रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें•मू०-॥ दोहा ॥ कथातृतीयप्रकाशमें, वनवर्णनशु-
भजानि ॥ रक्षणयज्ञमुनीशको, श्रवणस्वयंवरमानि ॥ १ ॥
षट्पद ॥ तरुतालीसतमालतालहिंतालमनोहर । मंजुलबंजु
लतिलककलकुचकुलनारिकेरवर ॥ एलाललितलवंगसंगपुं
गीफलसीहैं । सारीशुककुलकलितचित्तकोकिलअलिमोहैं ॥
शुभराजहंसकलहंसकुलनाचतमत्तमयूरगन । अतिप्रफु-
लितफलितसदारहैकेशवदासविचित्रवन॥२॥सुप्रियाछंद ॥ क
हुँद्विजगणमिलिसुखश्रुतिपढहीं । कहुँहरिहरिहरहररटरटहीं ॥
कहुँमृगपतिमृगशिशुपयपियहीं । कहुँमुनिगणचितवतहरि
हियहीं॥३॥नराचछंद ॥ बिचारमानब्रह्मदेवअर्चमानमानिये ।
अदीयमानदुःखसुखदीयमानजानिये ॥ अदंडमानदीनगर्व
दंडमानभेदवै । अपठ्यमानपापग्रन्थपठ्यमानवेदवै ॥ ४ ॥
टी०-तालीश वृक्ष विशेष हिंताल खजूरिवंजुल अशोक लकुच बडहर ॥ १ ॥
मृगपति पढते सिंहकी स्त्री पुरुष जातिमात्र जानौ अर्थ सिंहिनीन को पय दूध
मृग बालक पियत हैं यासों यां जनायो कि जहाँ सहजहूं बैर नहीं है कृत्रिमकी
कहावत ह औ कहुंतेई मृग शिशु मुनिन के हियको हरिकै मुनिन की ओर चित-
वत हैं यासों मृग बालकन की अति सुन्दरता जानौ ॥ २ ॥ ३ ॥ जहाँ सदा ब्रह्म
जो वेद है सोई विचार्यमान है विचारचो जात है अथवा परब्रह्म देव पढते यहां
विष्णु जानौ अथवा सदेवयासों या जनायो कि सुदेव सेवामें सब रहत हैं कोऊ
कुदेव यक्षिणी आदि की सेवा नहीं करत औ दुःख अदीयमान है कोऊ काहू को
दुःख नेंहा देत सुख दीयमान है दीन अदंडमान है दीन को कोऊ दंड ताडन
नहीं करत औ वै कहे निश्चय करत औ बै कहे निश्चय करि गर्व औ भेददंड-
मान है पाप ग्रंथ मारन मोहनादिके ग्रंथ अपठ्यमान हैं कोऊ नहीं पढत ॥ ४ ॥
मू०-विशेषकछंद ॥ साधुकथाकथियेतहँकेशवदासजहाँ ।
विग्रहकेवलहैमनकोदिनमानतहां ॥ पावनवाससदाऋषिको
सुखकोबरषै । कोबरनैकविताहिविलोक तजीहरषै ॥ ५ ॥