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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

प्रथमप्रकाशः १. ( ९ )
भाषाकरी प्रकाश ॥५॥ सोरहसै अठ्ठावन, कार्तिकशुदि बुध
वार ॥ रामचन्द्रकी चन्द्रिका, तब लीन्हों अवतार ॥६॥ बाल
मीकि मुनि स्वप्नमें, दीन्हों दरशन चारु ॥ केशव तिनसों यों
कह्यो, क्यों पाऊं सुखसारु ॥७॥ मुनिश्रीछंद सिद्धिऋद्धिः॥८॥
सारछंद ॥ रामनाम सत्यधाम ॥९॥ और नामकोन काम १०॥
टीका-गुणाढ्यगुणन सों पूरित औ साधु मत उत्तम मत छंद उपजाति है जा
छंदमें और और द्वै आदि छंदके चरण होइ सो छंद उपजाति कहावति है ॥४॥
॥५॥ जो मैं तिथि नहीं कह्यों सो वार पढ़ते सात वार हैं तासों सप्तमी तिथि सब
कहतेहैं परंतु ज्योतिषके ग्रंथ ग्रहलाघवादिके मतसों कल्पांत अहर्गण किये बुधवार
पंचमी और द्वादशी को आवत है सो द्वादशी भद्रा तिथी है और बुधे भद्रा
सिद्धियोग होतहै और कार्तिक शुदी एकादशीको विष्णु जागतेहैं विष्णुके जागे-
के उपरांत ग्रंथारम्भ करचो तौ चैत्रादि

(१०) रामचन्द्रिका-सटीक ।
टीका-केशव पूँछयो कि लोभ मोहादि कृत जो दुःख हैं सो कैसे तरिहैं
तब मुनि कह्यो कि, जब तू रामनाम ग्रहण करिहै तब रामचन्द्र हरि हैं छोडाइ हैं
इहां हरिशब्द यासों कह्यो कि 'हरतिदुःखमिति' हरिः अर्थ दुःख हरिवो उनके
नामहींको अर्थ है ॥ ११ ॥ दुःख छोडाई रामचंद्र मुक्ति देहिं या निश्चय के अर्थ
रामचंद्रको ईश्वरत्व केशवको मुनि चारिछंदमें देखावत हैं जो जगत्‌को शरण
रक्षक है सो बरण रूप राम रूप अथवा रामनामांक तुम करिकै वर्णिवे है अर्थ
रामचंद्र को रूप अथवा राम नाम वर्णन करो ॥ १२ ॥ सब जग कहत है कि
रघुनन्दन जे रामचन्द्र हैं ते सुखके कंद कहे मूलहैं इनहीं के आश्रित सब सुख
है औ जग वंद्यहै सब जग जिनको वंदना करत है सुखकंद कहि या जनायो कि
सुखसार रामचंद्रही सों पाइ है और देव देवेको समर्थ नहीं हैं ॥ १३ ॥ जिन
रामचंद्रको वेद जो हैं सो एकरूपी कहे जो सदा एकरूप रहतहें ब्रह्मज्योति
जासों गुन्यो कहे ठहरायोहै सो गान करत हैं सो हम वेद वाक्य सों सुन्यो है
अथवा एककहे जिन सम दूसरो नहींहै औ रूपीकहे अनेक रूपसों सर्वत्र व्याप्त हैं
फिरि कैसे हैं जिनको महादेव सदा ध्यावते हैं ॥ १४ ॥ यामें रामचंद्रके गुणन-
को माहात्म्य है अनंत शेष विशेष निर्णय ॥ १५ ॥
मू०-नगस्वरूपिणीछंद ॥ भलोबुरोनतुंगुनै। वृथाकथाकह्रै-
सुनै॥ नरामदेवगाइहै। न देवलोक पाइहै ॥ १६ ॥ षटपद॥
बोलिनबोल्यो बोल दयो फिर ताहि न दीन्हों। मारिनमार्यो-
शत्रुक़ोधमनवृथानकीन्हों ॥ जुरिन मुरे संग्राम लोककीलीक
न लोपी । दान सत्य सन्मान सुयश दिशि विदिशा ओपी॥
मनलोभ मोहमदकामवश भये न केशवदास भणि । सोइ
परब्रह्म श्रीरामहै अवतारी अवतार मणि ॥ १७ ॥ दोहा ॥
मुनिपति यहउपदेशकै, जबहीं भयो अदृष्ट ॥ केशवदास तहीं
करचो, रामचन्द्रजू इष्ट ॥ १८ ॥
टी०-तू अनेक कथा वृथा कह्यो सुनो करत है आपनो भलो बुरो नहीं
गुनतो विचारतो जबलौं जैसो पूर्व कहि आयं ऐसे रामदेव को न गाइ है तबलों
अनेक कथन सों देवलोक न पैहै इहाँ देवलोक वैकुंठ जानो वैकुंठ देवेकी शक्ति

प्रथमप्रकाशः १. (११)
रामचन्द्रही में है और देव नहीं देसकत कहूं न रामलोक पाइ है पाठ है तौ
रामलोक वैकुंठ ॥ १६ ॥ प्रथम ईशत्व वर्णन करचो अब यामें रामचंद्रको
स्वभाव गुण वरण्यो है गमचन्द्रजू जो बोले सो फेरि नहीं बोले अर्थ जो
एक बान कह्यो सोई करचो है फेरि बदलि कै और बातनहीं कह्यो वन गमनादि
बचन ते जानो औ जाकों दान दियो ताको फेरि वही दीन्हों अर्थ एकही बार
ऐसो दियो जामें वाकें फेरि माँगिबेकी इच्छा नहीं रही विभीषणादि को लंका-
दानादि ते जानो और शत्रुको एकही बार ऐसा मारिकै नाश कियो जामें फेरि
नहीं मारिबे पर्यो खरदूषणादि वधते जानो औ संग्राम में जुरिकै नहीं मुरे
खरदूषण रावणादि के युद्धते जानों औ लोक की लीक मर्यादा को लोप नहीं
कियो रावण के बधसों ब्रह्मदोष मानि अश्वमेध करणादि सों जानो औ
दान औ सत्य औ सन्मान के सुयश करिकै दिशा औ विदिशा ओपी हैं अर्थ
जिनको सुयश दिशि विदिशन में छाइ रहा है औ जिनको मन लोभ औ
मोह औ मद औ काम के वश नहीं भयो राज्य त्यागादि सों लोभ विवशजानी
माता पिताको दुःखितहुए देखि वन गमन करणादि सो मोह विवश जानो औ
अगस्त्यादि ऋषिनके यथोचित सत्कार सों मद विवश जानी एक पत्नी व्रतसो
काम विवश जानो जाके ऐसे स्वभाव गुणहैं सोई श्रीराम वाराहादि अवतारन में
मुनिश्रेष्ठ अवतारी कहे अवतारको धरे साक्षात्परब्रह्म है अथवा श्रीराम अवतारी
कहे अनेक अवतारन को धरत हैं औ परब्रह्म हैं ॥ १७ ॥ अदृष्ट अंतर्द्धान इष्ट-
पूज्य देवता ॥ १८ ॥
मू०-गाहाछंद॥ रामचन्द्र पदपद्मं वृन्दारक वंदाभिवृंदनीयं॥
केशवमतिभूतनया लोचनंचंचरीकायते ॥ १९ ॥ चतुष्पदी-
छंद॥ जिनको यशहंसा जगत प्रशंसा मुनिजन मानसरंता ।
लोचन अनुरूपनि श्याम स्वरूपनि अंजन अंजित संता ॥
कालत्रयदर्शी निर्गुणदर्शी होत विलम्ब न लागै । तिनके गुण
कहिहौं सब सुख लहिहौं पाप पुरातन भागै ॥ २० ॥
टी०-वृंदारक जे देवताहैं तिनके वृंदसमूह तिन करिकै अभिवंदनीय अर्थ
जिनको अनेक देवता वन्दना करतहैं ऐसे जे रामचंद्र के पदपद्म पदकमल हैं तिन
प्रति केशवदास की मतिरुपी जो भूतनया सीता हैं ताके लोचन चंचरीकाय ते कहे
चंचरीक भ्रमरके ऐसे आचरण करत हैं अर्थ जब मुनि की आज्ञा सों राम-

( १२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
चंद्र को इष्टदेवता करचो तब सीता सम सदा रामनिकट वर्तिनी हमारी मति के
लोचन कमलमें भ्रमर सदृश रामचन्द्र चरण में अनेक कौतुक करने लगे ॥१९॥
मानस मानसर औ मन आय आपने लोचननके अनुरूप कहे योग्य और के
लोचनके योग्य कज्जलादि अंजन है संतन के लोचननके योग्य रामरूपही हैं ऐसे जे
जिन रामचंद्र के अनेक प्रतिबिंब श्यामरूप रूपी अंजन हैं तिनकरि जे
संत अंजित हैं अर्थ रामचंद्र के प्रतिबिंब रूपनको जे संत जन ध्यानमें आनत
हैं अथवा श्याम स्वरूपनि कहे श्यामरूपता रूपी जो अंजन है ता करिकै, जे
संत अंजित हैं तिन संतनको त्रिकालदर्शी और निर्गुण पशीं नेत्रन करि ज्योति
स्पर्श करै या अर्थ ब्रह्मज्योति के दृष्टा होत बेर नहीं लागति जे रामचंद्रको
ध्यान करत हैं ते त्रिकालदर्शी होत हैं औ ब्रह्मज्योति को देखत हैं इति भावार्थः॥
अथवा निर्गुणपर्शी होत कहे निर्गुणज्योति में मिलिजात बेर नहीं लागति
अथवा निर्गुणते पर अन्य विष्णुकी श्रीशोभा होत बेर नहीं लागति पुरातन
पूर्व कृत ॥ २० ॥
मू०-दो०-जागति जाकी ज्योति जग; एकरूपस्वच्छंद ॥
रामचंद्रकी चन्द्रिका, वरणतहों बहुछंद ॥२१॥ रोलाछंद ॥
शुभ सूरजकुल कलशनृपति दशरथ भये भूपति ॥ तिनके
सुतभये चारि चतुर चितचारु चारुमति ॥ रामचन्द्र
भुवचन्द्र भरत भारत भुवभूषण । लक्ष्मण अरु शत्रुघ्न
दीहदानव दलदूषण ॥ २२ ॥ धत्ताछन्द ॥ सरयूसरिता तट
नगर बसै अवध नाम यश धामघर ॥ अघओघ विनाशी
सब पुरवासी अमरलोक मानहुँ नगर ॥ २३ ॥
टी०-ज्योति ब्रह्मज्योति अथवा अंगछवि औ बहु छंद कहे अनेक रंगतौ
जा रामरूपी चन्द्रकी ज्योति तौ एक रूप है ताकी चन्द्रिका अनेक रंगहै वो
आश्चर्य है यह युक्ति है औ अर्थ यह कि बहुत छंद जे दोहाहि हैं तिनसों
युक्त ॥ २१ ॥ सूर्य कुलके कलश जे नृपति अजादि हैं तिनमें दशरथ
भूपति राजा भये भारत भरतखंड ॥ २२ ॥ यश को धाम कहे घर है धरा पृथ्वी
जाकी अयोध्यापुरी के वासी देवतन सरिस अघपापन के ओघ समूहन के विनाशी
हैं तासों देवलोक सम है ॥ २३ ॥

प्रथमप्रकाशः १. ( १३ )

मू०-छप्पै ॥ गाधिराजको पुत्र साधिसब मित्रशत्रुबल ।
दान कृपान विधान वश्य कीन्हों भुवमण्डल ॥ कैमन अपने
हाथ जीति जग इन्द्रियगन अति । तपबल याही देह भये
क्षत्रिय ते ऋषि पति ॥ तेहि पुर प्रसिद्ध केशव सुमति
काल अतीतागतनिगुनि । तहँ अद्भुत गति पगु धारियो
विश्वामित्र पुनि ॥ २४ ॥ प्रज्झटिकाछन्द ॥ पुनि आये
सरयू सरित तीर तहँ देखे उज्ज्वल अमलनीर । नव नि-
रखि निरखि द्युति गति गंभीर । कछु बरनन लागे सुमति
धीर ॥ २५ ॥ अति निपट कुटिल गति यदपि आय ।
वह देत शुद्ध गति छुवत पाय ॥ कछु आपुन अध अध
गति चलन्ति । झलपति तन को ऊरध फलन्ति ॥ २६ ॥
मदमत्त यदपि मातंग संग । अति तदपि पतित पावन
तरंग बहु न्हाइ न्हाइ जेहि जल सनेह ॥ सब जात स्वर्ग
शूकर सुदेह ॥ २७ ॥
टी०-त्रिकाल दरशीत्व ते जेतो कालबीते रामचन्द्रको अवतार होनो रहै
सो कालअतीतकहे बीतो गुनिकै औ जा कालमें रामचन्द्रजू यज्ञरक्षा करनलायक
भये सो काल आगत आयो गुनिकै ॥ २४ ॥ २५ ॥ दुवौछंदन में विरोधा-
भास है आप कहे अपना औ आप कहे जल के छुवतही शुद्धगति मुक्ति देत है
अथवा जाके जलको कहूँ अनतहूँ छुवौ तौ शुद्धगति देतहै ऊरधपदते स्वर्ग
जानौं ॥ २६ ॥ मद मदिरा सों मत्त यद्यपि मातंग चाण्डालनको संग है
विरुद्धार्थः॥“मातंगःश्वपचीहस्तीत्यभिधानचिंतामणिः”॥औ मत्तगज जामें स्नान
करते हैं इत्यविरोधः पतितपावन कहे पतितन को पवित्र कर्ता स्नेह सों ताके
जलमें न्हाइन्हाइकै शूकरपर्यंत बहु प्राणी सुंदर देह को धरि सब स्वर्ग जातेहैं
अथवा सनेह कहे अप्सरादिकनके इति शेषः ॥ स्नेहसहित अर्थ अप्सरादि स्नेह
सहित ताको स्वर्ग लैजाती है अथवा तेहिके जलके स्नेहहूँ सों कहूं होइ सरयू
जलमें स्नेह करै स्वर्ग जाइ कहूं सदेहपात है देह सहित स्वर्ग जाइ अर्थ याही

( १४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
देहमें देवरूप ताको प्राप्त है जातहै जिनको देहत्यागहू को कष्ट नहीं होत इति
भावार्थः अथवा शूकर देह सहित जे जीव हैं ते स्वर्ग जातहै और देहधारी तौ
जातेही हैं ॥ २७ ॥
मू०-नवपदीछंद ॥ जहँ तहँ लसत महामदमत्त । वर
वारन वारन दलदत्त । अंग अंग चरचे अति चंदन । मुंडन
झुरके देखिय वंदन ॥ २८ ॥ दोहा ॥ दीह दीह दिग्गजन
के, केशव मनहुँ कुमार ॥ दीन्हीं राजा दशरथहि, दिगपाल
न उपहार ॥ २९ ॥ अरिल्लछंद ॥ देखि बाग अनुराग उप
जिय । बोलत कलध्वनि कोकिल सजिय ॥ राजति रति-
की सखी सुवेषनि । मनहुँ बहति मनमथ संदेशनि ॥ ३० ॥
टी०-ग्रामबाहर जहाँ तहाँ महावत हाथिनको फेरतहैं तिन का वर्णन है
सुमावोक्ति है अथवा स्थान पर बँधे हैं वारन हाथी तिनके दल चमू को अके
लेई दलि डारत हैं यासों अतिबली जानो अथवा बार कहे बेर नहीं लागति
शत्रुदलको दलि डारत हैं झुरके लगाये चन्दन रोरी ॥२८॥ दिक्पाल इन्द्रादि
उपहार भेंट ॥ २९ ॥ कल अव्यक्त मधुर ॥ ३० ॥
मू०-फूलि फूलि तरु फूल बढ़ावत । मोदत महामोद
उपजावत । उड़त परागन चित्त उठावत । भ्रमर भ्रमत
नहिं जीव भ्रमावत ॥ ३१ ॥ पादाकुलकछंद ॥ शुभ सर
शोभै मुनिमन लोभै । सरसिज फूले अलि रस भूले ॥ जल
चर डोलैं बहुखग बोलैं । बरणि न जाहीं उर अरु झाहीं ॥
॥ ३२ ॥ चतुष्पदीछंद ॥ देखीबनवारी चंचलभारी
तदपि तपोधन मानी । अति तपमय लेखी गृहथितपेखी जगत
दिगंबर जानी ॥ जग यदपि दिगंबरपुष्पवती नर निरखि
निरखि मन मोहै । पुनि पुष्पवती तन अति अति पावनगर्भ
सहित सब सोहै ॥ ३३ ॥

प्रथमप्रकाश: १. ( १५ )

टी०-मोदतकहे सुगंधको पसागत ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ द्वैछंदको अन्वय एक है
बनवारी कहे उपवन औ श्लेषते वनकी वारी कुमारी कुमारीपक्ष विरोध है वाटिका
पक्ष शुद्धार्थ है विरोधाभास अलंकार है चंचल स्वभाव चंचल औ वायु योग-
सां चंचलहै पत्तजाभारी कहे गरूहे देह जाकी और दीर्घवृक्षयुक्त तपोधन
तपस्विनी औ तपस्वी सम शीत घाम तोय दुःख सहनिहैं गृहघर और परिखा-
छार दिवालीति दिगंबर वस्त्र रहित दुवौ पक्ष में पुष्पवती रजो धर्मिणी औ प्रफु-
ल्लित तन अति कहे स्थूलकाय औ बहुत भूमि में विस्तार है जाको अति पावन
पवित्र अति दुवौ पक्ष में गर्व सहित गुर्विनी औ फलगर्भ सहित यासां सदा
फलोत्पत्ति जनायो रति रस सुरत औ प्रीति जग जन लीना अनेक पुरुष भोगिनी
परकीयाइति । औ जगके जनन करिकै युक्त अर्थ अति सुख पाइ जग जन
बैठत हैं जामें प्रवीना दोष रहित औ सर्वोत्तमा नवीनापाठ होइ तौ नवोढा औ
नूतनयनि आपनो पुरुष औ राजा सौंपीपति की औ स्त्री औ राजपत्नी ॥ ३३ ॥
मू०-पुनिगर्भ संयोगी रति रस भोगी जगजनलीन कहावै ।
गुणि जग जललीना नगरप्रवीना अति पतिके चित भावै ।
अति पतिहि रमावै चित्त भ्रमावै सौतिन प्रेम बढ़ावै । अब
योंदिनरातिन अद्भुतभाँतिन कविकुल कीरतिगावै ॥ ३४॥
हाकलिकाछंद ॥ संग लिये ऋषि शिष्यन घने पावक
सेतपतेजनिसने ॥ देखत सरिता उपवनभले । देखन अव-
धिपुरी कहँ चले ॥ ३५॥ मधुभारछंद ॥ ऊंचे अवास ।
बहु ध्वज प्रकाश ॥ शोभा विलास । शोभै अकास ॥ ३६ ॥
आभीरछन्द ॥ अति सुन्दर अति साधु । थिर न रहत पल
आधु । परमतपोमय मानि । दण्ड धारिनी जानि ॥ ३७ ॥
हरिगीत छन्द ॥ शुभद्रोण गिरिगण शिखर ऊपर उदित
औषधिसी गनौ । बहु वायु वश वारिद बहोरहि अरुझि
दामिनि द्युतिमनौ ॥ अति किधौं रुचिर प्रताप पावक

प्रकट सुरपुर की चली । यह किधौं सरित सुदेश मेरी करो
दिवि खेलित भली ॥ ३८ ॥
टी०-उपवन वाटिका ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ अवास पर ॥ ३६ ॥ दंडधारिणी हैं
दंडिन के ब्रत को धरे हैं दंडी दंड धरे रहते हैं ये दंड कहे ध्वजदंड धरे हैं कैसो
है ध्वजा औ दंडी अति सुंदर हैं सुवस्त्र रचित औ तपतेज करिः भव्यरूपहै साधु-
राग द्वेषरहित दुवौहैं थिरनरहत वायुयोगसों चंचलरहती हैं औ अनेक तीर्थनमें
फिरबो करतहै औ परमतपोमय है सदा शीत घाम तोयसहती हैं औ प्राणाया-
मादि अनेकतप करत हैं औ अर्थ विरोधाभास है विरोधार्थ अतिसाधु हैं औ पल
आधु थिर नहीं रहती तौ साधुविषे चंचलता विरोध है औ परम तपोमय कहे
बडे तपको करती है औ दंडधारिणी हैं दंडकहे राजदंड डांड इति धारण करता
है लेता है तो तपस्वीको दंडलेवो विरोधहै अविरुद्धार्थ प्रथमको ते जानो ॥३७॥
द्रोणगिरि सदृश मंदिर है शिखर अग्रभाग औषधि सरीस करचो तासों अरुण
पताका वर्णन जानो औ की दामिनी बिजुलीकी द्युतिहै अरुझि रही है तिनको
बारिदके वश्यहै अर्थ बारिद की आज्ञासों वायुवह कहे अनेक प्रकारसों बहोरत है
मेघनक पास लैजायो चहतहै यासों मंदिरनकी अति उच्चता जनायो प्रताप पावक
रघुवंशिन को इतिशेषः ॥ या प्रकार अरुणपताका पंक्ति को वर्णन करि यह पदसों
दूसरी श्वेतपताका पंक्तिको अवलोकि वर्णन लगे सो जानो मेरीकरी कहे बनाई
विश्वामित्र सृष्टिकरन लागे हैं तब नदी बनायोंहै सो आकाशमें हैं पुराणोक्त है
कवि प्रियाहूमें कह्यौहै कि, ऊँचे ऊँचे अटनिपताका अति ऊँची जनु कौशिक की
कीन्हीं गंगा खलँये तरल तर । अथवा मेरीकहेहमारी ‘भगिनीभगिनीतिशेषः’ ।
दिवि कहे दिव्यरूप कहे खेलतिहै आकाशमें कौशिकी नदीहै सो विश्वामित्रकी
भगिनीहै ॥ ३८ ॥
दोहा ॥ जातिजीतिकीरतिलई, शत्रुनकी बहुभाँति ॥
पुर पर बाँधी शोभिजै, मानो तिनकी पाँति ॥ ३९ ॥ त्रिभं-
गी छन्द ॥ सम सब घर शोभैं मुनि मन लोभैं रिपुगण छोभैं
देखि सबैं । बहु दुंदुभि बाजैं जनु घन गाजैं दिग्गज लाजैं
सुनत जबैं ॥ जहँतहँ श्रुति पढ़हीं विघ्न न बढ़हीं जैजस

प्रथमप्रकाशः १. ( १७ )
मढहीं सकल दिशा । सबई सब विधि छम बसत यथा
क्रम देवपुरी सम दिवस निशा ॥ ४० ॥
टी०-ताहीश्वेतपताका पंक्तिमें फेरि तर्क है ॥ ३९॥ द्वै छंदको अन्वय एकहै
क्षोभैहैं डरतैहैं हम समर्थ रातिउ दिन देवपुरी सम है यामें श्लेषार्थ हूहै कैसी देव-
पुरी औ अयोध्या है सम बराबरी है दिनराति जामें घटत बढ़त नहीं
छह महीना उत्तरायण दिन रहत है दक्षिणायन राति रहति है औ समहै
तुल्य आनंद दायक है रातिउ दिन जामें रात्रिहूको चौरादिको भय नाहीं होत
और अर्थ दुवोपक्षकही है ॥ ४० ॥
मू ०-कविकुल विद्याधर सकल कलाधर राजराजबरवेष
बने । गणपति सुखदायक पशुपति लायक शूर सहायक
कौन गने ॥ सेनापति बुधजन मंगल गुरु गण धर्मराज मन
बुद्धि घनी । बहु शुभ मनसाकर करुणामय अरु सुरतरं-
गिनी शोभसनी ॥ ४१ ॥
टी ०--फेरि कैसी है देवपुरी कवि शुक औ कुल कहे समूह विद्याधरनके
विद्याधर देवयोनि विशेष हैं औ सकल कलाधर चंद्रमा औ राजराज कुबेर ये
सब पवरद कहे सुंदरवेष कहे रूपसों बनैहैं औ सुखदायक जो गणपति गणेश हैं
औ लायक कहे श्रेष्ठ पशुपति महादेव हैं औ सूर कहे सूर्य औ जे इन्द्र
सहायक कामादि हैं तिन्हें को गनै अर्थ की अनेक हैं सेनापति स्वामिकार्तिक
औ बुधजन चन्द्र पुत्रजन पद इहाँ स्वरूपको वाची है औ मंगल भौम • औ
गुरु बृहस्पति औ गणकहै गणदेवता ॥ “आदित्यविश्ववसवस्तुषिताभास्वर।-
निलाः । महाराजिकसाध्याश्च रुद्राश्च गणदेवताः । इत्यमरः” औ मनमें बुद्धिहै
घनी जिनके ऐसे धर्मराज कहे यमराज हैं बहु शुभयुक्त हैं मनसाकर कहे
कल्पवृक्ष औ 'करुणामय कहे विष्णु औ सुरतरंगिनी आकाशगंगा इन सबकी
शोभा सों सनीहै अर्थ ये सब बसत हैं यामें अयोध्या कैसी है कवि काव्यकर्ता
वाल्मीकि सदृश औ विद्या चतुर्दश ॥ “अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसान्याय-
विस्तरः ॥ पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्याश्चैताश्चतुर्दशः” इति । मनुः ॥ अथवा
धनुर्विद्यादि तिनके धर्ता औ सकल कहे चौंसठिहू कलानके धर्ता औ राजराज
कहे बड़े राजा ते वरवेषसों बनेहैं अनेक राजा राजादशरथकी सेवामें हाजिर
२

Here is the line-by-line transcription of the text from the provided image:

( १८ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
पुरीमें बसे रहतहैं औ सुखदायक गणपति कहे यूथप औ लायक श्रेष्ठ पशुपति
गोपालादि अथवा गजादि औ सहायक कहे जे सबकी सहाय करत हैं ऐसे जे
शूर योद्धा हैं तिन्हें को गनै बहुत हैं औ सेनापति चमूनाथ बुधजन पंडित औ
मंगल पाठी औ गुरुगण वसिष्ठादि अथवा मंगल कर्ता जे गुरुगण वसिष्ठादिहैं
औ मनमें बुद्धि है घनी जाके ऐसो धर्मराज कहे न्यायदर्शी है कोतवालेति औ
बहुत प्राणी शुभ जो मनसा मनोभिलाष है ताके करनहार हैं अर्थ मनोरथके
दाता हैं औ बहुत करुणामय कहे दयाशील हैं. औ सुरतरंगिनी सरयू इनकी
शोभा सों सनी है अर्थ इन सबसों युक्त है ॥ ४१ ॥
मू०-हीरकछन्द ॥ पंडितगण मंडितगुण दंडित मति
देखिये। क्षत्रिय बर धर्म प्रवर क्रुद्ध समर लेखिये ॥ वैश्य
सहित सत्य रहित पाप प्रगट मानिये । शूद्र सकति विप्र
भगति जीव जगत जानिये ॥ ४२ ॥
टी०-पंडित पदते ब्राह्मण जानौ ते अनेक गुण जे शास्त्रादि हैं तिनसों
पंडित युक्त हैं औ दंडित हैं संक्षितहै मति जिनकी अर्थ सत् मति सों युक्तहैं
औ क्षत्रिय क्षत्र धर्म करिकै प्रवर बली हैं औ समरहीमें क्रोधकरत हैं औ
वैश्य बनिया सत्य सों युक्त हैं औ पापसों रहित हैं औ शूद्रन के जीवमें
ब्राह्मण की भक्तिज्ञ गति है ताही में तिनकी शक्तिबल जानियतहैं अर्थ शूद्र-
भक्ति युक्त ब्राह्मणकी सेवा करत है अथवा शूद्रनके जीवमें शक्ति कहे देवी
औ विप्रकी भक्ति जगतिहै शूद्रनको देवी औ ब्राह्मणनकी उपासना उचितहै
या प्रकार आपने अपने धर्म सों युक्त चारों वर्ण बसत हैं यामें ॥ ४२ ॥
मू०-सिंहविलोक्ति छंद ॥ अति मुनितन् मन तहँ
मोहि रह्यो । कछु बुधिवल वचन न जाइ कह्यो ॥ पशु
पक्षि नारि नर निरखि तबै । दिन रामचन्द्र गुण गनत सबै
॥ ४३ ॥ मरहट्टाछन्द ॥ अतिउच्च अगारनि बनी पगारनि
जनु चिंतामणि नारि । बहुशत मख धूपनिधूपित अंगनि
हरिकीसी अनुहारि । चित्रीबहु चित्रनि परम विचिन्त्रिनि

केशवदास निहारि । जनु विश्वरूप को अमल आरसी रची
विरंचि विचारि ॥ ४४ ॥ सोरठा ॥ जगयशवन्तविशाल,
राजादशरथकी पुरी ॥ चंद्रसहित सबकाल, भालथली जनु
ईशकी ॥ ४५ ॥
टी०-दिनकहे दिनप्रति ॥ ४३ ॥ बहुत जे अतिउच्च अपार घरहैं बहु पदको
संबंध सर्वत्र है तिनकी जे बनी पगार परिखा हैं छार देवालीति कहूं शिरवंदी
कहतहैं तिनमें लगी अनेक पुर कौतुक देखिवेकों चिंतामणि सदृश नारी स्त्री
ठाढी हैं चिंतामणि सदृश जिनको देखि मनोभिलाष पूरे होत हैं या प्रकारके
स्त्रीभवन हैं औ बहुत घरसत कहे उत्तम जे मख यज्ञहैं तिनके धूपन कहे धुमन
करिकै धूपित अंगनिसों युक्त हैं ते हरिविष्णुके अनुहारि हैं अर्थ श्यामरूप
हैं ऐसे यज्ञशाला हैं औ बहुत घर परम विचित्र कहे अद्भुत चित्रनिसों चित्रित
हैं तिन्हें मानो विरंचि ब्रह्मा विचारि एकाग्र चित्त करिकै विश्वरूप जो संसार
है अथवा विराट्‌रूप ताकी आरसी ऐना बनायो है जैसे ऐनामें बिम्ब सदृश
प्रतिबिम्ब देखि परतहै तैसे संसारमें जो वस्तु हैं सो सब मंदिरनमें चित्रित हैं
ऐसे चित्रशाला हैं पुरीमें पैठि तिन्हें विश्वामित्र निहारि कहे देखत भये ॥ ४४॥
जगमें विशाल सुंदर औ यशवन्त कहें यशयुक्त जो राजा दशरथकी पुरी है सो
सबकाल चन्द्रमा सहित मानो ईश महादेवकी भालथली है चन्द्र सरिस यश है
विशाल दुवौ हैं यासों सदा निष्कलंक यश पुरीको जनायो ॥ ४५ ॥
मृ०-कुंडलिया ॥ पंडितअति सिगरीपुरी, मनहु गिरागु
ति गूढ़ । सिंहनि युत जनु चंडिका, मोहति मूढ अमूढ़ ॥
मोहति मूढ़ अमूढ़, देव सँग दितिसों सोहै । सब शृंगार
सँदेह, मनोरति मन्मथ मोहै ॥ सब शृंगार सदेह सकल
सुख सुखमा मंडित । मनो शची विधिरची विविधि विधि
वरणत पंडित ॥ ४६ ॥
टी०-सिगरी पुरी अति पंडित है अर्थ पुरीके निवासी जनसब पंडित हैं
यासों मानों गति कहे दशा है गूढ जाकी अर्थरूपं पुरी है अपनी दशाको
छपाये मानो गिरा सरस्वतीहैं गिराहूके आसतजन अतिपंडित होतहैं अथवा

( २० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

मनहूँको औ गिराकहें वचननहूँकी गति है गूढजाकी कथ जाकीदशाको अंत-
मन वचन नहीं पावत चंडिकाको सिंहवाहन है औ विकराल रूपदेखि मूढ औ
अमूढके भयसे मोह होत है पुरी पुरुष सिंहन सों युक्त है औ अति विचित्र
शोभा निरखि मूढ अमूढ के आनंदसे मोह होत है अदितिके देवता पुत्र हैं
तासों संगमें देव रहत हैं इहाँ अदिति पदकी अकार को लोपहै भाषाके कविन को
नियम है कहूं अकारादि पदकी अकारको लोपकरि डारत हैं यथा बिहारी
कृतसप्तशतिकायां । “अधिकअँधेरो जगकरै, मिलिमावस रविचंद” अथवा
दिति दैत्यमाता सम है जैसे दितिसों बडेवीर दैत्यभये हैं तैसे अयोध्याहूमं अनेक
वीर उत्पन्न होतहैं रतिमन्मथ कामकी स्त्रीहै तासों मनको मोहति है पुरी शोभा-
सों कामहूको मन मोहति है तासों अति शोभा युक्त जानौ शची इन्द्राणिहूं
राज्यादि सबसुख औ सब सुखमा शोभासों मंडित है औ अनेक विधिसों पंडित
वर्णन करत है ऐसी पूरीहू है अथवा सुखमासों मंडित युक्त सकल जे सुख हैं
तिनसों शची कहे संचित पूँजी भूत मानौ विधातें रच्यो है अर्थ पूर्ण सुख औ
पूर्ण शोभा एकत्र करि ताहीको पुरी बनायो है ॥ ४६ ॥
मू०-काव्यछंद ॥ मूलनहींकोजहांअधोगतिकेशवगाइय ।
होमहुताशनधूमनगरएकैक मलिनाइय ॥ दुर्गतिदुर्गनहीं
जोकुटिलगतिसरितनहीमें । श्रीफलकोअभिलाषप्रगटकवि
कलके जीमें ॥ ४७ ॥ दोहा ॥ अतिचंचलजहँचंचलदलै,
विधवाबनी न नारि ॥ मनमोह्योऋषिराजको, अद्भुतनगर
निहारि ॥ ४८ ॥ सोरठा ॥ नागरनगरअपार, महामोहतम
मित्रसे । तृष्णालताकुठार, लोभसमुद्रअगस्त्यसे ॥ ४९ ॥
दोहा ॥ विश्वामित्रपवित्रमुनि, केशवबुद्धिउदार ॥ देखत
शोभानगरकी, गये राजदरबार ॥ ५० ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचंद्र
चंद्रिकायामिन्द्रजिद्विरचितायांविश्वामित्रस्याऽयो-
ध्यागमनंनामप्रथमःप्रकाशः ॥ १ ॥

द्वितीयप्रकाशः २. ( २१ )
टी०-मूलजर अधोगति नर्क औ नीचेको गति गमन हुताशन अग्नि दुर्गति
नर्क औ दुष्कारि कहेगति जिनमें कुटिलता इति श्री फलद्रव्य औ विल्वफल
कूचनकी उपमा देवेको परिसंख्यालंकार है ॥ ४७ ॥ चलदल पीपर वृक्षवनी
वाटिका सोइ विधवाहै याहूमें परिसंख्या है ॥ ४८ ॥ नागर प्रवीण मित्र सूर्य जो
सदा सब वस्तु पाइवेकी इच्छाहै सो तृष्णा जानो औ जो कछू वस्तु देखि
सुनिकै इच्छा चलै सो लोभ जानो ॥ ४९ ॥ ५० ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां प्रथमः प्रकाशः ॥ १ ॥
मू०-दोहा ॥ या द्वितीय प्रकाशमें, मुनि आगमन प्रकाश ॥
राजासों रचना वचन, राघव चलन विलास ॥ १ ॥
हंस छंद ॥ आवत जात राजके लोग । मूरति धारी मानहुँ
भोग ॥ २ ॥ मालतीछंद ॥ तहँदरबारी । सबसुखकारी ॥
कृतयुग कैसे । जनुजन वैसे ॥ ३ ॥ दोहा ॥ महिष मेष
मृग वृषभ कहुँ, भिरत मल्ल गजराज ॥ लरत कहूँ, पायक
नटत, बहु नर्तक नटराज ॥ ४ ॥ समानिका छंद ॥ देखि
देखिकै सभा । विप्र मोहियो प्रभा ॥ राजमंडली लसै ।
देवलोकको हँसै ॥ ५ ॥ मल्लिकाछंद ॥ देशदेशके नरेश ।
शोभिजैसैबैसुवेश ॥ जानियेनआदिअंत । कौनदासकौन
संत ॥ ६ ॥ दोहा ॥ शोभितबैठे तेहिसभा, सातद्वीपके
भूप ॥ तहँराजादशरथलसै, देवदेव अनुरूप ॥ ७ ॥ देखि
तिन्हैंतबदूरिते, गुदरानो प्रतिहार ॥ आयेविश्वामित्रजू, जनु
दूजोकरतार ॥ ८ ॥ उठिदौरेनृपसुनतहीं, जाइगहेतबपाइ ॥
लै आयेभीतरभवन, ज्यौंसुरगुरुसुरराइ ॥ ९ ॥ सोरठा ॥
सभामध्येबैताल, ताहिसमयसोपढिउठ्यो ॥ केशवबुद्धिवि-
शाल, सुंदरमूरतिभूपसो ॥ १० ॥

( २२ ) राजचन्द्रिका-सटीक ।
टी०-॥ १ ॥ २ ॥ कृतयुग सत्ययुग ॥ ३ ॥ मल्ल बाहु युद्धंकर पायक
पटंवाज नटककहे नाचत हैं नर्तक नृत्यकारी ॥ ४ ॥ ५ ॥ जहाँ सिंहासनमें
राजा दशरथ बैठे हैं सो आदिहै तहाँते जहाँ पर्यंत दरबारी बैठे हैं सो अंत है
सो आदिते अंततक दरबारिनमें कौन दास कहे सेवकहै औ कौन संत कहे स्वामीहै
यह नहीं जानियत अर्थ सब दरबारी राजसाज सँवारे हैं। “सद्भिद्यमाने सत्ये च
प्रशस्तांचितसाधुषु” इत्यभिधानचिंतामणिः ॥ इहाँ अर्चितपदको पर्याय
स्वामीजानो ॥ ६ ॥ देवदेव इंद्र ॥ ७ ॥ गुदरानो जाहिर कियो करतार
ब्रह्मा ॥ ८ ॥ ९ ॥ बेताल भाट ॥ १० ॥
मू०-बैतालाघनाक्षरी ॥ बिधिके समानहैंविमानीकृतरा-
जहंस, विविधविबुधयुतमेरुसो अचलहै । दीपतिदीपतिअ-
तिसातौंदीपदीपियतु, दूसरोदिलीपसोसुदक्षिणाकोबलहै ।
सागरउजागरकीबहुवाहिनीकोपति, छनदानप्रियकियौसूर-
जअमलहै । सबविधिसमरथराजैराजादशरथ भगीरथपथ-
गामीगंगाकैसोजलहै ॥ ११ ॥ दोहा ॥ यद्यपिईंधनजरिगये,
अरिगणकेशवदास ॥ तदपिप्रतापानलनके, पलपल बढ़त
प्रकाश ॥ १२ ॥ तोमरछन्द ॥ बहुभाँतिपूजिसुराई । कर-
जोरिकैपरेपाई ॥ हँसिके कह्योऋषिमित्र । अबबैठराजप-
वित्र ॥ १३ ॥ मुनिसुनिदानमानसहंस । रघुवंशके अवतंस ॥
मनमाँहजोअतिनेहु । यकबातमाँगिदेहु ॥ १४ ॥
टीका-बिमानी कृत कहं वाहनी कृतहैं राजहंस जिन करिकै ब्रह्माको हंस-
वाहन है और राजा विमानीकृत कहे मानरहित कियेहैं राजनकेहंस जीवजिनक-
रिकै अथवा विमानीकृत वाहनीकृतहैं राजनके हंसजीव जिन करिकै अर्थ--शत्रु
भयसों मित्र प्रेम सों मनमें चढ़ाये रहत है विबुध देवता औ पंडित दिलीप की
स्त्रीको सुदक्षिणा नाम रह्यो ताके पातिब्रत को बल रह्यो औ सुष्ठु जो दक्षिणा
दानद्रव्यहै वाहिनी नदी औ चमूक्षण दारा त्रिनहौ हे प्रिय ! जाकी सूरजके अमल-
में अर्थ सूर्यके प्रकाशमें रात्रिको नाश होत है अथवा क्षणनदान कहे जलांजलि

द्वितीयप्रकाशः २. (२३)

दान औ क्षणक्षण प्रतिहैं दानही प्रिय जिनको क्षणक्षण में दानदीवो करत हैं
गंगाजल सगर के सुतन के तारिवेको भागीरथके पीछे पीछे आयौ है औ राजा
कुल पंथ गामी हैं श्लेष धर्मोपमा हैं कोउ परंपरित रूपक कहत हैं ॥ ११॥१२॥
ऋषिनमें मित्र सूर्यसम हैं ॥ १३ ॥ दानरूपी जो मानस मानसर है ताके तुम
हंस हौ अर्थ दानहीं में है विहार जिनको वडेदाता हौ अवतंस कर्ण-
भूषण ॥ १४ ॥
मू०-राजा-अमृतगतिछंद ॥ सुमितमहामुनिसुनिये ।
तनमनधनसबगुनिये ॥ मनमहँहोइसोकहिये । धनिसोजोआ
पुनलहिये ॥ १५ ॥ ऋषिदोधकछंद ॥ रामभयेजवनेवन
माहीं । राक्षसकैरवैरैवहुधाहीं ॥ रामकुमारहमैंनृपदीजै । तौ
परिपूरणयज्ञकरीजै ॥ १६॥ तोटकछंद॥ यहबातसुनीनृपनाथ
जबै । शरसेलगेआखरचित्तसबै ॥ मुखतेकछुबातनजाइक
ही । अपराधविनाऋषिदेहदही ॥ १७ ॥ राजा-अतिकोम
लकैसबबालकता ॥ बहुदुष्करराक्षसघालकता ॥ हमहींच
लिहैक़षिसंगअबै । सजिसैनचलैचतुरंगसबै ॥ १८ ॥ वि-
श्वामित्र-षट्पद ॥ जिनहाथनहठिहरषि हनतहरिणी-
रिपुनन्दनि ॥ तिननकरतसंहारकहाँमदमत्तगयन्दनि॥जिनवे
धतसुखलक्षलक्षनृपकुँवरकुँवरमनि । तिनबाणनिवारहबा
घमारतनहिंसिंहनि । नृपनाथनाथदशरथसुनियअकथक
थायहमानिये । मृगराजराजकुलकलशअबबालकवृद्धन
जानिये ॥ १९ ॥
टीका-जो वस्तु आप लहिये लीजिये सो धन्यहै ॥ १५ ॥ रामपरशुराम ॥
॥ १६ ॥ १७ ॥ हाथी घोडा रथ पियादा चारों सेनाके अंग हैं ॥ १८ ॥
हरिणीके साहचर्यते रिपुपद ते हरिणी रिपु कहे सिंहजानौ जिन हाथन सिंह
हरिणी मारत हैं तिन सों कहा गजनको नहीं मारत अर्थ गजहू मारत है औ
कुँवरन में मणिश्रेष्ठ ऐसे नृपकुँवर जिन बाणनि सुख कहे सहजही लक्ष कहे

( २४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
लाखन लक्ष निशाना बेधत हैं तिनसों वाराह वाघसिंहनहूंको नहीं मारत अर्थ
मारत हैं हे नृपनाथ ! यह कथा अकथ कहे अतर्क मानौ निश्चय इति । अथवा
अकथकहे अद्भुत जो यह कथा है ताकी मानिबेकहे निश्चय मानौ आशय यह
रामचन्द्र राक्षसनको वध करिहैं यामें संदेह ना करौ ॥ १९ ॥
सुंदरीछंद ॥ राजनमें तुमराजबड़ेअति । मैंमुखमाँगों
सोदेहुमहामति ॥ देवसहायकहौंनृपनायक । हैयहकारज
रामहिंलायक ॥ २० ॥ राजा-मैंजोकह्योऋषिदेनसोलीजि
य । काजकरोहठभूलिनकीजिय ॥ प्राणदियेधनजाहिंदि
येसब । केशवरामनजाहिंदियेअब ॥ २१ ॥ ऋषिराजतज्यौं
धनधामतज्यौंसब । नारितजी सुतशोचतज्यौंतब ॥ आपन-
पौजोतज्यौजगवंदहैं । सत्यनएकतज्यौहरिचंदहैं ॥ २२ ॥
टी०-॥ २० ॥ २१ ॥ एकसमय इन्द्र नारदसों हरिश्चन्द्रके सत्यप्रतापादिको
माहात्म्य सुनि इंद्रासन लेबेको भयमानि दुःखितभयेहैं तब ब्रह्मादि देवन इंद्रको
धीरजदैकै हरिश्चंद्रके सत्वभंगकरिवेकेलिये नारदको विश्वामित्रकेपासपठायो
विश्वामित्र नारद मुखसों देवनकी आज्ञासुनि काहूकामरूपी राक्षसको बोलाइ
कह्यो कि तू शूकर रूपह्वै अयोध्या में जाइ राजा हरिश्चंद्र को मृगया मिष
हमारे आश्रम में ल्याउ राक्षस सोकियो विश्वामित्रके आश्रममें राजाको ल्याइ
लुप्त भयो आश्चर्य युक्त ह्वै राजा आश्रम नदी में न्हाइ कपट द्विजरूपधारि
विश्वामित्र को सब पृथिवी औ सर्वस्वदान करचो है फेरि विश्वामित्र कह्यो है
कि शतभार सुवर्ण दक्षिणा देउ तौ सर्वस्वलेउ नाहिं तौ सत्यको छोड़ो तब
काशीमें जाइकै मदना नामस्त्री औ रोहिताश्व नामा पुत्रको देवशर्मा ब्राह्म-
णके हाथ साठिभार सुवर्ण को बेंच्यो है औ चालिस भार सुवर्ण को कालसेन
चांडाल के हाथ अपना बिकाई सौभार सुवर्ण विश्वामित्र को दियो फेरि
चांडालकी आज्ञाते श्मशान घाटपर उचित द्रव्यलेबेको बैठेहैं कछू दिनमें पुष्प
तोरत मैं रोहिताश्व को सर्प काट्यो मरचौ ताको लै मदना बहाइबे को गई
तहाँ चांडालको उचित पंचमुद्रा लैहि कै बहावन दियौहै या प्रकार सुतको
शोच छोड़चौ सत्यपाल्यो यह संक्षेप कथा लिख्यो है विशेष सो हरिश्चंद्रो-
पाख्यान पुराणनमें प्रसिद्ध है ॥ २२ ॥

•मू०-राजवैहवैहसाजवहैपुर । नामवैहवहधामवैहैगुर ॥
झूठेसोंझूठई बांधतहौमन । छोड़तहौनृपसत्यसनातन ॥२३॥
॥ दोहा ॥ जान्योविश्वामित्रके, कोपबढ्योउरआइ । राजा-
दशरथसों कह्यो, वचनवशिष्ट बनाइ ॥ २४ ॥ षटपद ॥
इनहींकेतपतेजयज्ञकीरक्षाकरिहैं । इनहींकेतपतेज सकलरा-
क्षसबलहरिहैं ॥ इनहीकेतपतेजबढिहै तनतूरण । इनहीकेतप
तेज होहिंगेमंगलपूरण । कहिकेशवजैयुतआइहैंइनहीकेतपते-
ज घर । नृपबेगिराम लक्ष्मण दुवौसौंपौविश्वामित्रकर ॥२५॥
टी०-साजछत्र चामर चमू आदि नाम यश गुरु वशिष्ठ झूठे जे पुत्रादि
हैं तिनसों झूठई कहे वृथाहैी मनको बांधतहौ लगावतहौ अथवा
झूठेसां कहे झूठे न सहित है अर्थ पुत्रादि झूठे माया के प्रपंच हैं तिनसों मिलिकै
झूठइ जो झुठाई है तासों मनको बांधत हौ अर्थ की ना बांधौ अथवा झूठेकी सो
कहें झूठेकी तरह जैसे झूठामाणी झूठाइमें मनलगावतहै तैसे तुमहूं लगावतहौ
औ सनातन कहे परंपराको सत्य छोड़त हौ देनकहि अब नहीं देत सो ना
चाहिये ॥ २३ ॥ २४ ॥ तेजप्रताप तूरन जलदी मंगल विवाहादि ॥ २५ ॥
म०-सोरठा ॥ ॥राजाऔरनमित्र, जानहुँ विश्वामित्रसे ॥
जिनकोअमितचरित्र, रामचन्द्रमय मानिये ॥२६॥ दोहा ॥
नृपपैवचनवशिष्ठको, कैसेमेटयोजाइ ॥ सौंप्यो विश्वामित्र
कर, रामचन्द्रअकुलाइ ॥ २७ ॥ पंकजवाटिकाछंद ॥ राम-
चलत नृपके युगलोचन । वारिभरितभये वारिदरोजन ॥
पायनपरिकृषिकेसजिमौनाहिं । केशवउठिगयेभीतरभौनाहिं ॥
॥ २८ ॥ चामरछन्द ॥ वेदमंत्रतंत्रशोधिअस्त्रशस्त्रदैभले ॥
रामचन्द्रलक्ष्मणैसोविप्रक्षिप्रलैचले ॥ लोभक्षोभमोहगर्वका
मकामनाहई । नींदभूखप्यासत्रासवासनासवेगई ॥ २९ ॥
टी०-राक्षसवधमें अमित कहे संपूर्ण जो चरित्र हैं सो राम-चन्द्रमय कहे
रामचन्द्रचरित्र मय रामचन्द्र चरित स्वरूपति जिनको विश्वामित्रहीको चरित्र-

मानौ अर्थ जो राक्षसवधमें वा वेधनादिकृत रामचन्द्र करि हैं सो कृत रामचन्द्र
द्वार है विश्वामित्रही करि हैं आशय यह कि यामें कछू श्रम रामचंद्र को नहीं
है ये केवल तुम्हारे पुत्रको यश दियो चाहत हैं याते इन सम मित्र दूसरो न जानौ
अथवा रामचन्द्रमय कहे रामचन्द्र प्रति समर्पित मानिये अर्थ जो करत है सो
रामचन्द्र को समर्पण करत हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥ वारि जलसों भरित रोचनकों
वारिद मेघ भये अरुण रंग हैं आंशुनकी वर्षा करन लागे ॥ २८ ॥ वेदके मंत्र
औ तन्त्र शास्त्र के मन्त्र शोधि शोधि कै दियो अथवा वेदके मंत्र दिये बलातिबला
विद्या दियो है सो वाल्मीकीयरामायणमें लिख्यौ है औ तंत्रशास्त्रके मंत्रनसों
शोधिकै मंत्रि करिकै अस्त्रशस्त्र दिये क्षिप्र कहे जल्दी तिन विद्यानके प्रभाव सों
लोभादिक वासना दूरि भई यथा । रघुवंशे । “ तौ बलातिबलयोः प्रभावतो
विच्ययोः पथि मुनिप्रदिष्टयोः । मम्लतुर्न मणिकुट्टिमोर्जितो मातृपार्श्वपरिवर्त्ति
नाविव ” ॥ २९॥
मू०-निशिपालिकाछन्द ॥ कामवनरामसबबासतहरुदे-
खियो । नैनसुखदैनमनमैनमलैलेखियो । ईशजहँकाम-
तनु कैअतनुडारियो । छोडिवहयज्ञथलकेशवनिहारियो॥३०॥
दोहा ॥ रामचंद्रलक्ष्मणसहित, तनमन अतिसुखपाइ ॥
देख्यो विश्वामित्रको, परमतपोवनजाइ ॥ ३१ ॥
इंति श्रीमत्सकलो कलोचनचकोरचिन्तामणि-श्रीरामचन्द्रचन्द्रिकाया-
मिंद्रजिद्विरचितायां रामचन्द्रलक्ष्मणयोर्विश्वामित्रतपो वनगमनं
नाम द्वितीयः प्रकाशः ॥ २ ॥
टी०-जा वनमें महादेव कामको जारयो है ताको कामवन नाम है अथवा
कामवन कहे अभिलाषको दाता वनतवनमें रामचन्द्र सब वास कहे ऋषिन के
वास कुटीति औ तरुवृक्ष देख्यो अथवा वासतरु सुगंधयुक्त तरुमैनमय कहे काम
स्वरूपता बनमें ईश महादेव जहाँ जा स्थान में काम को जारयो हैता स्थानको
देखि छोडिकै विश्वामित्र को यज्ञ थल जाइकै देख्यो ॥ ३० ॥ ३१.॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां द्वितीयःप्रकाशः ॥ २ ॥

•मू०-॥ दोहा ॥ कथातृतीयप्रकाशमें, वनवर्णनशु-
भजानि ॥ रक्षणयज्ञमुनीशको, श्रवणस्वयंवरमानि ॥ १ ॥
षट्पद ॥ तरुतालीसतमालतालहिंतालमनोहर । मंजुलबंजु
लतिलककलकुचकुलनारिकेरवर ॥ एलाललितलवंगसंगपुं
गीफलसीहैं । सारीशुककुलकलितचित्तकोकिलअलिमोहैं ॥
शुभराजहंसकलहंसकुलनाचतमत्तमयूरगन । अतिप्रफु-
लितफलितसदारहैकेशवदासविचित्रवन॥२॥सुप्रियाछंद ॥ क
हुँद्विजगणमिलिसुखश्रुतिपढहीं । कहुँहरिहरिहरहररटरटहीं ॥
कहुँमृगपतिमृगशिशुपयपियहीं । कहुँमुनिगणचितवतहरि
हियहीं॥३॥नराचछंद ॥ बिचारमानब्रह्मदेवअर्चमानमानिये ।
अदीयमानदुःखसुखदीयमानजानिये ॥ अदंडमानदीनगर्व
दंडमानभेदवै । अपठ्यमानपापग्रन्थपठ्यमानवेदवै ॥ ४ ॥
टी०-तालीश वृक्ष विशेष हिंताल खजूरिवंजुल अशोक लकुच बडहर ॥ १ ॥
मृगपति पढते सिंहकी स्त्री पुरुष जातिमात्र जानौ अर्थ सिंहिनीन को पय दूध
मृग बालक पियत हैं यासों यां जनायो कि जहाँ सहजहूं बैर नहीं है कृत्रिमकी
कहावत ह औ कहुंतेई मृग शिशु मुनिन के हियको हरिकै मुनिन की ओर चित-
वत हैं यासों मृग बालकन की अति सुन्दरता जानौ ॥ २ ॥ ३ ॥ जहाँ सदा ब्रह्म
जो वेद है सोई विचार्यमान है विचारचो जात है अथवा परब्रह्म देव पढते यहां
विष्णु जानौ अथवा सदेवयासों या जनायो कि सुदेव सेवामें सब रहत हैं कोऊ
कुदेव यक्षिणी आदि की सेवा नहीं करत औ दुःख अदीयमान है कोऊ काहू को
दुःख नेंहा देत सुख दीयमान है दीन अदंडमान है दीन को कोऊ दंड ताडन
नहीं करत औ वै कहे निश्चय करत औ बै कहे निश्चय करि गर्व औ भेददंड-
मान है पाप ग्रंथ मारन मोहनादिके ग्रंथ अपठ्यमान हैं कोऊ नहीं पढत ॥ ४ ॥
मू०-विशेषकछंद ॥ साधुकथाकथियेतहँकेशवदासजहाँ ।
विग्रहकेवलहैमनकोदिनमानतहां ॥ पावनवाससदाऋषिको
सुखकोबरषै । कोबरनैकविताहिविलोक तजीहरषै ॥ ५ ॥

(२८) रामचन्द्रिका-सटीक ।
चंचला ॥ रक्षिवेकोयज्ञकुलबैठेवीर सावधान । होंनलगेहो-
मकेजहांतहांसबैविधान ॥ भीमभाँति ताड़ुकासो भंगलागिक-
र्नआइ । वाननानिरानपै ननारिजानि छाँडिजाइ ॥ ६ ॥
ऋषि-सोरठा ॥ कर्मकरतियहघोर, विप्रनकोदशहूदिशा ।
मत्तसहसगजजोर, नारीजानिनछाँडिये ॥ ७ ॥ राम-शशिव-
दना ॥ सुनुमुनिराई जगसुखदाई । कहिअबसोई । जेहि
यशहोई ॥ ८ ॥ ऋषि-कुंडलिया ॥ सुताविरोचनकीहुतीदी-
रघजिह्वानाम् । सुरनायकहैसंहरीपरमपापिनीवाम ॥ पर-
मपापिनीबाम बहुरिउपजीकविमाता । नारायणसोहतीचक्र
चिंतामणिदाता ॥ नारायणसोहती सकलद्विजदूषणसंयुत ।
त्योंअबत्रिभुवननाथ ताड़कातारुहसहसुत ॥ ९ ॥
टीका-साधु कथा उत्तम कथा विष्णुविषयकीनी आदि अथवा साधु जे संत-
जन हैं नारदादि तिनकी कथा तहाँ तेहि आश्रम में मुनि जनन करि कै कथिये
कथन करियतहैं औ जहाँ केवल मनही को निग्रहहै मनइंद्रिन को राजा है
मनके निग्रहसों सब इन्द्रिनंको निग्रह जानो औ तहां मानदिनहीं के है और
काहूके नाहीं है दिनपक्ष में मानप्रमाण दिन मान कैतो है यह पूछिवे की रीति
लोकमें प्रसिद्ध है अन्यत्र मानगर्व परिसंख्यालंकार है अथवा दिनही को मान
आदर है यज्ञादिसत्कर्म दिनही में होत हैं तासो ॥ ५ ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥
विरोचन बलिके पिताकी सुता दीरघजिह्वानामा पापिनी रही ताको सुरनायक
इंद्र मारचो है औ फेरि अति पापिनी कविजे शुक्र हैं तिनकी माता भई ताको
नारायण मारचो है एक समय देवनके युद्ध में हारिकै दैत्य ब्राह्मणके शरणमें
बचिवो जानिकैं शुक्र माताके शरण जाइ लुकाने तहां शत्रुको रक्षक जानि
इंद्रकी आज्ञा सों विष्णु शुक्र माता को शिर चक्रसे खंडन करि दैत्यनको
मारचो है ताही कोपसों भृगुमुनि जाइ विष्णुके उरमें लात मारचो है औ आपने
पुत्र शुक्र को दैत्यगुरु कियो है यह कथा पुराणनमें प्रसिद्धहैं कैसे हैं नारायण
चिन्तामणि के दाता हैं अथवा चिंतामणि सरिस दातहैं सकल द्विज दूषण
संयुत ताड़ुका को विशेषण है औ सहसुत कहे मारीच सहित यासों या जनायो
इन्द्र विष्णुहूं दुष्टस्त्री वध कियो है ॥ ९ ॥