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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 269 में से

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पृष्ठ 41

चतुर्थप्रकाशः ४. ( ३५ )
टी०-जो या धनुषको उठाइ है ताको नृपकन्या ब्याहार्थ पुष्पमाला पहिराइ
है ऐसे विमतिके बचन सुनि सब गजसमाज समूह धनुष उठाईवेमें उद्यम कहे उपा-
यकरत भये परन्तु शरासन नेकु आसनकोहू न छोड़न भया अर्थ रंचकहूं ना उठयो
॥ ३३ ॥ जब धनुष काहूसों न उठयो तब क्रोधयुक्त ह्वै विमति कह्यो धनुष उठा
इबे में राजकुमारन शक्तिबल नहीं कियो धनुष की भक्ति कियो है काहेकी
धनुष बनायो औ बलमात्र सबके शीशनवत भये तौ जाकी जो भक्ति करत
है ताको शीश नवावत प्रनाम करत हैं तासों आप खर गर्दभमें चढे अर्थ-गर्दभमें
चढेप्राणी सब निन्दित भये ॥ ३४ ॥ किनि च्वै गई कहे गर्भ पतन काहे
ना भयो ॥ ३५ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननी जनकजानकी जानकीजानिप्रसादाय जानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्ति प्रकाशिकाया तृतीयः प्रकाशः ॥ ३ ॥
दोहा ॥ कथाचतुर्थप्रकाशमें, बाणासुरसम्बाद ॥ रावणसों
अरुधनुषसों; दशमुखबाणविषाद ॥ १ ॥ सबहीकोसमुझे
उसबन, बलबिक्रमपरिमाण ॥ सभामध्यताहीसमय; आये
रावणबाण ॥ २ ॥ डिल्लाछंद ॥ नरनारिसबै । भयभीत
तबै ॥ अचरिज्जुयहै ॥ सबदेखिकहै ॥ ३ ॥ दोहा ॥ हैरा
कसदशशीशको, दैयतबाहुहजार ॥ कियोसबनिकेचित्त
रस, अद्भुतभयसंसार ॥ ४ ॥ रावण-बिजोहाछंद ॥ शंभु
कोदंडदै राजपुत्रीकितै ॥ टूकद्वैतीनिकै जाहुंलंकाहितै ॥ ५ ॥
विमति-शशिबदनाछंद ॥ दशशिरआवो । धनुषउठावो ॥
कछुबलकीजै । जगयशलजै ॥ ६ ॥ बाण-गीतिका
छंद ॥ दशकंठरेशठछाँड़िदेहठबारबारनबोलिये । अब
आजुराजसमाजमेंबलसाजचित्तनडोलिये॥गिरिराजतेगुरुजा-
नियेसुरराजकोधनुहाथल्रै । सुखपायताहिचढ़ायकैघरजाहि
रे यश साथलै ॥ ७ ॥