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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 269 में से

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पृष्ठ 26

( २० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

मनहूँको औ गिराकहें वचननहूँकी गति है गूढजाकी कथ जाकीदशाको अंत-
मन वचन नहीं पावत चंडिकाको सिंहवाहन है औ विकराल रूपदेखि मूढ औ
अमूढके भयसे मोह होत है पुरी पुरुष सिंहन सों युक्त है औ अति विचित्र
शोभा निरखि मूढ अमूढ के आनंदसे मोह होत है अदितिके देवता पुत्र हैं
तासों संगमें देव रहत हैं इहाँ अदिति पदकी अकार को लोपहै भाषाके कविन को
नियम है कहूं अकारादि पदकी अकारको लोपकरि डारत हैं यथा बिहारी
कृतसप्तशतिकायां । “अधिकअँधेरो जगकरै, मिलिमावस रविचंद” अथवा
दिति दैत्यमाता सम है जैसे दितिसों बडेवीर दैत्यभये हैं तैसे अयोध्याहूमं अनेक
वीर उत्पन्न होतहैं रतिमन्मथ कामकी स्त्रीहै तासों मनको मोहति है पुरी शोभा-
सों कामहूको मन मोहति है तासों अति शोभा युक्त जानौ शची इन्द्राणिहूं
राज्यादि सबसुख औ सब सुखमा शोभासों मंडित है औ अनेक विधिसों पंडित
वर्णन करत है ऐसी पूरीहू है अथवा सुखमासों मंडित युक्त सकल जे सुख हैं
तिनसों शची कहे संचित पूँजी भूत मानौ विधातें रच्यो है अर्थ पूर्ण सुख औ
पूर्ण शोभा एकत्र करि ताहीको पुरी बनायो है ॥ ४६ ॥
मू०-काव्यछंद ॥ मूलनहींकोजहांअधोगतिकेशवगाइय ।
होमहुताशनधूमनगरएकैक मलिनाइय ॥ दुर्गतिदुर्गनहीं
जोकुटिलगतिसरितनहीमें । श्रीफलकोअभिलाषप्रगटकवि
कलके जीमें ॥ ४७ ॥ दोहा ॥ अतिचंचलजहँचंचलदलै,
विधवाबनी न नारि ॥ मनमोह्योऋषिराजको, अद्भुतनगर
निहारि ॥ ४८ ॥ सोरठा ॥ नागरनगरअपार, महामोहतम
मित्रसे । तृष्णालताकुठार, लोभसमुद्रअगस्त्यसे ॥ ४९ ॥
दोहा ॥ विश्वामित्रपवित्रमुनि, केशवबुद्धिउदार ॥ देखत
शोभानगरकी, गये राजदरबार ॥ ५० ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचंद्र
चंद्रिकायामिन्द्रजिद्विरचितायांविश्वामित्रस्याऽयो-
ध्यागमनंनामप्रथमःप्रकाशः ॥ १ ॥