रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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पंचमप्रकाशके तृतीयछंदमें ब्राह्मणकहि है कि काहू ऋषिकी स्त्री चित्रमें सीताका
ऐसो कोऊ बरलिखिल्याई जैसो रामचन्द्रको देखियत है ॥ १३ ॥ सीताको
जो शोभन कहे सुंदर ब्याह है ताकी जो उत्सव सभा कहे कौतुक सभा है स्वयंवर
सभा इति । ताके जे अनेक संभार सामग्री हैं अनेक राज सत्कारादि वस्तु तिनकी
जो संभावना विचार है तासों राजा जनक औ राजपुरोहित सतानंद तिन्हें आदि
दै और जे सुहृद मित्र हैं औ महामंत्रके देनहार जे मंत्री हैं औ समग्र कहे
सम्पूर्ण मिथिलावासी जे शोभन कहे सुबुद्धिजनहैं ते सब तत्तत्कार्य कहे अपने
अपने उचित कार्य में व्यग्रकहे आसक्त हैं। संलग्न इति अथवा आकुल हैं
"व्यग्रो व्यासक्त आकुले इति मेदिनी" औ सर्वदापूज्य औ पर कहें उत्कृष्ट ऐसे
नाना देश अनेकदेशके नृपगण समागत कहे आये हैं ॥ १४ ॥
मू०-दोहा ॥ खण्डपरसकोशोभिजै, सभामध्यकोदंड ।
मानहुँशेषअशेषधर, धरनहारबरिबंड ॥ १५ ॥ सवैया ॥ शो
भतिमंचनकीअवलीगजदंतमईछबिउज्ज्वलछाई । ईशमनौ-
वसुधामेंसुधारिसुधाधरमंडलमंडिजोन्हाई । तामहँकेशवदा-
सविराजतराजकुमारसबैसुखदाई । देवनसोंजनुदेवसभाशुभ
सीयस्वयंवरदेखनआई ॥ १६ ॥ दोहा ॥ नवतिमंचपंचालि
का, करसंकलितअपार । नाचतिहैजनुनृपतिकी, चित्तवृ-
त्तिसुकुमार ॥ १७ ॥ सोरठा ॥ सभामध्यगुणग्राम, बंदीसु-
तद्वैशोभहीं ॥ सुमतिविमतियहनाम, राजनकोवर्णनकरैं ॥
॥ १८ ॥ सुमति-दोहा ॥ कोयहनिरखतआपनी, पुलकित
बाहुविशाल ॥ सुरभिस्वयंवरजनुकरो, मुकुलितशाखर-
साल ॥ १९ ॥
टी०-जामें देशांतरनके राजा लोग आय आय बैठत हैं ऐसे स्वयंवर सभामें
चारों ओर मंच कहे मचाननकी अवली पंक्तिबनतिहै ॥ १५ ॥ सोमंचावली
सीयस्वयंवरमें गजदंत हाथी दाँतन की बनी है तामें ब्राह्मण उत्प्रेक्षा करते
१ महादेव.