प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः
(ततः प्रविशति तापसः)
तापसः—नन्दिलक ! नन्दिलक !
(प्रविश्य)
नन्दिलकः—अय्य ! अअं ह्मि । [आर्य ! अयमस्मि ।]
तापसः—नन्दिलक ! कुलपतिर्विज्ञापयति—एष खलु स्वदारापहारिणं
त्रैलोक्यविद्रावणं रावणं नाशयित्वा, राक्षसगणविरुद्धवृत्तं गुणगणविभूषणं
विभीषणमभिषिच्य देवदेवर्षिसिद्धविमलचारित्रां तत्रभवतीं सीतामादाय,
ऋक्षराक्षसवानरमुख्यैः परिवृतः सम्प्राप्तस्तत्रभवान् शरद्विमलगगनचन्द्राभिरामो
रामः । तदद्यास्मिन्नाश्रमपदेऽस्मद्विभवेन यत् सङ्कल्पयितव्यं, तत् सर्वं
सञ्जीक्रियतामिति ।
नन्दिलकः—अय्य ! सव्वं सञ्जीकिदं । किन्तु, [आर्य ! सर्वं
सञ्जीकृतं किन्तु,]
तापसः—किमेतत् ?
नन्दिलकः—एत्थ विभीषणकेरआ रक्खसा । तेसं भक्खणणिमित्तं कुलवदी
पमाणं [अत्र विभीषणसम्बन्धिनो राक्षसाः । तेषां भक्षणनिमित्तं कुलपतिः
प्रमाणम् ।]
हिन्दी रूपान्तर—
(तदनन्तर तपस्वी प्रवेश करता है)
तपस्वी—नन्दिलक ! हे नन्दिलक !
(प्रवेश करके)
नन्दिलक—आर्य ! मैं यह हूँ।
तपस्वी—नन्दिलक ! कुलपति आदेश देते हैं—अपनी पत्नी का अपहरण
करने वाले और तीनों लोकों को भयभीत करने वाले रावण का विनाश करके;
राक्षसों के चरित्र के प्रतिकूल शुद्ध आचरण वाले और गुणों के समूह से अलंकृत
विभीषण का लङ्का में राज्याभिषेक करके ; देवताओं, देवर्षियों तथा सिद्धों के समक्ष
निर्मल चरित्र को प्रतिपादित करने वाली आदरणीया सीता को लेकर प्रमुख रीछों,
राक्षसों और वानरों से घिरे हुये; शरत्कालीन निर्मल आकाश के चन्द्रमा के समान