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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

तृतीयप्रकाशः ३. ( ३१ )
हैं कि, ईश जे विधाता हैं ते मानो जुन्हाई सों मंडिकै युक्त करिकै वसुधा पृथ्वी-
में सुधाधर चंद्रमा को मंडल कहे परिवेष सुधारि कहे सुधारयो बनायो है जोत्स्ना-
युक्त चंद्रपरिवेष सम कहे मंचावली की अति श्वेतता जनायो ईश बनायो सम-
कहे अति रुचिर रचना जनायो औ देव सरिस राजकुमार हैं देवमन्दिरसरिसमंचा-
वलीजानो ॥ १६ ॥ पंचालिका नृत्यकी जातिविशेष है अपार कर कहे हस्तक
भेदोंसों संकलित युक्त ॥ १७ ॥ १८ ॥ सुरभि कहे वसंतरूपी जो स्वंयवर है
त्यहि मानो रसाल आँब की शाखा को मुकुलित बौरयुक्त कर्यो है जैसे
वसंतमें आँबकी शाखा बौरति है तैसे धनुष उठाइवे को मोद करि बाहु रोमा-
ञ्चित भयो अथवा सुरभीरूपी जो है स्वयं कहे अपना त्यहि वर कहे सुंदर रसाल
शाख को मुकुलित किये हैं ॥ १९ ॥
मू०-विमति-सोरठा । ज्यहिंयशपरिमलमत्त, चंचरीक
चारणफिरत ।। दिशिविदिशिनअनुरक्त, सोतौमलिकापीडनृप
॥२०॥ सुमति-दोहा॥ जाकेसुखमुखवासते,वासितहोतदिगंत
सोपुनिकहयहकौन नृप, शोभितशोभअनंत ॥ २१ ॥ विम-
ति-सोरठा ॥ राजराजदिगबाम । भाललाललोभीसदा ॥ अति
प्रसिद्धजगनाम । काश्मीरकोतिलकयह ॥ २२ ॥
टी०-पांचछंदनमें विमतिके पांचप्रश्नोंकोश्लेषसों उत्तरदियो है मल्लिका नामा
जो पर्वत है ताको आपीड कहे शिखा भूषण है अर्थ मल्लिक पर्वतको राजा
है । यथाचपद्मपुराणे । “मल्लिकाख्यो महाशैलो मोक्षदः पश्यतां नृणाम् । यत्रांगे-
षु नृणांतोयं श्यामं वा निर्मलम्भवेत् । पातकस्यापहारीदं मया दृष्टं तु तीर्थकम्”
॥ ४ ॥ औ मल्लिका जो चंबेलीहैं ताको आपीड शिखा भूषण बेनी मालादि
“शिखास्वापीडशेखरौ । इत्यमरः” कैसो है राजा औ मालती माला ज्यहिं के
यशरूपी जो परिमल सुगंध है तासों मत्त चंचरीक भ्रमर सदृश जे चारण
भाट हैं ते दिशि विदिशिन में अनुरक्त संलग्न फिरत हैं अर्थ जाको यश दिशि
विदिशिन में भाट गावत फिरत हैं औ यश अर्थ सदृश जो परिमल . सुगंध है
तामें मत्त चारण सदृश जे चंचरीक भ्रमर हैं ते दिशि विदिशिन में अनुरक्त
फिरत हैं ॥ अर्थ जाके सुगंधमें मत्त ह्वै भ्रमर दिशि विदिशिन में उडत
फिरत हैं ॥ २० ॥ सुख कहे सहज मुख के वास सुगंध ते ॥ २१ ॥