प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
पृष्ठ 265, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः [ २०१ ]
[अन्वयः—लोध्रसमानगौरः रेणुः समुत्पतति। पवनावधूतः च दिशः
प्रावृणोति। पटहस्वनधीरनादैः च सम्मूर्च्छितः शङ्खध्वनिः इदं वनं नगरीकरोति ॥४॥]
हिन्दी-रूपान्तर—
(तदनन्तर सीता और तपस्विनी प्रवेश करती हैं)
तपस्विनी—हला सीते ! ये तुम्हारे पति हैं। तुम इनके समीप जाओ। मैं
तुमको अकेला नहीं देख सकती।
सीता—हाँ, आज भी मुझको यह सब अविश्वसनीय सा प्रतीत होता है।
(समीप जाकर) आर्यपुत्र की जय हो।
राम—सीते ! क्या तुम जानती हो कि यह जनस्थान पहले भी हमारा
रहने का स्थान था? क्या तुम यहाँ अपने पुत्रों के समान पाले गये वृक्षों को
पहचानती हो ?
सीता—जानती हूँ, जानती हूँ। पहले इनके पत्तों को नीचे मुख करके देखना
पड़ता था, अब ये ऊपर को मुख करके देखने योग्य हो गये हैं।
राम—ऐसी ही बात है। समय सब नीचे के स्थानों को भर देता है, अर्थात्
दुःखों को दूर कर देता है ! सीते ! क्या तुमको याद है कि इस सप्तपर्ण के वृक्ष के
नीचे श्वेत वस्त्र को पहने हुये भरत को देखकर मृगों का झुण्ड डर गया था ?
सीता—आर्यपुत्र ! इस बात को खूब अच्छी तरह स्मरण करती हूँ।
राम—यह तो हमारी तपस्या का साक्षीभूत महान् जलाशय है। हम यहाँ
बैठकर पिता की श्राद्ध की क्रिया के विषय में विचार कर रहे थे कि हमने
काञ्चनपार्श्व नाम के मृग को देखा था।
सीता—हाय आर्यपुत्र ! नहीं, निश्चय से इस बात को मत कहिये।
(सीता कांपती है)
राम—घबराओ नहीं, घबराओ नहीं। यह समय तो बीत गया है।
(दिशाओं को देखकर) अरे, यह कहाँ से—
अर्थ [श्लोक ४]—लोध्र के समान शुभ्र वर्ण की धूल ऊपर उठ रही है और
वायु के वेग से उड़ाई जाकर दिशाओं को आच्छादित कर रही है। नगाड़ों की
ध्वनियों और वीरों की गर्जनाओं के शब्दों से मिश्रित होकर शंखों की ध्वनि इस
वन को नगर बना रही है ॥४॥
संस्कृत-व्याख्या—लोध्रसमानगौरः लोध्रपुष्पैः समानं सदृशं गौरं शुभ्रवर्णः
यस्य तादृशः रेणुः धूलिः समुत्पतति, भुव उत्थाय उपरि आकाशे गच्छति। स च धूलिः
पवनावधूतः पवनेन वायुवेगेन अवधूतः इतस्ततः प्रसारितः च दिशः आशाः सम्प्रावृ-
णोति सम्यक् समन्ततः आच्छादयति। पटहस्वनधीरनादैः पटहानां डिंडिमानां स्वनेन
ध्वनिभिः धीराणां वीरपुरुषाणां च नादैः गर्जनाभिः सम्मूर्च्छितः मिश्रितः वृद्धि गत
इत्यर्थः शङ्खध्वनिः शङ्खानां कम्बूनां ध्वनिः निनादः इदम् एतद् वनम् अरण्यं नगरी