प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ प्रतिमानाटकम्
करोति नगरसादृश्यं प्रापयति । प्रतीयते काऽपि महती सेना समागच्छति, यत्र शंखाः
ध्मायन्ते, पटहाः ताड्यन्ते वीराश्च सिंहवत् गर्जन्ति । येषां निनादैः वनमिदं
नगरवज्जायते ॥४॥
व्याकरण—पवनेन अवधूतः = पवनावधूतः । पुनाति = √पू + ल्युट् (अन) पवन ।
अव + √धू + क्त = अवधूत । पटहानां स्वनैः धीराणां च नादैः पटहस्वनधीरनादैः ।
सम् + √मूर्च्छ् + णिच् + क्त = सम्मूर्च्छित । अनगरं नगरं करोति = नगर + च्वि +
करोति (दीर्घ) = नगरीकरोति ।
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अलङ्कार—उपमा । लोध्रसमानगौरः में उपमा अलङ्कार है । लोध्र उपमान,
रेणु उपमेय, समान उपमावाचक पद और गौर साधारण धर्म हैं ।
न शक्यं त्वाम् एकाकिनीं प्रेक्षितुम्—सीता का एक बार अपहरण हो चुका
है । अतः उसको अकेला छोड़ने में तापसियाँ भी डरती हैं ।
पूर्वाधिष्ठानं जनस्थानम्—जनस्थान में राम पहले रह चुके हैं । पहले के
स्मृत चिह्नों को देखकर वे अपने निवास स्थान को पहचान लेते हैं ।
अवलोकितपत्रका उल्लोकयितव्याः—सीता ने इन वृक्षों को आरोपित किया
था तथा पुत्रों के समान पालन किया था । उस समय ये छोटे थे । इनके पत्तों को
मुख नीचा करके देखना पड़ता था । परन्तु अब इतनी लम्बी अवधि में ये बड़े हो
गये तथा इनके पत्तों को देखने के लिये मुख को ऊपर करना पड़ता है ।
निम्नस्थलोत्पादको हि कालः—निम्नानां गर्तभूतानां स्थलानां समभूमिभूतानां
च उत्पादकः कालः । समय से गढ़े भर कर समतल हो जाते हैं । समय सभी खाइयों
को पाट देता है । भारी से भारी दुःखों को भी सह्य बना देता है ।
मा खल्वेवं भणितुम्—काञ्चनपार्श्व मृग का नाम सुनकर सीता को रावण
द्वारा अपने अपहरण की घटना स्मरण हो आती है । वह भय से कांपने लगती है
और राम को उसका वर्णन करने से रोकती है ।
(प्रविश्य)
लक्ष्मणः—जयत्वार्यः । आर्य !
अयं सैन्येन महता त्वद्दर्शनसमुत्सुकः ।
मातृभिः सह सम्प्राप्तो भरतः भ्रातृवत्सलः ॥५॥
[अन्वयः—त्वद्दर्शनसमुत्सुकः भ्रातृवत्सलः अयं भरतः महता सैन्येन मातृभिः
सह सम्प्राप्तः ॥५॥]
हिन्दी-रूपान्तर—
(प्रवेश करके)
लक्ष्मण—आर्य की जय हो ! आर्य !