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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 269 में से

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पृष्ठ 30

( २४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
लाखन लक्ष निशाना बेधत हैं तिनसों वाराह वाघसिंहनहूंको नहीं मारत अर्थ
मारत हैं हे नृपनाथ ! यह कथा अकथ कहे अतर्क मानौ निश्चय इति । अथवा
अकथकहे अद्भुत जो यह कथा है ताकी मानिबेकहे निश्चय मानौ आशय यह
रामचन्द्र राक्षसनको वध करिहैं यामें संदेह ना करौ ॥ १९ ॥
सुंदरीछंद ॥ राजनमें तुमराजबड़ेअति । मैंमुखमाँगों
सोदेहुमहामति ॥ देवसहायकहौंनृपनायक । हैयहकारज
रामहिंलायक ॥ २० ॥ राजा-मैंजोकह्योऋषिदेनसोलीजि
य । काजकरोहठभूलिनकीजिय ॥ प्राणदियेधनजाहिंदि
येसब । केशवरामनजाहिंदियेअब ॥ २१ ॥ ऋषिराजतज्यौं
धनधामतज्यौंसब । नारितजी सुतशोचतज्यौंतब ॥ आपन-
पौजोतज्यौजगवंदहैं । सत्यनएकतज्यौहरिचंदहैं ॥ २२ ॥
टी०-॥ २० ॥ २१ ॥ एकसमय इन्द्र नारदसों हरिश्चन्द्रके सत्यप्रतापादिको
माहात्म्य सुनि इंद्रासन लेबेको भयमानि दुःखितभयेहैं तब ब्रह्मादि देवन इंद्रको
धीरजदैकै हरिश्चंद्रके सत्वभंगकरिवेकेलिये नारदको विश्वामित्रकेपासपठायो
विश्वामित्र नारद मुखसों देवनकी आज्ञासुनि काहूकामरूपी राक्षसको बोलाइ
कह्यो कि तू शूकर रूपह्वै अयोध्या में जाइ राजा हरिश्चंद्र को मृगया मिष
हमारे आश्रम में ल्याउ राक्षस सोकियो विश्वामित्रके आश्रममें राजाको ल्याइ
लुप्त भयो आश्चर्य युक्त ह्वै राजा आश्रम नदी में न्हाइ कपट द्विजरूपधारि
विश्वामित्र को सब पृथिवी औ सर्वस्वदान करचो है फेरि विश्वामित्र कह्यो है
कि शतभार सुवर्ण दक्षिणा देउ तौ सर्वस्वलेउ नाहिं तौ सत्यको छोड़ो तब
काशीमें जाइकै मदना नामस्त्री औ रोहिताश्व नामा पुत्रको देवशर्मा ब्राह्म-
णके हाथ साठिभार सुवर्ण को बेंच्यो है औ चालिस भार सुवर्ण को कालसेन
चांडाल के हाथ अपना बिकाई सौभार सुवर्ण विश्वामित्र को दियो फेरि
चांडालकी आज्ञाते श्मशान घाटपर उचित द्रव्यलेबेको बैठेहैं कछू दिनमें पुष्प
तोरत मैं रोहिताश्व को सर्प काट्यो मरचौ ताको लै मदना बहाइबे को गई
तहाँ चांडालको उचित पंचमुद्रा लैहि कै बहावन दियौहै या प्रकार सुतको
शोच छोड़चौ सत्यपाल्यो यह संक्षेप कथा लिख्यो है विशेष सो हरिश्चंद्रो-
पाख्यान पुराणनमें प्रसिद्ध है ॥ २२ ॥