रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयप्रकाशः २. (२३)
दान औ क्षणक्षण प्रतिहैं दानही प्रिय जिनको क्षणक्षण में दानदीवो करत हैं
गंगाजल सगर के सुतन के तारिवेको भागीरथके पीछे पीछे आयौ है औ राजा
कुल पंथ गामी हैं श्लेष धर्मोपमा हैं कोउ परंपरित रूपक कहत हैं ॥ ११॥१२॥
ऋषिनमें मित्र सूर्यसम हैं ॥ १३ ॥ दानरूपी जो मानस मानसर है ताके तुम
हंस हौ अर्थ दानहीं में है विहार जिनको वडेदाता हौ अवतंस कर्ण-
भूषण ॥ १४ ॥
मू०-राजा-अमृतगतिछंद ॥ सुमितमहामुनिसुनिये ।
तनमनधनसबगुनिये ॥ मनमहँहोइसोकहिये । धनिसोजोआ
पुनलहिये ॥ १५ ॥ ऋषिदोधकछंद ॥ रामभयेजवनेवन
माहीं । राक्षसकैरवैरैवहुधाहीं ॥ रामकुमारहमैंनृपदीजै । तौ
परिपूरणयज्ञकरीजै ॥ १६॥ तोटकछंद॥ यहबातसुनीनृपनाथ
जबै । शरसेलगेआखरचित्तसबै ॥ मुखतेकछुबातनजाइक
ही । अपराधविनाऋषिदेहदही ॥ १७ ॥ राजा-अतिकोम
लकैसबबालकता ॥ बहुदुष्करराक्षसघालकता ॥ हमहींच
लिहैक़षिसंगअबै । सजिसैनचलैचतुरंगसबै ॥ १८ ॥ वि-
श्वामित्र-षट्पद ॥ जिनहाथनहठिहरषि हनतहरिणी-
रिपुनन्दनि ॥ तिननकरतसंहारकहाँमदमत्तगयन्दनि॥जिनवे
धतसुखलक्षलक्षनृपकुँवरकुँवरमनि । तिनबाणनिवारहबा
घमारतनहिंसिंहनि । नृपनाथनाथदशरथसुनियअकथक
थायहमानिये । मृगराजराजकुलकलशअबबालकवृद्धन
जानिये ॥ १९ ॥
टीका-जो वस्तु आप लहिये लीजिये सो धन्यहै ॥ १५ ॥ रामपरशुराम ॥
॥ १६ ॥ १७ ॥ हाथी घोडा रथ पियादा चारों सेनाके अंग हैं ॥ १८ ॥
हरिणीके साहचर्यते रिपुपद ते हरिणी रिपु कहे सिंहजानौ जिन हाथन सिंह
हरिणी मारत हैं तिन सों कहा गजनको नहीं मारत अर्थ गजहू मारत है औ
कुँवरन में मणिश्रेष्ठ ऐसे नृपकुँवर जिन बाणनि सुख कहे सहजही लक्ष कहे