रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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सुमति-दोहा ॥ अंगरागरंजितरुचिर, भूषणभूषितदेह ॥
कहतबिक्षूपकसोंकछू, सोपुनिकोमछनृपयेह ॥ २७ ॥
टी०-नृपमाणिक्य नृपश्रेष्ठ औ उत्तम माणिक्य राजा कैसो है कि सुन्दर हैं
देश द्रविडादि जामें ऐसी जो दक्षिण दिशा रूपी तिय है ताको अति भावत हैं
जा दक्षिण दिशाके कटितट में कहे मध्यभाग में सुन्दरहै पटपद्धति जाको औ
कल कहे दुःख रहित ऐसी जो कांची नामा पुरी है ताको मंडत है भूषित करत
अर्थ कि याके देश में मध्यभाग में विष्णुकांची शिवकांची पुरी हैं तामें जाको
बास है माणिक्य कैसो है कि सुदेश कहे सुंदरी दक्षिण कहे प्रवीण जे तिय स्त्री
हैं तिनको अति भावती है फेरि कैसोहै कि सुष्ठु पट वस्त्र युक्त जो कटितट है
तामें कल कहे अव्यक्त मधुर स्वरयुक्त जो कांची क्षुद्रघण्टिका है ताको मण्डई
कहे भूषित शोभित करै है ॥ २४ ॥ कर्णालंबित करौ कर्ण पर्यंत खैंचौ ॥२५॥
मत्स्य नामा जो देश विशेष है मच्छीबन्दर करि प्रसिद्ध है ताको यह राजा है
औ मत्स्यराज राघव मत्स्य सो जैसे समुद्रको अवगाहि मँझाइकै सब जानन है
ऐसे राजा समररूपी समुद्रको मँझाइ कै सब समर भेदको जानतहै अर्थ कि बडो
शूर है 'मत्स्योमीनेपुमान्भूम्निदेशे' इति मेदिनी ॥२६॥ विदूषक मसखरा, “हास्य
कारी विदूषक इत्यमरः” ॥ २७ ॥
मूल बिमति-सोरठा ॥ चन्दनचित्रतरंग, सिंधुराजयह-
हजानिये ॥ बहुतवाहिनीसंग, मुक्तामालविशालउर ॥ २८॥
दोहा ॥ सिगरेराजसमाजके, कहेगोत्रगुणग्राम ॥ देशसुभा-
वप्रभावअरु, कुलबल विक्रमनाम ॥ २९ ॥ घनाक्षरी ॥
पावकपवनमणिपन्नगपतंगपितृजेते ज्योतिवंतजगज्योति-
षिनगायेहैं । असुरप्रसिद्धसिद्धतीरथसहित सिंधु के-
शवचराचरजेवेदनबतायेहैं । अजरअमर अजअंगीऔ
अनंगीसबबरणिसुनावै ऐसेकोनेगुणपायेहैं । सीताकेस्व-
यंवरकोरूपअवलोकिबेकों भूपनकोरूपधरिबिश्वरूपआये
हैं ॥ ३० ॥ सोरठा ॥ कह्यो विमतिवहटेरि, सकलसभाहिसु
नाइकै ॥ चहूओरकरफेरि, सबहीकोसमुझाइकै ॥ ३१ ॥
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