रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
गीतिकाछंद ॥ कोइआजुराजसमाजमेंबलशंभुकोधनुक-
र्षि है ॥ पुनिश्रवणकेपरिमाणतानिसोचित्तमेंअति हर्षि है ॥
वहराजहोइकरंककेशवदाससोसुखपाइहै । नृपकन्यका यह
तासुके उर पुष्पमालहिनाइहै ॥ ३२ ॥
: टी०-सिंधुराज सिंधुदेश लहावरकोराजा औ समुद्रचन्दनके चित्रकीतरंगहैं
अंगनमें जाके अर्थ चित्रविचित्रचन्दनअंगनमें लाये हैं औ चन्दन वृखनसों चित्र-
विचित्र हैं तरंगजाकी अनेक चन्दन वृक्ष जाकी तरंगन में बहत हैं ॥ वाहिनी
चमू औ नदी मुक्तन की माला पहिरे हैं औ मुक्तनकी माल पंगति समूहेति सो है
उरमें बदनमें जाके ॥ “ सिंधुर्वी मधुदेशाब्धिनदे नासरिति स्त्रियाम् ” ॥इति मेदिनी
॥ २८ ॥ बलअंग बल विक्रम बुद्धिबल ॥ २९ ॥ पन्नग सर्प शेषादि पतंग
पक्षी गरुडादि असुर दैत्य राक्षस बाणासुर रावणादि सिद्धदेवजाति विशेष ।
अथवा तपस्वी अजर कहे जराबुढाई सो रहित देवता अमर हनुमानादि अजब्र-
ह्मादि अंगी अंगधारी अनंगी कामादि विश्वरूप संसारभरके रूपप्राणी ॥३०॥
॥ ३१ कर्षि है उठाई है ॥ ३२ ॥
दोहा ॥ नेकशरासनआसनै, तजैनकेशवदास ॥ उद्यमकै
थाक्योसबै, राजसमाजप्रकास ॥ ३३ ॥ बिमति-सुन्दरी
छंद ॥ शक्तिकरीनहिंभक्तिकरीअब । सोननयोपलशीशन-
येसब ॥ देख्यो मैं राजकुमारनकेवर । चापचढयोनहिंआप
चढेखर॥३४॥विजय॥दिकूपालनकीभुवपालनकीलोकपाल-
नकीचैनमातुगईकिधै । भांडभयेउठि आसनतेकहिकेशव श-
म्भुशरासनकोछ्वै । काहूचढ़ायोनकाहूनवायोनकाहूउ
ठायोनआंगुरद्वै । स्वारथ भोनभयोपरमारथआयेहै वीर-
चले वनिता है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमत्सकललोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्रजिद्विर-
चितायांस्वयंवरसभावर्णननामतृतीयः प्रकाशः ॥ ३ ॥