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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

षष्ठोऽङ्कः [ १६१
अम्ब ! यद् भ्रातृस्नेहात् समुत्पन्नमन्युना मया। दूषितात्रभवती, तत् सर्वं
मर्षयितव्यम् । अम्ब ! अभिवादये । (चरणयोः पतति)
कैकेयी—जाद ! का णाम माता पुत्तअस्स अवराहं ण मरिसेदि ? उट्ठेहि
उट्ठेहि । को एत्थ दोसो ? [जात ! का नाम माता पुत्रस्यापराधं न
मर्षयति ? कोऽत्र दोषः ?]
हिन्दी रूपान्तर—
भरत—निश्चय से यह बहुत अधिक कष्ट की बात है ।
कैकेयी—पुत्र ! इसी कारण मैंने आपको अपराधी बनाकर प्रिय पुत्र राम
को वन भेजा था, किसी राज्य के लालच से नहीं भेजा था । महर्षि का शाप
अवश्यंभावी था और पुत्र को परदेस भेजे बिना उसका परिहार नहीं हो सकता था ।
भरत—तो हम दोनों पुत्रों, मेरा और राम का प्रवास बराबर ही होता ।
मुझको वन किस कारण नहीं भेजा ?
कैकेयी—पुत्र ! तुम मामा के घर रह रहे थे, अतः महाराज को तुम्हारे
प्रवास का अभ्यास हो गया था ।
भरत—तो फिर चौदह वर्ष की अवधि किसलिये निर्धारित की थी ।
कैकेयी—पुत्र ! मैं चौदह दिन की अवधि कहना चाहती थी, परन्तु हृदय के
व्याकुल हो जाने के कारण चौदह वर्ष, इस प्रकार कह दिया ।
भरत—यही स्त्रियों की चतुराई है । इस पर अच्छी प्रकार विचार करना
चाहिये और यह बात क्या गुरुजनों को विदित है ?
सुमन्त्र—कुमार ! वसिष्ठ, वामदेव आदि गुरुजनों ने इसकी अनुमति दी थी
और यह बात उनको विदित है ।
भरत—अहोभाग्य है। ये तो निश्चय से तीनों लोकों के साक्षी हैं । भाग्य से
आप निरपराध हैं । मातः ! भाई के प्रति स्नेह के कारण मुझको क्रोध उत्पन्न हो
गया था और मैंने आदरणीया आप पर दोष लगाया था, उसको आप क्षमा कर
दीजिये । हे मातः ! मैं आपका अभिवादन करता हूँ। (पैरों में गिरता है)
कैकेयी—पुत्र ! कौनसी ऐसी माता है, जो प्रिय पुत्र के अपराध को क्षमा
नहीं कर देगी ? उठो, उठो । इसमें कौनसा दोष है ?
टिप्पणी—
पुत्रको रामो वनं प्रेषितः न खलु राज्यलोभेन—यहाँ कैकेयी अपनी सफाई
देने तथा अपने को निरपराध सिद्ध करने के लिये बता रही है कि मैंने राज्य का
लोभ नहीं किया था । राम भी मुझको पुत्र की तरह प्रिय हैं। वे मेरे प्रिय पुत्र ही
हैं । महर्षि के शाप का परिहार करने के लिये ही मैंने उनको वन भेजा था । पति
की हितकामना के कारण ही मैंने अपने को अपराधी बनाया ।

१६२ ] प्रतिमानाटकम्
प्रकृतिभूतस्ते विप्रवासः—भरत को फिर भी आशंका रही और उन्होंने कहा
कि मैं भी पुत्र था और राम भी पुत्र थे । मुझको ही क्यों नहीं वन भेज दिया ।
कैकेयी कहती है कि तुम बहुत समय से मामा के घर रह रहे थे । अतः महाराज को
तुम्हारे वियोग का अभ्यास हो गया था । अतः तुम्हारे वन भेजने से शाप का परिहार
नहीं हो सकता था । प्रकृतिभूतः = स्वभावतामापन्नः । अप्रकृतिः प्रकृतिः भूतः =
प्रकृति + च्वि + भूत = प्रकृतीभूत । वि + प्र + वस् + घञ् = विप्रवास ।
पर्याकुलहृदया—भरत को फिर भी शंका बनी रही कि कैकेयी का हृदय
दूषित था । उसने चौदह वर्ष की लम्बी अवधि क्यों नियत की । कैकेयी बताती है कि
वह चौदह दिन की अवधि कहना चाहती थी । परन्तु उस समय उसका हृदय बहुत
व्याकुल था और चौदह दिन के स्थान पर मुख से चौदह वर्ष निकल गये । पर्याकुलं
हृदयं यस्याः तया = पर्याकुलहृदयया । परितः आकुलम् = पर्याकुलम् । √ हृ + क्यन्
(दुक् का आगम) = हृदय ।
अस्ति पाण्डित्यम्—भरत को अभी भी शंका है । वह जानता है कि स्त्रियाँ
बातें बनाने में बहुत चतुर होती हैं । अतः वह कैकेयी के कथन पर और भी विचार
करना चाहता है ।
त्रैलोक्यसाक्षिणः—त्रयाणां लोकानां समाहारः = त्रैलोक्यम् । सह अक्षि यस्य
= सह + अक्षि + इनि = साक्षिन् । वसिष्ठ, वामदेव आदि पर विश्वास करना ही
चाहिये । अब भरत को माता की बात पर विश्वास होता है । वह ग्लानि से भर
जाता है कि उसने माता को व्यर्थ ही दोष लगाया । वह क्षमा माँगता है ।
--❖--
भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि । आपृच्छाम्यत्रभवतीम् । अद्यैवाहमार्यस्य
साहाय्यार्थं कृत्स्नं राजमण्डलमुद्योजयामि । अयमिदानीम्—
वेलामिमां मत्तगजान्धकारां
करोमि सैन्यौघनिवेशनद्धांम् ।
बलैस्तरङ्गैश्च नयामि तुल्यं
ग्लानिं समुद्रं सह रावणेन ॥१६॥
[अन्वयः—इमां वेलां मत्तगजान्धकारां सैन्यौघनिवेशनद्धां करोमि । तरङ्गैः
बलैः च रावणेन सह समुद्रं तुल्यं ग्लानिं नयामि ॥१६॥]
हिन्दी रूपान्तर—
भरत—मैं अनुगृहीत हो गया हूँ । आदरणीया आपसे मैं पूछ रहा हूँ । आज
ही मैं आर्य राम की सहायता के लिये सारे राजाओं को सन्नद्ध करता हूँ । अब
यह मैं—
अर्थ [श्लोक १६]—इस समुद्रतट को मैं अपने मतवाले हाथियों के द्वारा

षष्ठोऽङ्कः [ १६३
अन्धकारयुक्त करता हूँ और सैन्यसमूह का शिविर लगाकर इससे सन्नद्ध कर रहा
हूँ । समुद्र को पार करती हुई सेनाओं के द्वारा रावण के साथ ही समुद्र को
भी समान रूप से पराजित किये देता हूँ ॥१६॥
संस्कृत व्याख्या—इमाम् एनां वेलां समुद्रतटं, यस्मात् स्थानात् लङ्का रावण-
राजधानी आक्रमितुं शक्यते तां समुद्रतटवर्तिनीं भूमिम् अहं मत्तगजान्धकारां मत्तैः
मदजलस्रवणदक्षैः गजैः करिभिः अन्धकाराम् अन्धकारयुक्तां श्यामलवर्णां करोमि ।
मदीयैः कृष्णवर्णैः मदजलस्राविभिः गजैः समुद्रतटे तमसो व्याप्तिरिव भविष्यति ।
पुनश्च सैन्यौघनिवेशनद्धां सैन्यानां चमूनाम् ओघस्य समूहस्य निवेशेन शिविरस्थापनेन
नद्धां व्याप्तां करोमि । समुद्रतटे सैन्यस्य शिविरं मया स्थाप्यते तदनन्तरं तरद्भिः
सागरं प्लवमानैः बलैः सैन्यैः रावणेन दशाननेन सह समुद्रं पयोनिधि तुल्यं समकालमेव
ग्लानिं पराजयजनितहर्षक्षयतां नयामि प्रापयामि । समुद्रसन्तरणसमकालमेव रावणं
पराजित्य तं शोकभाजन्तां नयामि ॥१६॥
व्याकरण—मत्तैः गजैः अन्धकाराम् = मत्तगजान्धकाराम् । अन्धं करोति =
अन्ध + √कृ + अण् = अन्धकार । सैन्यानाम् ओघस्य निवेशेन नद्धाम् । √नह् +
क्त + टाप् = नद्धा । ग्लै + क्तिन् = ग्लानि ।
छन्दः—उपजाति ।
अलंकार—सहोक्ति । रावणेन सह समुद्रम् में सहोक्ति अलंकार है ।
❖-❖-❖
अये शब्द इव । तूर्णं ज्ञायतां शब्दः ।
(प्रविश्य)
प्रतिहारी—जेदु कुमारो । इमं वृत्तन्तं सुणिअ जेट्ठभट्टिणी मोहं गदा ।
[जयतु कुमारः । इमं वृत्तान्तं श्रुत्वा ज्येष्ठभट्टिनी मोहं गता ।]
कैकेयी—हम् ।
भरतः—कथं मोहमुपगताम्बा ?
कैकेयी—एहि, जाद ! अय्यां अस्सासइस्सामो । [एहि जात ! आर्या-
माश्वासयिष्यावः ।]
भरतः—यदाज्ञापयत्यम्बा ।
(निष्क्रान्ताः सर्वे)
हिन्दी रूपान्तर
अरे, शब्द सा हो रहा है । शीघ्र ही शब्द का कारण पता करो ।

१६४ ] प्रतिमानाटकम्
(प्रवेश करके)
प्रतिहारी—कुमार की जय हो । इस वृत्तान्त को सुनकर बड़ी स्वामिनी
कौसल्या मूच्छित हो गई हैं ।
कैकेयी—हैं ?
भरत—क्या कहा, माता मूर्च्छित हो गई हैं ?
कैकेयी—पुत्र ! आओ । आर्या को आश्वासित करें ।
भरत—माता का जैसा आदेश है ।
(सब निकल जाते हैं)
टिप्पणी—
आर्यस्य साहाय्यार्थम्—कैकेयी का स्पष्टीकरण होने के बाद भरत तुरन्त ही
राम की सहायता के लिये जाना चाहते हैं और इसके लिये माता कैकेयी से अनुमति
मांगते हैं ।
ज्येष्ठभट्टिनी—ज्येष्ठा चासौ भट्टिनी । बड़ी रानी कौसल्या ।
॥ इति षष्ठोऽङ्कः ॥
॥ छटा अंक पूरा हुआ ॥
इति भासविरचितप्रतिमानाटके डा० कृष्णकुमारकृत व्याख्यायाः
षष्ठोऽङ्कः समाप्तः

सप्तमोऽङ्कः
(ततः प्रविशति तापसः)
तापसः—नन्दिलक ! नन्दिलक !
(प्रविश्य)
नन्दिलकः—अय्य ! अअं ह्मि । [आर्य ! अयमस्मि ।]
तापसः—नन्दिलक ! कुलपतिर्विज्ञापयति—एष खलु स्वदारापहारिणं
त्रैलोक्यविद्रावणं रावणं नाशयित्वा, राक्षसगणविरुद्धवृत्तं गुणगणविभूषणं
विभीषणमभिषिच्य देवदेवर्षिसिद्धविमलचारित्रां तत्रभवतीं सीतामादाय,
ऋक्षराक्षसवानरमुख्यैः परिवृतः सम्प्राप्तस्तत्रभवान् शरद्विमलगगनचन्द्राभिरामो
रामः । तदद्यास्मिन्नाश्रमपदेऽस्मद्विभवेन यत् सङ्कल्पयितव्यं, तत् सर्वं
सञ्जीक्रियतामिति ।
नन्दिलकः—अय्य ! सव्वं सञ्जीकिदं । किन्तु, [आर्य ! सर्वं
सञ्जीकृतं किन्तु,]
तापसः—किमेतत् ?
नन्दिलकः—एत्थ विभीषणकेरआ रक्खसा । तेसं भक्खणणिमित्तं कुलवदी
पमाणं [अत्र विभीषणसम्बन्धिनो राक्षसाः । तेषां भक्षणनिमित्तं कुलपतिः
प्रमाणम् ।]
हिन्दी रूपान्तर—
(तदनन्तर तपस्वी प्रवेश करता है)
तपस्वी—नन्दिलक ! हे नन्दिलक !
(प्रवेश करके)
नन्दिलक—आर्य ! मैं यह हूँ।
तपस्वी—नन्दिलक ! कुलपति आदेश देते हैं—अपनी पत्नी का अपहरण
करने वाले और तीनों लोकों को भयभीत करने वाले रावण का विनाश करके;
राक्षसों के चरित्र के प्रतिकूल शुद्ध आचरण वाले और गुणों के समूह से अलंकृत
विभीषण का लङ्का में राज्याभिषेक करके ; देवताओं, देवर्षियों तथा सिद्धों के समक्ष
निर्मल चरित्र को प्रतिपादित करने वाली आदरणीया सीता को लेकर प्रमुख रीछों,
राक्षसों और वानरों से घिरे हुये; शरत्कालीन निर्मल आकाश के चन्द्रमा के समान

१६६ ] प्रतिमानाटकम्
सबको आनन्दित करने वाले ये आदरणीय राम यहाँ आ रहे हैं । तो आज इस
आश्रम में, हमारे तपोवन के ऐश्वर्य के योग्य अर्थात् वन में सुलभ जो भी सामग्रियाँ
अभीष्ट हो सकती हैं, उन सबकों तैयार कर लिया जावे ।
नन्दिलक—आर्य ! सब कुछ तैयार कर लिया है । किन्तु,
तपस्वी—किन्तु, यह क्या बात है ?
नन्दिलक—यहाँ विभीषण से सम्बन्धित राक्षस भी आये हैं। उनके भोजन
के लिये क्या सामग्री हो, इसमें कुलपति ही प्रमाण हैं।
टिप्पणी—
स्वदारापहारिणम्—स्वकीयान् दारान् अपहर्तुं शीलं यस्य तम् = स्व +
दार + अप + हृ + णिनि = स्वदारापहारिन् ।
त्रैलोक्यविद्राविणम्—त्रैलोक्यं विद्रावयितुं शीलं यस्य तम् = त्रैलोक्य + वि +
द्रु + णिच् + णिनि = त्रैलोक्यविद्राविन् ।
देवदेवर्षिसिद्धविमलचारित्राम्—दैवैः, देवर्षिभिः सिद्धैश्च प्रतिपादितं विमलं
चारित्रं यस्याः तादृशीम् । सीता के चरित्र पर राम ने सन्देह किया था । देवताओं ने
उसके चरित्र की निर्मलता प्रतिपादित की थी ।
शरद्विमलगगनचन्द्राभिरामः—शरदि विमले गगने चन्द्र इव अभिरामः ।
अभिरामयति = अभि + रम् + घञ् = अभिराम ।
अस्मद्विभवेन—आश्रम में वन्य फल-मूल = जल ही उपलब्ध होते हैं । वही
वहाँ का ऐश्वर्य है । उससे ही राम के आतिथ्य का प्रबन्ध किया जावे ।
विभीषणसम्बन्धिनो राक्षसाः—राक्षस नरमांस का भक्षण करते हैं । अतः
उनको भोजन में क्या दिया जावे, यह नन्दिलक को आशंका थी ।
तापसः—किमर्थम् ?
नन्दिलकः—ते खु खज्जन्ति । [ते खलु खादन्ति]
तापसः—अलमलं सम्भ्रमेण । विभीषणविधेयाः खलु राक्षसाः ।
नन्दिलकः—णमो रक्खससज्जणाअ । [नमो राक्षससज्जनायं]
(निष्क्रान्तः)
तापसः—(विलोक्य) अये अत्र भवान् राघवः ? य एषः—
जयः स्याद् द्वितीयस्तवारि-
स्तवभवतु विधया भूमिरैकातपत्रा ।
इति मुनिभिरनेकः स्तूयमानः प्रसन्नैः
क्षितितलमवतीर्णो मानवेन्द्रो विमानात् ॥१॥

सप्तमोऽङ्कः [ १६७
जयतु भवान् जयतु । (निष्क्रान्तः) ।
(मिश्रविष्कम्भकः)
[अन्वयः—नरवर ! जय । द्वितीयः अरिः तव जेयः स्यात् । एकातपत्रा भूमिः
तव विधेया भवतु । इति अनेकैः प्रसन्नैः मुनिभिः स्तूयमानः मानवेन्द्रः विमानात्
क्षितितलम् अवतीर्णः ॥१॥]
हिन्दी रूपान्तर—
तपस्वी—किसलिये यह कह रहे हो ?
नन्दिकलक—वे निश्चय से खाते हैं ।
तपस्वी—घबराओ नहीं । ये राक्षस निश्चय से विभीषण के आज्ञाकारी हैं ।
नन्दिलक—राक्षसों में सज्जन विभीषण को नमस्कार है ।
(निकल जाता है)
तपस्वी—(देखकर) ये आदरणीय राम हैं । जो कि ये—
अर्थ [श्लोक १]—मनुष्यों में श्रेष्ठ हे राम ! आपकी जय हो । रावण के
अतिरिक्त दूसरे भी जो आपके शत्रु हों, उनको आप जीत लें । एकछत्र वाली यह
पृथिवी आपके वशवर्तिनी हो । इस प्रकार अनेक प्रसन्न मुनियों के द्वारा स्तुति किये
जाते हुये, मनुष्यों के राजा राम पुष्पक विमान से पृथिवीतल पर उतर
आये हैं ॥१॥
जय हो, आपकी जय हो ।
(निकल जाता है)
(मिश्रविष्कम्भक पूरा हुआ)
संस्कृत-व्याख्या—नरवर ! नरेषु मनुष्येषु वरश्रेष्ठ हे राम ! जय तव
विजयी भवतु । त्वं सर्वोत्कृष्टरूपेण वर्तसे इत्यर्थः । द्वितीयः रावणपेक्षया यः कश्चिद्
अन्योऽपि तव ते अरिः शत्रुः वर्तते स जेयः तव शक्त्या पराभवितुं योग्यः स्यात्
'भवेत् । एकातपत्रा एकमेव आतपत्रं राजछत्रं यत्र तथाभूता एकराजाधीना इयं भूमिः
धरणी तव विधेया वशवर्तिनी भवतु । तवैकस्यैव राज्ञः आधिपत्ये स्थिता भूमिः
भवतु तत्रत्याश्च सर्वे लोकास्ते विधेयाः भवन्तु । इति अनेन प्रकारेण अदेकैः बहुभिः
मुनिभिः ऋषिभिः स्तूयमानः वन्द्यमानः, रावणवधसन्तुष्टैः अत एव रामदर्शनप्रसन्नैः
मुनिभिः प्रशस्यमानः मानवेन्द्रः मानवानां मनुष्याणाम् इन्द्रः राजा रामः विमानात्
पुष्पकाभिधेयाद् व्योमयानात् क्षितितलं पृथिवीतलम् अवतीर्णः अवतरन्
अवलोक्यते ॥१॥
व्याकरण—√जि+यत्=जेय । वि+√धा+यत्=विधेय । आतपात्
त्रायते=आतप+त्रै+क=आतपत्र । प्र+सद्+क्त=प्रसन्न । अव+√तृ+
क्त=अवतीर्ण ।
छन्दः—मालिनी ।
मिश्रविष्कम्भक—इस विष्कम्भक में मध्यम तथा नीच कोटि के पात्रों का

१६८ ] प्रतिमानाटकम्
प्रयोग हुआ है। अतः यह मिश्रविष्कम्भक है। इसके द्वारा छठे और सातवें अंक
के मध्य की घटना का बोध होता है। सीता का अपहरण होने के बाद लंका पर
आक्रमण करके राम ने रावण को मार डाला, विभीषण का राज्याभिषेक किया और
सीता को साथ लेकर, वानरों आदि के साथ पुष्पक विमान पर बैठ कर वे अयोध्या
की ओर चले तथा मार्ग में जनस्थान में ऋषियों के आश्रम में उतरे ।
-०-०-०-
(ततः प्रविशति रामः)
रामः—भोः—
समुदितबलवीर्यं रावणं नाशयित्वा
जगति गुणसमग्रां प्राप्य सीतां विशुद्धाम् ।
वचनमपि गुरूणामन्तःशः पूरयित्वा
मुनिजनवनवासं प्राप्तवानस्मि भूयः ॥२॥
[अन्वयः—समुदितबलवीर्यं रावणं नाशयित्वा, जगति गुणसमग्रां विशुद्धां
सीतां प्राप्य, अन्तःशः गुरूणाम् अपि वचनं पूरयित्वा भूयः मुनिजनवनवासं
प्राप्तवान् अस्मि ॥२॥]
हिन्दी-रूपान्तर—
(तदनन्तर राम प्रवेश करते हैं)
राम—हे लोगों !
अर्थ [श्लोक २]—बहुत अधिक बल और पराक्रम से युक्त, रावण का
विनाश करके, संसार में समग्र गुणों से विभूषित निर्मल चरित्र वाली सीता को प्राप्त
करके, अन्त में गुरुजनों के वचन को भी पूरा करके, मैं पुनः मुनियों के तपोवन में
आ पहुँचा हूँ ॥२॥
संस्कृत-व्याख्या—समुदितबलवीर्यं समुदितम् अत्यधिकमुन्नतं बलं शारीरिकं
सामर्थ्यं सेना वा वीर्यं पराक्रमं च यस्य तादृशं रावणं दशाननं नाशयित्वा समूलं वधं
विधाय, जगति अस्मिन् लोके गुणसमग्रां समग्रगुणविभूषितां विशुद्धां निर्मलचारित्रां
सीतां जानकीं प्राप्य लब्ध्वा, अन्तःशः अन्त यावत् गुरूणां गुरुजनानां पित्रादीनां वचनम्
आज्ञां चतुर्दश वर्षाणि यावत् वने वासः कर्तव्य इत्यादेशं पूरयित्वा पालनं कृत्वा भूयः
पुनरपि मुनिजनवनवासं मुनिजनानाम् ऋषीणां वनवासम् अरण्यनिवासं तपोवनं
प्राप्तवान् अस्मि समागतः अस्मि । मया प्रबलपराक्रमी रावणो हतः, विशुद्धचरित्रा
सीता पुनः प्राप्ता, गुरूणामपि वनवासस्यादेशः पूरितः । पुनश्च अहमस्मिन् मुनिजना-
ध्युषिताश्रमपदे सम्प्राप्तः । एवं सर्वप्रकारेण कृतकृत्योऽहं सञ्जातः इति रामस्य
अभिप्रायः ॥२.।

सप्तमोऽङ्कः । १६६
व्याकरण —समुदितं बलं वीर्यं च यस्य तम् = समुदितबलवीर्यम् । सम् +
उद् + √इ + क्त = समुदित । गुणाः समग्राः यस्यां ताम् = गुणसमग्राम् । समं सकलं
यथा स्यात् गृह्यते = सम + √ग्रह् + ड (टि का लोप) = समग्र ।
छन्दः—मालिनी
••••••
तापसीनामभिवादनार्थमभ्यन्तरं प्रविष्टा चिरायते खलु मैथिली ।
(विलोक्य) अये, इयं वैदेही—
सखीति सीतेति च जानकीति
यथावयः स्निग्धतरं स्नुषेति ।
तपस्विदारैर्जनकन्द्रपुत्री
सम्भाष्यमाणा समुपैति मन्दम् ॥३॥
[अन्वयः—सखी इति, सीता इति, जानकी इति, स्नुषा इति च तपस्विदारैः
यथावयः स्निग्धतरं सम्भाष्यमाणा जनकेन्द्रपुत्री मन्दं समुपैति ॥३॥]
हिन्दी रूपान्तर—
तपस्विनियों का अभिवादन करने के लिये भीतर प्रविष्ट हुई सीता देर कर
रही है। (देखकर) अये, यह तो सीता है—
अर्थ [श्लोक ३]—समान आयु वाली स्त्रियों से सखी इस प्रकार से, आयु
में अधिक स्त्रियों से सीता और जानकी इस प्रकार से। वृद्धा स्त्रियों से पुत्रवधू इस
प्रकार से तपस्वियों की पत्नियों से आयु के अनुसार अत्यधिक स्नेह से वार्ता करती
हुई जनकराज की पुत्री सीता धीरे-धीरे मेरे पास आ रही है। राम ने सीता को देखा
तो अनेक तपस्वि-पत्नियां उसको घेर कर वार्ता कर रही थीं। समान आयु वाली
स्त्रियां उसको सखी कहकर पुकार रही थीं, बड़ी आयु की स्त्रियां उसको नाम
लेकर, सीता या जानकी कह कर बुलाती थीं तथा वृद्धा स्त्रियां वधू कह कर पुकार
रही थीं ॥३॥
संस्कृत-व्याख्या—सखी इति समवयस्काभि स्त्रीभिः सखी सम्बोध्य, सीता
इति जानकी इति च अधिकवयस्का भिः स्त्रीभिः सीता, इति वा जानकी इति वा
सनामग्रहणं सम्बोध्य, स्नुषा इति वृद्धाभिः स्त्रीभिः वधूः इति च सम्बोध्य यथावयः
वयसा अनुसारं स्निग्धतरम् अत्यधिक स्नेहेन सम्भाष्यमाणा संबोध्य व्याह्रियमाणा
जनकेन्द्रपुत्री जनकस्य राजपुत्री राजकुमारी मैथिली मन्दं शनैः-शनैः समुपैति मम
समीपं समायाति ॥३॥
व्याकरण—वयसा अनुरूपम् = यथावयः । स्निह् + क्त = स्निग्ध । स्नु +
सक् + टाप् = स्नुषा । सम् + भाष् + यक् + शानच् + टाप् = सम्भाष्यमाणा ।
छन्दः—उपजाति ।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpu. Digitized by S3 Foundation USA

२०० | प्रतिमानाटकम्
अलङ्कार—स्वभावोक्ति। सीता की स्वाभाविक अवस्था का वर्णन करने से
स्वभावोक्ति अलङ्कार है।
तापसीनाम्भिवादनार्थम्—भरद्वाज के आश्रम में आकर सीता स्वयं ही
तपस्विनियों का अभिवादन करने के लिये उनकी कुटियों में चली गई थी।
❖❖❖
(ततः प्रविशति सीता तापसी च)
तापसी—हला ! एसो दे उडुम्बिओ । उवसप्पणं । ण सक्कं तुमं एआइणिं
पेक्खिदुं । [हला ! एष ते कुटुम्बिकः । उपसर्पैनम् । न शक्यं त्वामेकाकिनीं
प्रेक्षितुम् ।]
सीता—हं अज्ज वि अविस्ससणीअं मे पडिभादि । (उपसृत्य) जेदु
अय्यउत्तो । [हम्, अद्याप्यविश्वसनीयमिव मे प्रतिभाति । जयत्वार्यपुत्रः ।]
रामः—मैथिलि ! अपि जानासि पूर्वाधिष्ठानमस्माकं जनस्थान-
मासीत् ? अप्यत्र ज्ञायन्ते पुत्रकृतकाः वृक्षाः ?
सीता—जाणामि जाणामि । आलोइअपत्तआ अब्लोइदव्वा दाणि संवृत्ता ।
[जानामि जानामि। अवलोकितपत्रका उल्लोकयितव्या इदानीं संवृत्ताः।]
रामः—एवमेतत् । निम्नस्थलोत्पादको हि कालः । मैथिलि ! अप्यु-
पलभ्यतेऽस्य सप्तपर्णस्याधस्ताच्छुक्लवाससं भरतं दृष्ट्वा परित्रस्तं
मृगयूथमासीत् ?
सीता—अय्यउत्त ! दिढं खु स्मरामि । [आर्यपुत्र ! दृढं खलु
स्मरामि ।]
रामः—अयं तु नस्तपसः साक्षिभूतो महाकच्छः । अत्रास्माभिरासी-
नैस्तातस्य निवपनक्रियां चिन्तयद्भिः काञ्चनपार्श्वो नाम मृगो दृष्टः ।
सीता—हं अय्यउत्त ! मा खु एवं भणिदुं । [हम् आर्यपुत्र ! मा खलु
मा खलु एवं भणितुम् ।] (भीता वेपते) ।
रामः—अलमलंसम्भ्रमेण । अतिक्रान्तः खल्वेष कालः । (दिशोऽवलोक्य)
अये कुतो नु—
रेणुः समुत्पतति लोध्रसमानगौरः
सम्प्रावृणोति च दिशः पवनावधूतः ।
शङ्खध्वनिश्च पटहस्वनधीरनादः
सम्मूर्च्छतो वनमिदं नगरीकरोति ॥४॥

सप्तमोऽङ्कः [ २०१ ]
[अन्वयः—लोध्रसमानगौरः रेणुः समुत्पतति। पवनावधूतः च दिशः
प्रावृणोति। पटहस्वनधीरनादैः च सम्मूर्च्छितः शङ्खध्वनिः इदं वनं नगरीकरोति ॥४॥]
हिन्दी-रूपान्तर—
(तदनन्तर सीता और तपस्विनी प्रवेश करती हैं)
तपस्विनी—हला सीते ! ये तुम्हारे पति हैं। तुम इनके समीप जाओ। मैं
तुमको अकेला नहीं देख सकती।
सीता—हाँ, आज भी मुझको यह सब अविश्वसनीय सा प्रतीत होता है।
(समीप जाकर) आर्यपुत्र की जय हो।
राम—सीते ! क्या तुम जानती हो कि यह जनस्थान पहले भी हमारा
रहने का स्थान था? क्या तुम यहाँ अपने पुत्रों के समान पाले गये वृक्षों को
पहचानती हो ?
सीता—जानती हूँ, जानती हूँ। पहले इनके पत्तों को नीचे मुख करके देखना
पड़ता था, अब ये ऊपर को मुख करके देखने योग्य हो गये हैं।
राम—ऐसी ही बात है। समय सब नीचे के स्थानों को भर देता है, अर्थात्
दुःखों को दूर कर देता है ! सीते ! क्या तुमको याद है कि इस सप्तपर्ण के वृक्ष के
नीचे श्वेत वस्त्र को पहने हुये भरत को देखकर मृगों का झुण्ड डर गया था ?
सीता—आर्यपुत्र ! इस बात को खूब अच्छी तरह स्मरण करती हूँ।
राम—यह तो हमारी तपस्या का साक्षीभूत महान् जलाशय है। हम यहाँ
बैठकर पिता की श्राद्ध की क्रिया के विषय में विचार कर रहे थे कि हमने
काञ्चनपार्श्व नाम के मृग को देखा था।
सीता—हाय आर्यपुत्र ! नहीं, निश्चय से इस बात को मत कहिये।
(सीता कांपती है)
राम—घबराओ नहीं, घबराओ नहीं। यह समय तो बीत गया है।
(दिशाओं को देखकर) अरे, यह कहाँ से—
अर्थ [श्लोक ४]—लोध्र के समान शुभ्र वर्ण की धूल ऊपर उठ रही है और
वायु के वेग से उड़ाई जाकर दिशाओं को आच्छादित कर रही है। नगाड़ों की
ध्वनियों और वीरों की गर्जनाओं के शब्दों से मिश्रित होकर शंखों की ध्वनि इस
वन को नगर बना रही है ॥४॥
संस्कृत-व्याख्या—लोध्रसमानगौरः लोध्रपुष्पैः समानं सदृशं गौरं शुभ्रवर्णः
यस्य तादृशः रेणुः धूलिः समुत्पतति, भुव उत्थाय उपरि आकाशे गच्छति। स च धूलिः
पवनावधूतः पवनेन वायुवेगेन अवधूतः इतस्ततः प्रसारितः च दिशः आशाः सम्प्रावृ-
णोति सम्यक् समन्ततः आच्छादयति। पटहस्वनधीरनादैः पटहानां डिंडिमानां स्वनेन
ध्वनिभिः धीराणां वीरपुरुषाणां च नादैः गर्जनाभिः सम्मूर्च्छितः मिश्रितः वृद्धि गत
इत्यर्थः शङ्खध्वनिः शङ्खानां कम्बूनां ध्वनिः निनादः इदम् एतद् वनम् अरण्यं नगरी

२०२ प्रतिमानाटकम्
करोति नगरसादृश्यं प्रापयति । प्रतीयते काऽपि महती सेना समागच्छति, यत्र शंखाः
ध्मायन्ते, पटहाः ताड्यन्ते वीराश्च सिंहवत् गर्जन्ति । येषां निनादैः वनमिदं
नगरवज्जायते ॥४॥
व्याकरण—पवनेन अवधूतः = पवनावधूतः । पुनाति = √पू + ल्युट् (अन) पवन ।
अव + √धू + क्त = अवधूत । पटहानां स्वनैः धीराणां च नादैः पटहस्वनधीरनादैः ।
सम् + √मूर्च्छ् + णिच् + क्त = सम्मूर्च्छित । अनगरं नगरं करोति = नगर + च्वि +
करोति (दीर्घ) = नगरीकरोति ।
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अलङ्कार—उपमा । लोध्रसमानगौरः में उपमा अलङ्कार है । लोध्र उपमान,
रेणु उपमेय, समान उपमावाचक पद और गौर साधारण धर्म हैं ।
न शक्यं त्वाम् एकाकिनीं प्रेक्षितुम्—सीता का एक बार अपहरण हो चुका
है । अतः उसको अकेला छोड़ने में तापसियाँ भी डरती हैं ।
पूर्वाधिष्ठानं जनस्थानम्—जनस्थान में राम पहले रह चुके हैं । पहले के
स्मृत चिह्नों को देखकर वे अपने निवास स्थान को पहचान लेते हैं ।
अवलोकितपत्रका उल्लोकयितव्याः—सीता ने इन वृक्षों को आरोपित किया
था तथा पुत्रों के समान पालन किया था । उस समय ये छोटे थे । इनके पत्तों को
मुख नीचा करके देखना पड़ता था । परन्तु अब इतनी लम्बी अवधि में ये बड़े हो
गये तथा इनके पत्तों को देखने के लिये मुख को ऊपर करना पड़ता है ।
निम्नस्थलोत्पादको हि कालः—निम्नानां गर्तभूतानां स्थलानां समभूमिभूतानां
च उत्पादकः कालः । समय से गढ़े भर कर समतल हो जाते हैं । समय सभी खाइयों
को पाट देता है । भारी से भारी दुःखों को भी सह्य बना देता है ।
मा खल्वेवं भणितुम्—काञ्चनपार्श्व मृग का नाम सुनकर सीता को रावण
द्वारा अपने अपहरण की घटना स्मरण हो आती है । वह भय से कांपने लगती है
और राम को उसका वर्णन करने से रोकती है ।
(प्रविश्य)
लक्ष्मणः—जयत्वार्यः । आर्य !
अयं सैन्येन महता त्वद्दर्शनसमुत्सुकः ।
मातृभिः सह सम्प्राप्तो भरतः भ्रातृवत्सलः ॥५॥
[अन्वयः—त्वद्दर्शनसमुत्सुकः भ्रातृवत्सलः अयं भरतः महता सैन्येन मातृभिः
सह सम्प्राप्तः ॥५॥]
हिन्दी-रूपान्तर—
(प्रवेश करके)
लक्ष्मण—आर्य की जय हो ! आर्य !

सप्तमोऽङ्कः । २०३
अर्थ [श्लोक ५]—आपके दर्शनों के लिये अत्यधिक उत्कण्ठित तथा भाई के
प्रति स्नेह करने वाला यह भरत महान् सेना और माताओं के साथ आ
पहुँचा है ॥५॥
संस्कृत-व्याख्या—त्वद्दर्शनसमुत्सुकः तव दर्शने अवलोकने समुत्सुकः अत्यधिकम्
उत्कण्ठितः भ्रातृवत्सलः स्निग्धः अयम् एष भरतः महता विशालेन सैन्येन सेनया
मातृभिः अम्बाभिश्च सह सम्प्राप्तः अस्मिन् तपोवने समायातः ॥५॥
व्याकरण—तव दर्शने समुत्सुकः = त्वद्दर्शनसमुत्सुकः । उद् + √ सृ +
क्विप् + कन् (ह्रस्व) = उत्सुक । भ्रातृषु वत्सलः = भ्रातृवत्सल । वत्स + लच् =
वत्सल ।
छन्दः—अनुष्टुप्
अलङ्कार—सहोक्ति ।
————
रामः—वत्स लक्ष्मण ! किमेवं भरतः प्राप्तः ?
लक्ष्मणः—आर्य ! अथ किम् ?
रामः—मैथिलि ! श्वश्रूजनपुरोगं भरतमवलोकयितुं विशालीक्रियतां
ते चक्षुः ।
सीता—अय्यउत्त ! इच्छिदव्वे काले भरदो आअदो । [आर्यपुत्र ! एष्टव्ये
काले भरत आगतः ।]
(ततः प्रविशति भरतः समातृकः)
भरतः—
तैस्तैः प्रवृद्धविषयैर्विषमैर्विमुक्तं
मेघैर्विमुक्तममलं शरदिव सोमम् ।
आर्यासहायमह्मद्य गुरुं दिदृक्षुः
प्राप्तोऽस्मि तुष्टहृदयः स्वजनानुबद्धः ॥६॥
[अन्वयः—शरदि मेघैः विमुक्तम् अमलं सोमम् इव, तैः तैः प्रवृद्धविषयैः विषयैः
विमुक्तम् आर्यासहायं गुरुं दिदृक्षुः अहम् अद्य तुष्टहृदयः स्वजनानुबद्धः प्राप्तः
अस्मि॥६॥
हिन्दी रूपान्तर—
राम—वत्स लक्ष्मण ! क्या इस प्रकार यह भरत आया है ?
लक्ष्मण—आर्य ! और क्या ?
राम—सीते ! तुम्हारी सासों के साथ आगे चलने वाले भरत को देखने के
लिये अपनी आँखों को खूब फैला लो ।
सीता—आर्यपुत्र ! अपने अभीष्ट समय पर भरत आ गये हैं ।

२०४ ] प्रतिमानाटकम्
(तदनन्तर माताओं के साथ भरत प्रवेश करता है)
भरत -
अर्थ [श्लोक ६]—शरद् ऋतु में मेघों से युक्त हुये निर्मल चन्द्रमा के समान,
उन उन नानाविध बढ़ी हुई आपत्तियों से छुटकारा पाये हुये तथा आर्या सीता के
साथ आये हुये बड़े भाई को देखने की इच्छा वाला मैं आज सन्तुष्ट हृदय वाला
होकर अपने सम्बन्धियों के साथ यहाँ आया हूँ ॥६॥
संस्कृत-व्याख्या—शरदि शरत्काले मेघापगमे मेघैः जलदैः विमुक्तम् आच्छा-
दनरहितं कृतम् अमलं निर्मलं दीप्तिशालिनं सोमं चन्द्रमसम् इव, तैः तैः वाचापि
वर्णयितुम् अशक्यैः प्रवृद्धविषयैः प्रवृद्धाः प्रवृद्धिं गताः विषयाः येषां तैः नानाविधैरित्यर्थः
विषमैः विपद्भिः विमुक्तम् आर्यासहायं आर्यया सीतया सहायं सहितं गुरुं ज्येष्ठं
भ्रातरं रामं दिदृक्षुः दर्शनेच्छुकः अहम् अद्य इदानीन्तने समये तुष्टहृदयः तुष्टं प्रसन्नं
हृदयं यस्य तादृशः सन् स्वजनानुबद्धः स्वैः जनैः आत्मीयैः सम्बन्धिभिः अनुबद्धः
अनुयातः प्राप्तः समागतः अस्मि । संकटमुक्तं ज्येष्ठभ्रातरं राममवलोकयितुमुत्सुकोऽहं
प्रसन्नहृदयोऽत्र स्वजनैः सद्धि समागतः ॥६॥
व्याकरण—प्रवृद्धाः विषयाः येषां तैः = प्रवृद्धविषयैः । प्र + √वृध् + क्त =
प्रवृद्ध । विष्ण्वन्ति स्वात्मकतया विषयिणं सम्बध्नन्ति = वि + √सि + अच् (षत्व)
= विषय । √दृश् + सन् + उ = दिदृक्षुः । तुष्टं हृदयं यस्य स = तुष्टहृदयः ।
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अलङ्कार—उपमा । विषममुक्त राम उपमेय, मेघनिर्मुक्त सोम उपमान, इव
उपमावाचक तथा दर्शनाभिलाषा साधारण धर्म हैं ।
श्वश्रूजनपुरोगं भरतम्—श्वश्रूजनस्यः पुरः गच्छति इति तम् = श्वश्रूजन-
पुरोगम् । शु आशु अश्नुते = शु + √अश् + उरच् = श्वशुर + ऊङ् = श्वश्रू । भरत
अपनी माताओं के आगे-आगे चल रहे थे ।
एष्टव्ये काले—जिस समय भरत को देखने की सीता की इच्छा थी तथा
अयोध्या में प्रवेश से पूर्व भरत वहाँ समुचित समय में आ गये थे । इष् + तव्यत् =
एष्टव्य ।
रामः—अम्बाः ! अभिवादये ।
सर्वाः—जाद ! चिरं जीव । दिट्ठिआ वड्ढामो अवसिदपडिण्णं तुमं कुसलिणं
सह बहए पेक्खिअ । [जात ! चिरं जीव । दिष्ट्या वर्धामहे अवसितप्रतिज्ञं
त्वां कुशलिनं सह वध्वा प्रेक्ष्य ।]
रामः—अनुगृहीतोऽस्मि ।
लक्ष्मणः—अम्बाः ! अभिवादये ।

सप्तमोऽङ्कः [ २०५
सर्वाः—जाद ! चिरं जीव । [ जात ! चिरं जीव ।]
लक्ष्मणः—अनुगृहीतोऽस्मि ।
सीता—अय्या ! वन्दामि । [आर्याः ! वन्दे ।]
सर्वाः—वच्छ ! चिरमङ्गला होहि । [वत्से ! चिरमङ्गला भव ।]
सीता—अणुग्गहिदा म्हि । [अनुगृहीतास्मि ।]
भरतः—आर्य ! अभिवादये । भरतोऽस्मि ।
रामः—एह्येहि वत्स ! इक्ष्वाकुकुमार ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव ।
वक्षः प्रसारय कवाटपुटप्रमाण-
मालिङ्ग मां सुविपुलेन भुजद्वयेन ।
उन्नामयाननमिदं शरदिन्दुकल्पं
प्रह्लादय व्यसनदग्धमिदं शरीरम् ॥७॥
[अन्वयः—कवाटपुटप्रमाणं वक्षः प्रसारय । सुविपुलेन भुजद्वयेन माम्
आलिङ्ग । शरदिन्दुकल्पम् इदम् आननम् उन्नामय । व्यसनदग्धम् इदं शरीरं
प्रह्लादय ॥७॥
हिन्दी रूपान्तर—
राम—माताओं ! मैं अभिवादन करता हूँ ।
सब मातायें—पुत्र ! चिरञ्जीवी होओ । हमारा धन्य भाग्य है, जो हम
प्रतिज्ञा को पूरा करने वाले तुमको वधू के साथ कुशलपूर्वक देख रही हैं ।
राम—मैं अनुगृहीत हूँ !
लक्ष्मण—माताओ ! मैं अभिवादन करता हूँ ।
सब मातायें—पुत्र ! चिरञ्जीवी होओ ।
लक्ष्मण—मैं अनुगृहीत हूँ ।
सीता—आर्य ! मैं वन्दना करती हूँ ।
सब मातायें—वत्से ! सदा सुहागिन रहो ।
सीता—मैं अनुगृहीत हूँ ।
भरत—आर्य ! मैं अभिवादन करता हूँ । मैं भरत हूँ ।
राम—आओ, आओ वत्स इक्ष्वाकुकुमार ! तुम्हारा कल्याण हो आयुष्मान्
होओ ।
अथ [श्लोक ७]— [किवाड़ों के समान विशाल आकार वाले अपने वक्षःस्थल
को फैला लो । अति विशाल अपनी दोनों भुजाओं से मेरा आलिङ्गन कर लो ।
शरत्कालीन चन्द्रमा के समान इस सुन्दर मुख को ऊपर उठाओ । शोकरूप आपत्ति
से जले हुये इस शरीर को प्रसन्न कर दो ॥७॥

१०६ । प्रतिमानाटकम्
संस्कृत-व्याख्या — कवाटपुटं कपाटयुगलं तदिव प्रमाणं मानमाकारः विस्तीर्ण-
त्वं वा यस्य तादृशं वक्षः उरःस्थलं प्रसारय विस्तारय । तथाभूते च सति त्वयि ते
वक्षःस्थलस्य आलिङ्गनयोग्यता भविष्यति समधिकसुख्यानुभूतिश्च भविष्यति ।
सुविपुलेन अतिविशालेन भुजद्वयेन बाहुयुगलेन मां रामम् आलिङ्ग आश्लेषबद्धं कुरु ।
शरदिन्दुकल्पं शरत्कालीनचन्द्रसदृशम् इदम् आननं मुखम् उन्नामय उन्नतं कुरु, तथा-
भूते च सति ते मुखे दर्शनाधिकानन्दानुभवो भविष्यति । व्यसनदग्धं व्यसनैः पितृ-
निधनमातृभ्रातृवियोगादिजन्यैः कष्टैरापद्भिश्च दग्धं ज्वलन्तम् इदमेतत् शरीरं वपुः
प्रह्लादय आनन्दोच्छ्वसितं कुरु । विपद्भिः कष्टैश्च मे शरीरे दग्धतुल्या वेदना
वर्तते । तवालिङ्गनेन तव मुखदर्शनेनचेयं दाहवेदना शिशिरत्वमुपैष्यति ॥७॥
व्याकरण — प्र + मा + ल्युट् (अन) = प्रमाण ।
छन्दः — वसन्ततिलका ।
अलङ्कार — उपमा । प्रथम चरण में कवाटपुट उपमान, वक्षः उपमेय और
प्रमाण साधारण धर्म है । उपमावाचक पद के लुप्त होने से यह वाचकलुप्तोपमा है ।
तृतीय चरण में आनन उपमेय शरदिन्दु उपमान, कल्प उपमावाचक और प्रह्लादय
साधारण धर्म हैं ।
अवसितप्रतिज्ञम् — अवसिता प्रतिज्ञा येन तादृशम् । अव + षिण् + क्त +
टाप् = अवसिता । राम के प्रतिज्ञा पूरी करने से सब प्रसन्न हैं ।
भरतः — अनुगृहीतोऽस्मि । आर्ये ! अभिवादये । भरतोऽहमस्मि ।
सीता — अय्यउत्तेण चिरसञ्चारो होहि । [आर्यपुत्रेण चिरसञ्चारी भव ।]
भरतः — अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! अभिवादये ।
लक्ष्मणः — एह्येहि वत्स ! दीर्घायुर्भव । परिष्वजस्व गाढम् ।
(आलिङ्गति) ।
भरतः — अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! प्रतिगृह्यतां राज्यभारः ।
रामः — वत्स ! कथमिव ?
कैकेयी — जाद ! चिराहिलसिदो खु एसो मणोरहो । [जात ! चिराभि-
लषितः खल्वेष मनोरथः ।]
(ततः प्रविशति शत्रुघ्नः)
शत्रुघ्नः — विविधव्यसनैः क्लिष्टमक्लिष्टगुणतेजसम् ।
द्रष्टुं मे त्वरते बुद्धी रावणान्तकरं गुरुम् ॥८॥
(उपगम्य) आर्य ! शत्रुघ्नोऽहमभिवादये ।
[अन्वयः — विविधैः व्यसनैः क्लिष्टम् अक्लिष्टगुणतेजसं रावणान्तकरं गुरुं
द्रष्टुं मे बुद्धिः त्वरते ॥८॥]

सप्तमोऽङ्कः [ २०७
हिन्दी रूपान्तर—
भरत—मैं अनुगृहीत हूँ । आर्ये ! मैं अभिवादन करता हूँ । मैं भरत हूँ ।
सीता—आर्यपुत्र के साथ चिरकाल तक विचरण करो ।
भरत—मैं अनुगृहीत हूँ । आर्य ! अभिवादन करता हूँ ।
लक्ष्मण—वत्स ! आओ, आओ । दीर्घायु होओ । मेरा प्रगाढ आलिङ्गन
करो । (आलिङ्गन करता है)
भरत—मैं अनुगृहीत हूँ । आर्य ! राज्य के भार को वापिस ले लीजिये ।
राम—वत्स ! यह कैसे हो सकता है ?
कैकेयी- वत्स ! यह हम लोगों का चिरकाल से अभीष्ट मनोरथ है ।
(तदनन्तर शत्रुघ्न प्रवेश करता है)
(समीप जाकर) आर्य ! मैं शत्रुघ्न आपका अभिवादन करता हूँ ।
शत्रुघ्न—
अर्थ [श्लोक ८]—अनेक प्रकार की आपत्तियों से सताये जाते हुये भी
जिनके गुण और तेज उपहत नहीं हुये, ऐसे तथा रावण का विनाश करने वाले बड़े
भाई को देखने के लिये मेरी बुद्धि शीघ्रता कर रही है ॥८॥
संस्कृत-व्याख्या—विविधैः नानाप्रकारैः व्यसनैः विपद्भिः क्लिष्टं सम्पीडितं,
तथापि अक्लिष्टगुणतेजसम् अक्लिष्टाः अनुपहताः गुणाः शीलशौर्यादिगुणाः तेजः
कान्तिश्च यस्य तादृशं रावणान्तकरं रावणस्य दशाननस्य अन्तं विनाशं करोति
विदधाति इति तथाभूतं गुरुं ज्येष्ठभ्रातरं रामं द्रष्टुम् अवलोकयितुं मे मम शत्रुघ्नस्य
बुद्धिः मतिः विचारः त्वरते शीघ्रतां करोति । उत्कण्ठते इत्यर्थः ॥८॥
व्याकरण—अक्लिष्टाः गुणाः तेजश्च यस्य तम् = अक्लिष्टगुणतेजसम् ।
√क्लिश् + क्त = क्लिष्टः । रावणस्य अन्तं करोति इति तम् = रावणान्तकरम् ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
अलङ्कार—उदात्त । राम के गुणातिशय का वर्णन करने से उदात्त
अलङ्कार है ।
—•—•—
रामः—एह्येहि वत्स ! स्वस्ति । आयुष्मान् भव ।
शत्रुघ्नः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! अभिवादये ।
सीता—बच्च ! चिरं जीव । [वत्स ! चिरं जीव ।]
शत्रुघ्नः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! अभिवादये ।
लक्ष्मणः—स्वस्ति । आयुष्मान् भव ।
शत्रुघ्नः—अनुगृहीतोऽस्मि । आर्य ! एतौ वसिष्ठवामदेवौ सह प्रकृति-
भिरभिषेकं पुरस्कृत्य त्वद्दर्शनमभिलषतः ।

२०८ ] प्रतिमानाटकम्
तीर्थोदकेन मुनिभिः स्वयमाहृतेन
नानानदीनदगतेन तव प्रसादात् ।
इच्छन्ति ते मुनिगणाः प्रथमाभिषेकं
द्रष्टुं मुखं सलिलसिक्तमिवारविन्दम् ॥६॥
[अन्वयः—मुनिगणाः, तव प्रसादात् नानानदीनदगतेन मुनिभिः स्वयम्
आहृतेन तीर्थोदकेन प्रथमाभिषिक्तं ते मुखं सलिलसिक्तम् अरविन्दम् इव द्रष्टुम्
इच्छन्ति ॥६॥]
हिन्दी रूपान्तर—
राम—वत्स ! आओ, आओ। तुम्हारा कल्याण हो । आयुष्मान् होओ ।
शत्रुघ्न—मैं अनुगृहीत हूँ । आर्य ! मैं अभिवादन करता हूँ ।
सीता—वत्स ! चिरञ्जीवी होओ।
शत्रुघ्न—मैं अनुगृहीत हूँ । आर्य ! मैं अभिवादन करता हूँ ।
लक्ष्मण—कल्याण हो । आयुष्मान् होओ :
शत्रुघ्न—मैं अनुगृहीत हूँ । आर्य ! ये दोनों महर्षि वसिष्ठ और वामदेव
प्रजाओं के साथ राज्याभिषेक की सामग्री लेकर आपके दर्शन की अभिलाषा
करते हैं ।
अर्थ [श्लोक ६]—ये वसिष्ठ वामदेव आदि मुनि, तुम्हारी ही कृपा से
अनेक नदियों और नदों में स्थित, मुनियों द्वारा स्वयं लाये गये तीर्थों के जलों से,
प्रथम राज्याभिषेक किये गये आपके मुख को उसी प्रकार देखना चाहते हैं, जैसे कि
जल से भीगा हुआ श्वेत कमल हो ॥६॥
संस्कृत-व्याख्या—मुनिगणाः एते वसिष्ठवामदेवाद्यः ऋषयः, तव प्रसादात्
तवैव कृपाप्रभावात् त्वया रावणादिराक्षसानां वधः कृतः, अतएव सर्वे सञ्चारमार्गाः
प्रतिहतविघ्नाः सञ्जाताः, अतः तव प्रसादः एव जलानयनहेतुः, नाना विविधाः वा
नद्यः सरितः नदाः महानद्यः इति जलधारासु गतेन विद्यमानेन, मुनिभिः ऋषिभिः
स्वयम् आत्मनैव, न तु कैश्चिदपि सेवकैः, एवं तीर्थोदकपवित्रताप्रभावः, आहृतेन
आनीतेन तीर्थोदकेन तीर्थानां पुण्यस्थलानाम् उदकेन जलेन प्रथमाभिषिक्तं प्रथमं
प्राक्कृतमेव अभिषिक्तं राज्याभिषेककरणाय तीर्थजलार्द्रं ते तव रामस्य मुखं वदनं,
सलिलसिक्तं सलिलैः जलैः अभिषिक्तम् अभ्युक्षितम् अरविन्दं श्वेतकमलम् इव द्रष्टुम्
अवलोकयितुम् इच्छन्ति वाञ्छन्ति । स्वल्पेनैव कालेन ते राज्याभिषेकं विधातु-
मिच्छन्ति इत्यर्थः ॥६॥
व्याकरण—तीर्थानाम् उदकेन = तीर्थोदकेन । तरति पापादिकं यस्मात् =
√तृ + थक् = तीर्थं । उन्दी क्लेदने, √उन्द् + क्वुन् (अक) (न का लोप) =
उदक् । नाना नद्यः नदाश्च तत्र गतेन = नानानदीनदगतेन । अराणि चक्राङ्गानि इव
पत्राणि विन्दते = अर + विद् + श (नुम् का आगम) = अरविन्द ।

सप्तमोऽङ्कः [ २०६
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अलङ्कार—उपमा और उदात्त । अरविन्द उपमान, मुख उपमेय, इव
उपमावाचक और जल से अभिषिक्त होना साधारण धर्म हैं । अतः पूर्णोपमा
अलङ्कार है ।
वसिष्ठवामदेवौ—वसिष्ठश्च वामदेवश्च तौ । ये दोनों इक्ष्वाकु कुल के
पुरोहित थे । राज्याभिषेक की सामग्री को साथ लेकर प्रजाजनों के साथ जनस्थान
में ही चले आये थे ।
कैकेयी—गच्छ जाद ! अभिलसेहि अभिसेअं । [गच्छ जात ! अभिलषा-
भिषेकम् ।]
रामः—यदाज्ञापयत्यम्बा । (निष्क्रान्तः)
(नेपथ्ये)
जयतु भवान् । जयतु स्वामी । जयतु महाराजः । जयतु देवः । जयतु
भद्रमुखः । जयत्वार्यः । जयतु रावणान्तकः ।
कैकेयी—एदे पुरोहिदा । कञ्चुइणो पुत्तअस्स मे विजअघोसं वड्ढअन्तो
आसीहि पूजअन्ति । [एते पुरोहिताः कञ्चुकिनः पुत्रकस्य मे विजयघोषं वर्धयन्त
आशीर्भिः पूजयन्ति ।
सुमित्रा—पइदीओ परिचारआ सज्जणा अ पुत्तअस्स मे विजअं वड्ढअन्ति ।
[प्रकृतयः परिचारकाः सज्जनाश्च पुत्रकस्य मे विजयं वर्धयन्ति ।]
(नेपथ्ये)
भो भो जनस्थाननिवासिनस्तपस्विनः ! शृण्वन्तु शृण्वन्तु भवन्तः—
हत्वा रिपुप्रभवमप्रतिमं तमौघं
सूर्योऽन्धकारमिव शौर्यमयैर्मयूखैः ।
सीतामवाप्य सकलाशुभवर्जनीयां
रामो महीं जयति सर्वजनाभिरामः ॥१०॥
कैकेयी—अम्महे ! पुत्तस्स मे विजअघोसणा वड्ढइ । [अहो ! पुत्रस्य मे
विजयघोषणा वर्धते ।]
[अन्वयः—अप्रतिमं रिपुप्रभवं तमौघं शौर्यमयैः मयूखैः सूर्यः अन्धकारम् इव
हत्वा, सकलाशुभवर्जनीयां सीताम् अवाप्य सर्वजनाभिरामः रामः महीं जयति ।।१०।।]
हिन्दी रूपान्तर—
कैकेयी—पुत्र ! जाओ । राज्याभिषेक को स्वीकार करो ।

२१० ] प्रतिमानाटकम्
राम—माता जैसा आदेश देती है । (निकल जाते हैं)
(नेपथ्य में)
आपकी जय हो । स्वामी की जय हो । महाराज की जय हो । देव की जय
हो । भद्रमुख की जय हो । आर्य की जय हो । रावण का विनाश करने वाले की
जय हो ।
कैकेयी—ये पुरोहित और कञ्चुकी मेरे प्रिय पुत्र की विजय-घोषणा करके
उसकी उन्नति करते हुये आशीर्वादों से उसका अभिनन्दन कर रहे हैं ।
सुमित्रा—प्रजायें, सेवक और सज्जन पुरुष मेरे पुत्र की जय-जयकार कर
रहे हैं ।
(नेपथ्य में)
जनस्थान में रहने वाले हे हे तपस्वियों ! आप सब सुनें, सुनें—
अर्थ [श्लोक १०]—अतुलनीय तथा शत्रु द्वारा उत्पन्न किये गये अन्धकार
रूपी विपत्ति के समूह का, अपनी शौर्यरूपी किरणों से, जिस प्रकार सूर्य अपनी
किरणों से अन्धकार को नष्ट करता है, उसी प्रकार विनाश करके, सम्पूर्ण अशुभों
से रहित सर्वमङ्गलमयी सीता को प्राप्त करके, सम्पूर्ण जनता को आनन्दित करने
वाले राम ने पृथिवी को जीत लिया है । वे पृथिवी पर सर्वोत्कृष्ट रूप से है ॥१०॥
कैकेयी—अहा, मेरे पुत्र की विजय-घोषणा बढ़ रही है ।
संस्कृत-व्याख्या--अप्रतिमं न विद्यते प्रतिमा तुलना यस्य तादृशम् अतुलनीयं
रिपुप्रभवं रिपोः शत्रुभूताद् रावणात् प्रभवः उत्पत्तिः यस्य तादृशं तमौघम् तमसः
अन्धकाररूपस्य संकटस्य ओघं समूहं शौर्यरूपैः स्ववीर्यरूपैः मयूखैः किरणैः, सूर्यः
भास्करः मयूखैः अन्धकारं तमःपटलम् इव हत्वा विनाश्य, सकलाशुभवर्जनीयां
सकलेभ्यः सर्वेभ्यः अशुभेभ्यः अमङ्गलेभ्यः वर्जनीयां विरहितां सर्वमङ्गलमयीं सीतां
जानकीम् अवाप्य उपलभ्य, सर्वजनाभिरामः सर्वान् सकलान् जनान् प्रजाः अभिराम-
यति अनुरञ्जयति इति तादृशः रामः दशरथसुतः रामः महीं पृथिवीं जयति स्वाधीनतां
प्रापयति । पृथिव्यां स सर्वोत्कर्षेण वर्तते । यथा सूर्यः स्वमयूखैः अन्धकारं विनाशयति
तथैव तेन रामेण । स्वशौर्येण शत्रुजनिता विपत्तिः विनाशिता ॥१०॥
व्याकरण—रिपोः प्रभवः यस्य तम् = रिपुप्रभवम् । अनिष्टं रपति = रप् +
कु (इत्व) = रिपु । प्र + भू + अच् = प्रभव । गगनं मापयन् गच्छति माति वा =
मा + ऊख (मयू आदेश) = मयूख । सकलेभ्यः अशुभेभ्यः वर्जनीयाम् = सकलाशुभ-
वर्जनीयाम् वृज् + अनीयर् = वर्जनीय ।
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अलङ्कार—उपमा, अतिशयोक्ति और रूपक । सूर्य उपमान, राम उपमेय, इव
उपमावाचक, अन्धकार का विनाश करना साधारण धर्म है अतः पूर्णोपमा है । तमः एव
विपत्तिः । इसमें उपमान तमः द्वारा विपत्ति उपमेय का निगरण करने के कारण रूप-