रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थप्रकाशः ४. ( ३७ )
इन्द्रको इन जीत्यौ तब सर्व सुपर्व देवता अपनी अपनी स्त्रीलै लै भागत भये
फेरि अखंड काहूके खंडिवे योग नहीं ऐसो जो जलेश वरुणको पास फांस है
ताको आशु जल्दी जिनखंड काहू के खंडिवे योग नहीं ऐसो जो जलेश वरुण-
को पास फांस है ताको आशु जल्दी जिन खंडन कियो तोरचो औ जिनकी
वंदना पूजा चन्दनसी चन्द्रिका सों चन्द्र कह्यो अर्थ अति भय मानी चन्द्रमा
जिनको सुखद चांदनी सों सुखदियो युद्ध ना कियो औ कालदण्ड यमराजकी
आयुधताके यमराज रक्षा शत्रुवध करिवेको मानगर्व रह्यो ताको खंडनकियो
औ काल जे यमराज हैं तिन्हीं की खंड खंडना इन ऐसी कियो मानो काल
कहे यमके काल ईश्वर कीन्हों अर्थ जैसे यमको काल निर्भय है यमको खंडन
करत है तैसे कह्यो यासों या जनायो कि मैं इन भुज दंडन सों इन सबको जीत्यौ
है केशवकवि को दंड धनुष विसरचो नारी विडंवना निंदा ॥ १० ॥
मू०--बान--तुरंगमछंद ॥ बहुतबदनजाके ॥ विविधिवचन
ताके ॥ रावण ॥ बहुभुजयुतसोई । सबलकहियसौई ॥
॥ ११ ॥ रावण-दोहा ॥ अतिअसारभुजभारहीं, बलीहोहुगे
बान ॥ ममबाहुनकोजगतमें, सुनिदशकंठविधान ॥ १२ ॥
सवैया ॥ हौं जबहीं जबपूजनजातपितापदपावनपापप्रणासी ।
देखिफिरोंतबहीं तबरावणसातौंसातलकेजेविलासी । लैअ
पनेभुजदंड अखंड करोंछितिमंडलछत्रप्रभासी । जानैकोके-
शवकेतिकबार मैंशेषकेशीशनदीनउसासी ॥ १३ ॥ रावण
कमलछंद ॥ तुमप्रबलजोहुते । भुजबलनिसंयुते । पितहिभु
वल्यावते । जगतयशपावते ॥ १४ ॥ बान--तोमरछंद ॥
पितुआनिएकेहिओक । दियदक्षिणासबलोक॥ यहजानिएँ ब
नदीन । पितुब्रह्मकेरसलीन ॥ १५ ॥
टी०-रावण के वचन में काकोक्ति है ॥ ११ ॥ असार बल रहित ॥१२॥
अखंड संपूर्ण ॥ १३ ॥ १४ ॥ हे रावण ! दीन हमारो पिता ब्रह्म परब्रह्मके
रस स्वादमें लीन है तू यह जानि कहे जानु ॥ १५ ॥