रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
काश्मीर को तिलक कहे काश्मीर देशको राजा औ काश्मीर कहे केशरिको
तिलक कैसोंहै राजा औ तिलकराज जे कुबेर हैं तिनकी दिशा उत्तर दिशारूपी
जो वाम स्त्री है ताके भालको लाल रक्त जो सुमेरु है सो है लोभी सदा ज्यहि
राजाको अर्थ सुमेरु के यह इच्छा रहति है कि इन्द्रको राज छोडि या राजाको
राज हमपर होय यासों या जनायो कि राजा रूपगुण करि इन्द्र हूं सों अधिक
है अथवा यह राज सुमेरु को सदा लोभीहै इन्द्र को जीति सुमेरु पर राज्य करि-
बे की इच्छा राखत है औ राजराज दिग सदृश जे वाम स्त्री हैं राजराज दिक
सदृश कहे या जनायो जैसे द्रव्यरूप लक्ष्मीसों युक्त उत्तर दिशा है तैसे शोभा-
रूप लक्ष्मी सों युक्त स्त्री हैं तिनके भाल को जो लाल रत्न है शोभा है सदा
जातिकको अर्थ जो तिलक लाल हू की शोभा बढावत है तासों तिलकके
निकट रहिबे की भाल लाल के इच्छा रहतिहै आशय यह कि अति भूषणनसों
भूषित औ अति सुंदरीहू स्त्रीनकौ शोभा बढावत है साधारण नहीं है और अर्थ
राजराज कहे राजनको राजा है और दिशारूपी जो वाम स्त्री है ताको भाल को
लाल है औ लोभी है सदा कहे याचकनकी याचकता को याचकन को याचिबो
सर्वदा जाको भावत है अर्थ बडो दाता है सदा पर सो मैं याचकताकी कहत
हैं औ अर्थराजदिग जो उत्तर दिशा है ताके वाम भाग जो पूरव दिशा है ताके
भाल को लाल सूर्य ताको सदा लोभी ऐसा जो काश्मीर देश है ताको राजा है
अति जाडे सों जा देश वासिन के सदा सूर्योदय की इच्छा रहति है ॥ २२ ॥
मूल ॥ सुमति-दोहा ॥ निजप्रतापदिनचरकरत,लोचन
कमलप्रकाश॥ पानखातमुसुकातमृदु, कोयहकेशवदास॥२३॥
टी०-अर्थ यह जाके अंगनमें प्रताप कांतिकी झलक सब लोचन पसारिकै
निहारत हैं ॥ २३ ॥
मूल-बिमति-सोरठा ॥ नृपमाणिक्यसुदेश, दक्षिणतिय
जियभावती । कटितटसुपटसुवेश, कलकाचीशुभमण्डई ॥
॥ २४ ॥ सुमति-दोहा ॥ कुण्डलपरसतमिसकहत, कहौ
कौनयहराज ॥ शंभुशरासनगुनकरो, करनालम्बितआज ॥
॥ २५ ॥ बिमतिसोरठा ॥ जानहिं बुद्धिनिधान, मत्स्यराज
यहिराजको॥समरसमुद्रसमान, जानतसबअवगाहिकै॥२६॥