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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 269 में से

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पृष्ठ 25

केशवदास निहारि । जनु विश्वरूप को अमल आरसी रची
विरंचि विचारि ॥ ४४ ॥ सोरठा ॥ जगयशवन्तविशाल,
राजादशरथकी पुरी ॥ चंद्रसहित सबकाल, भालथली जनु
ईशकी ॥ ४५ ॥
टी०-दिनकहे दिनप्रति ॥ ४३ ॥ बहुत जे अतिउच्च अपार घरहैं बहु पदको
संबंध सर्वत्र है तिनकी जे बनी पगार परिखा हैं छार देवालीति कहूं शिरवंदी
कहतहैं तिनमें लगी अनेक पुर कौतुक देखिवेकों चिंतामणि सदृश नारी स्त्री
ठाढी हैं चिंतामणि सदृश जिनको देखि मनोभिलाष पूरे होत हैं या प्रकारके
स्त्रीभवन हैं औ बहुत घरसत कहे उत्तम जे मख यज्ञहैं तिनके धूपन कहे धुमन
करिकै धूपित अंगनिसों युक्त हैं ते हरिविष्णुके अनुहारि हैं अर्थ श्यामरूप
हैं ऐसे यज्ञशाला हैं औ बहुत घर परम विचित्र कहे अद्भुत चित्रनिसों चित्रित
हैं तिन्हें मानो विरंचि ब्रह्मा विचारि एकाग्र चित्त करिकै विश्वरूप जो संसार
है अथवा विराट्‌रूप ताकी आरसी ऐना बनायो है जैसे ऐनामें बिम्ब सदृश
प्रतिबिम्ब देखि परतहै तैसे संसारमें जो वस्तु हैं सो सब मंदिरनमें चित्रित हैं
ऐसे चित्रशाला हैं पुरीमें पैठि तिन्हें विश्वामित्र निहारि कहे देखत भये ॥ ४४॥
जगमें विशाल सुंदर औ यशवन्त कहें यशयुक्त जो राजा दशरथकी पुरी है सो
सबकाल चन्द्रमा सहित मानो ईश महादेवकी भालथली है चन्द्र सरिस यश है
विशाल दुवौ हैं यासों सदा निष्कलंक यश पुरीको जनायो ॥ ४५ ॥
मृ०-कुंडलिया ॥ पंडितअति सिगरीपुरी, मनहु गिरागु
ति गूढ़ । सिंहनि युत जनु चंडिका, मोहति मूढ अमूढ़ ॥
मोहति मूढ़ अमूढ़, देव सँग दितिसों सोहै । सब शृंगार
सँदेह, मनोरति मन्मथ मोहै ॥ सब शृंगार सदेह सकल
सुख सुखमा मंडित । मनो शची विधिरची विविधि विधि
वरणत पंडित ॥ ४६ ॥
टी०-सिगरी पुरी अति पंडित है अर्थ पुरीके निवासी जनसब पंडित हैं
यासों मानों गति कहे दशा है गूढ जाकी अर्थरूपं पुरी है अपनी दशाको
छपाये मानो गिरा सरस्वतीहैं गिराहूके आसतजन अतिपंडित होतहैं अथवा