनआदिदै
काहूछुईंनछुयेबिजनादिकबातउगै । न घटैनबढैनिशिबासरके
शवलोकनकोतमतेजभगै । भवभूषणभूषितहोतनहींमदमत्त
गजादिमसीनलगै । जलहूंथलहूंपरिपूरणश्रीनमिकेकुलअ
द्भुतज्योतिजगै ॥ २३ ॥
टी०-जब विश्वामित्र जनककी स्तुति करचुके तब जनक अपने मंत्री आदि
सों विश्वामित्रकी बड़ाई करते हैं उत्तमवर्ण ब्राह्मण औ अरुणरंग अर्थ-तप-
स्याकरि क्षत्रिय सों ब्राह्मण भये ॥ २१ ॥ जब विश्वामित्र जनकके राज्य औ
योगकी स्तुति कियो तब संदेह युक्त है लक्ष्मण पूछयो कि, जे जन जगतमें राज्य
औ योग दुवौ साधत हैं ते कैसे उदयको प्राप्त होत हैं काहेते राज्य औ योग
परस्पर कर्म विरुद्ध हैं ॥ २२ ॥ लक्ष्मण पूछयो कि जेजन राजवंत योगवंत हैं
तिनको उद्योत कैसे होत है सो सुनिकै कहिबेकी अद्भुत युक्ति मनमें प्राप्त भई
तासों विश्वामित्र सों प्रथमहीं रामचंद्रही उद्योतके हेतुकहन लगे उद्योत ज्योतिको
होत है तालिये ज्योतिरूप करि कहत हैं कि निमि जे जनकके पुरिखा हैं तिनके
कुलकी जो ज्योतिप्रकाशकी शिखा है सो अद्भुत जगै कहे जगति है दीपित है
है इति अर्थ और दीप ज्योतिके सम नहीं है सो अद्भुतता कहत हैं कि,
दीप ज्योति को और दीप ज्योति छ्वै सकति है अर्थ समता करि सकति
है अर्थ जैसे एक दीपकी ज्योति होति है तैसी सजातीय औरहू दीप की होती
है औ या निमिकुलकी ज्योतिको आदि दै कहे आदिही सों जबसों प्रगट भई
है. अर्थ-जबसों निमिवंश भयो तब सों काहू क्षत्रिन नहीं छुयो अर्थ-समता
कर्यो फेरि कैसी है कि और ज्योति व्यजनादि बातसों डगमगाती है यह ज्योति
व्यजनादि बातसों नहीं उगती आदि पदते चामरादि जानौ अर्थ व्यजनादि
बात भोगादिको सुख जामें लिप्त नहीं हैसकत फेरि कैसी है कि और दीप ज्योति
दिनमें घटतिहै औ यह निशिवासर कहे रात्यौंदिन घटति बढति नहीं है अर्थ-
सबप्राणी जा वंशमें बराबर होत जात हैं तासों घटति नहीं औ पूर्णताको प्राप्त
है तासों बढति नहीं औ और दीप ज्योतिसों थल मात्रहीकौ तम अंधकार दूरि
होत है यासों कनकोत्तम तेज कहे अज्ञानको तेज दूरि होत है अर्थ-जिनके उप-
पंचमप्रकाशः ५. ( ४७ )
देश सों अथवा गानकरे सों अथवा कथा सुनि कै लोकन के प्राणिन को अज्ञान
दूरि होत है । ज्ञानी होत हैं फेरि कैसी है कि दीप ज्योति भवभूषण जो भस्म
है तासों अर्थ गुलसों भूषित होति है औ यह भव जो संसार है ताके जे भुवन कुंड-
लादि हैं तिनसों नहीं भूषित होती अर्थ कुंडलादि धारण सुखमें नहीं लिप्त होती
औ दीप ज्योतिमें मषी जो मसी है कज्जल रति सों लगति है अरु यामें
गजादिरूपी जो मषी है सो नहीं लागति अर्थ गजादि आरोहण सुखभोगमें
लिप्त नहीं होती आदि पदते रथास्वादि जानो औ दीप ज्योति थलहींमें पूर्ण
रहति है औ यह जलहू थलमें परिपूरण है अर्थ--जल थलमें प्रसिद्ध है योगसों
जीवन्मुक्त है तासों राज्यसुखमें लिप्त नहीं होत इतिभावार्थः ॥ २३ ॥
मू०--जनक-तारक ॥ यहकीरतिऔरनदेशनसोहै । सु
निदेवअदेवनकोमनमोहै ॥ हमकोवपुरासुनियेऋषिराई ।
सबगांउंछसातककीठकुराई ॥ २४ ॥ विश्वामित्र-विजय ॥
आपने आपनेगैरनितौभुवपालसबैसुवपालैंसदाई । केवल
नामहिकेभुवपालकहावतहैंभुवपालिनजाई । भूपनिकीतुमहीं
धरिदेहबिदेहनमें कलकीरतिगाई ॥ केशवभूषणकीभवभूषण
भूतनतैंतनयाउपजाई ॥ २५ ॥
टीका-जा प्रकार तुम वरण्यो यह कीरति और बडे राजनमें मोहति है या
लायक हम नहीं हैं ॥ २४ ॥ पतिको धर्म है स्त्रीसों पुत्र कन्या उपजावै सो
भूमिरूपी स्त्री है तासों और काहू भूपति नहीं उपजायो तासों केवल नामहीके
भूपाल भूपतिकी देह कोऊ नहीं धरे औ तुम भव संसार में भूषणनहूं को
भूषण अर्थ जाते भूषण शोभा पावत हैं अति सुन्दरी ऐसी तनया पुत्री भूतन
पृथ्वीके तन देह ते उपजायो तासों भूपन की देह केवल तुम्हीं धरे हो औ ताहू
पर तुम्हारी कल कहे निर्दोष कीरति विदेहन में गई है कहावत विदेह हौ यासों
या जनायो कि भोग राज्यको करत हौ यश जीवनयुक्त तपस्विनमें गायो है
याते तुमसम कोऊ राजा नहीं हैं ॥ २५ ॥
मू०-जनक--दोहा ॥ इहिंविधिकीचिंतचातुरी, तितको
कहा अकत्थ ॥ लोकनकीरचनारुचिर, रचिबेकोसमरत्थ ॥
( ४८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
॥ २६ ॥ सवैया ॥ लोकनकौरचनारचिबेकोजहींपरिपूरणबु
द्धिविचरी । ह्वैगइकेशवदासतहीसबभूमिअकाशप्रकाशि
तभारी । शुद्धसलाकसमानलसी अतिरोषमईदृगदीठिति-
हारी । होतभयेतब सूरसुधाधर पावकशुभ्रसुधारँगधारी ॥
॥ २७ ॥ दोहा ॥ केशवविश्वामित्रके, रोषमईदृगजानि ॥
संध्यासीतिहुँलोकमें; किहिनिउपासीआनि ॥ २८ ॥ जनक-
दोधकछंद ॥ एसुतकोनकेशोभहिसाजे । सुंदरश्यामलगौ
रविराजे ॥ जानतहौजियसोदरदोऊ । कैकमलाविमला
पतिकोऊ ॥ २९ ॥
टी०-जिनके लोक रचना रचिबेकी सामर्थ्य है तिनको वचन रचना करिबो
कहा है ॥ २६ ॥ परिपूरण बुद्धि कहे निश्चयबुद्धि सों बुद्धि भूमि औ आकाशमें
प्रकाशित भई अर्थ-फैलत भई अथवा भूमिअकाश सहित प्रकाशित भयो प्रगट भई
अर्थ सब विषय हस्तामलकवत् देखि परचो तासमय शुद्ध कहे तीक्ष्ण शलाक बाण
समान तिहारी रोषमयी दृष्टि लसी तासों सूर सूर्य सुधाकर चंद्रमा सरिस भयो औ
अग्नि अमृतके रंगभये अर्थ अति भयसों तेजहीन श्वेतभये “शलाका शल्य
मदन शारिका शल्यकीपुच ॥ छत्रादि काष्ठो शरयोरिति मेदिनी” ॥ २७ ॥
संध्यासम अरुणनेत्र भये तब जैसे तीनों लोकमें सब दोष निवारणार्थ संध्याकी
उपासना करतहैं तैसे रोष निवारणार्थ ब्रह्मादि सब उपासना करतभये अर्थ
सब आधीनह्वै स्तुति करतभये ॥ २८ ॥ दुहुनको सम सौंदर्यादि देखि यह मैं
जीमें जानत हौं कि ए दूनों सहोदर सगे भाई हैं औ कै कोऊ कहे कौनों रूप-
धारी कमलापति विष्णु विमलापति ब्रह्मा हैं आशय यह कि इनमें विष्णु ब्रह्मा-
सम सौंदर्यादि गुण हैं ॥ २९ ॥
मू०-विश्वामित्र ॥ चौ०-सुंदरश्यामलरामसुजानों । गौ
रसुलक्ष्मणनामबखानों ॥ आशिषदेहुइन्हेंसबकोऊ । सूरज
केकुलमंडनदोऊ ॥ ३० ॥ दोहा ॥ नृपमणिदशरथनृपति
के, प्रगटेचारिकुमार ॥ रामभरतलक्ष्मणललित, अरु शत्रु
घ्नउदार ॥ ३१ ॥ घनाक्षरी ॥ दानिनकेशीलपरदानकेप्र