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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 269 में से

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पृष्ठ 42

( ३६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
टी०-रावण सों बाणासुर को संबाद है ना उठ्यो तासों दशमुख औ
बाणको धनुष सों विषाददुख है ॥ १ ॥ २ ॥ बाण रावण को देखि सब प्राणी
आश्चर्य है शब्द कहत भये ॥ ३ ॥ दशशीशको राक्षस औ हजारबाहुको दैत्य
सबनके चित्तमें अद्भुत औ भयरसको संसार रच्यो अर्थ अतिआश्चर्य औ भयसों
युक्त कियो दशशिरहजारबाहुदेखि अद्भुतरस भयो भयानकरूप देखि भय रस-
भयो ॥ ४ ॥ रावण विमतिसोंकह्यो की शंभु को दंड हमको दे कहे दीजिये
औ राजपुत्री कहां है ताको बतावो धनुष तोरि राजपुत्री लै लंकाहि जाऊं ॥ ५ ॥
॥ ६ ॥ विमति सों कहत ऐसे सबनके गर्व वचन सुनि रोषकरि बाण बोलत
भये राज सभामें बलको साज पराक्रम करु चित्त करिकै नाडोलु अर्थ मनोरथ
ना करु अथवा बलकी साज सों अथवा बल औ साज सैन्यादि सों चित्त ना
डोलावो मनोरथ ना करौ अर्थ इहां तुम्हारो बल ना चलि है सुरराज महादेव-
के गिरिराज ते कैलास ते सुरराज को धनुष गुरू गरु जानो सुरराजपदको संबंध
गिरिराजहू में है ॥ ७ ॥
मू०-मंथनाछंद ॥ बाणीकहीबान । कीन्हीनसौकान ॥
अद्यापि आनीन । रेवन्दिकानीन ॥ ८ ॥ वान-मालतीछंद ॥
जोपैजियजोर । तजौसबशोर ॥ शरासनतोरि । लहौंसुखको
रि ॥ ९ ॥ रावण--दंडक ॥ वज्रकोअखर्वगर्वगंज्योजेहिपर्वतारि
जीत्यौहैसुपर्बसर्वभाजैलेलैअंगना । खंडितअखंडआशुकी
न्हौहैजलेशपाशचन्दनसीचन्द्रिकासोंकीन्हीचंदबंदना ॥
दंडकमैंकीन्होकालकालहूकोमानखंड मानौकोहूकालहीकी
कालखंडखंडना । केशवकोदंडवीशदंडऐसेखंडेअबमेरेभुज
डंडन की बड़ीहै बिडंबना ॥ १० ॥
टी०-अति गर्वसों बाणकी बाणी कानमें ना कह्यो अर्थ ना सुन्यौ फेरि
विमति सों कह्यो कि रे कानीन क्षुद्रवंदि अद्यापि राजपुत्री को ना ल्यायो ॥ ८ ॥
अर्थ राजपुत्री प्राप्तिरूपी सुख शरासन तोरे बिना न पैहै ॥ ९ ॥ जिन भुजडंडन
बज्रको जो अखर्व बडो गर्व है ताको गंज्यौ बिदारबो अर्थ-इंद्रकी रक्षा औ
शत्रुबध करिवे में वज्रके अमोघता को गर्बरह्यो सो इनमें निष्फल भयो पर्वतारि