प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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राम—माता जैसा आदेश देती है । (निकल जाते हैं)
(नेपथ्य में)
आपकी जय हो । स्वामी की जय हो । महाराज की जय हो । देव की जय
हो । भद्रमुख की जय हो । आर्य की जय हो । रावण का विनाश करने वाले की
जय हो ।
कैकेयी—ये पुरोहित और कञ्चुकी मेरे प्रिय पुत्र की विजय-घोषणा करके
उसकी उन्नति करते हुये आशीर्वादों से उसका अभिनन्दन कर रहे हैं ।
सुमित्रा—प्रजायें, सेवक और सज्जन पुरुष मेरे पुत्र की जय-जयकार कर
रहे हैं ।
(नेपथ्य में)
जनस्थान में रहने वाले हे हे तपस्वियों ! आप सब सुनें, सुनें—
अर्थ [श्लोक १०]—अतुलनीय तथा शत्रु द्वारा उत्पन्न किये गये अन्धकार
रूपी विपत्ति के समूह का, अपनी शौर्यरूपी किरणों से, जिस प्रकार सूर्य अपनी
किरणों से अन्धकार को नष्ट करता है, उसी प्रकार विनाश करके, सम्पूर्ण अशुभों
से रहित सर्वमङ्गलमयी सीता को प्राप्त करके, सम्पूर्ण जनता को आनन्दित करने
वाले राम ने पृथिवी को जीत लिया है । वे पृथिवी पर सर्वोत्कृष्ट रूप से है ॥१०॥
कैकेयी—अहा, मेरे पुत्र की विजय-घोषणा बढ़ रही है ।
संस्कृत-व्याख्या--अप्रतिमं न विद्यते प्रतिमा तुलना यस्य तादृशम् अतुलनीयं
रिपुप्रभवं रिपोः शत्रुभूताद् रावणात् प्रभवः उत्पत्तिः यस्य तादृशं तमौघम् तमसः
अन्धकाररूपस्य संकटस्य ओघं समूहं शौर्यरूपैः स्ववीर्यरूपैः मयूखैः किरणैः, सूर्यः
भास्करः मयूखैः अन्धकारं तमःपटलम् इव हत्वा विनाश्य, सकलाशुभवर्जनीयां
सकलेभ्यः सर्वेभ्यः अशुभेभ्यः अमङ्गलेभ्यः वर्जनीयां विरहितां सर्वमङ्गलमयीं सीतां
जानकीम् अवाप्य उपलभ्य, सर्वजनाभिरामः सर्वान् सकलान् जनान् प्रजाः अभिराम-
यति अनुरञ्जयति इति तादृशः रामः दशरथसुतः रामः महीं पृथिवीं जयति स्वाधीनतां
प्रापयति । पृथिव्यां स सर्वोत्कर्षेण वर्तते । यथा सूर्यः स्वमयूखैः अन्धकारं विनाशयति
तथैव तेन रामेण । स्वशौर्येण शत्रुजनिता विपत्तिः विनाशिता ॥१०॥
व्याकरण—रिपोः प्रभवः यस्य तम् = रिपुप्रभवम् । अनिष्टं रपति = रप् +
कु (इत्व) = रिपु । प्र + भू + अच् = प्रभव । गगनं मापयन् गच्छति माति वा =
मा + ऊख (मयू आदेश) = मयूख । सकलेभ्यः अशुभेभ्यः वर्जनीयाम् = सकलाशुभ-
वर्जनीयाम् वृज् + अनीयर् = वर्जनीय ।
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अलङ्कार—उपमा, अतिशयोक्ति और रूपक । सूर्य उपमान, राम उपमेय, इव
उपमावाचक, अन्धकार का विनाश करना साधारण धर्म है अतः पूर्णोपमा है । तमः एव
विपत्तिः । इसमें उपमान तमः द्वारा विपत्ति उपमेय का निगरण करने के कारण रूप-