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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 296 में से

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पृष्ठ 255

षष्ठोऽङ्कः [ १६१
अम्ब ! यद् भ्रातृस्नेहात् समुत्पन्नमन्युना मया। दूषितात्रभवती, तत् सर्वं
मर्षयितव्यम् । अम्ब ! अभिवादये । (चरणयोः पतति)
कैकेयी—जाद ! का णाम माता पुत्तअस्स अवराहं ण मरिसेदि ? उट्ठेहि
उट्ठेहि । को एत्थ दोसो ? [जात ! का नाम माता पुत्रस्यापराधं न
मर्षयति ? कोऽत्र दोषः ?]
हिन्दी रूपान्तर—
भरत—निश्चय से यह बहुत अधिक कष्ट की बात है ।
कैकेयी—पुत्र ! इसी कारण मैंने आपको अपराधी बनाकर प्रिय पुत्र राम
को वन भेजा था, किसी राज्य के लालच से नहीं भेजा था । महर्षि का शाप
अवश्यंभावी था और पुत्र को परदेस भेजे बिना उसका परिहार नहीं हो सकता था ।
भरत—तो हम दोनों पुत्रों, मेरा और राम का प्रवास बराबर ही होता ।
मुझको वन किस कारण नहीं भेजा ?
कैकेयी—पुत्र ! तुम मामा के घर रह रहे थे, अतः महाराज को तुम्हारे
प्रवास का अभ्यास हो गया था ।
भरत—तो फिर चौदह वर्ष की अवधि किसलिये निर्धारित की थी ।
कैकेयी—पुत्र ! मैं चौदह दिन की अवधि कहना चाहती थी, परन्तु हृदय के
व्याकुल हो जाने के कारण चौदह वर्ष, इस प्रकार कह दिया ।
भरत—यही स्त्रियों की चतुराई है । इस पर अच्छी प्रकार विचार करना
चाहिये और यह बात क्या गुरुजनों को विदित है ?
सुमन्त्र—कुमार ! वसिष्ठ, वामदेव आदि गुरुजनों ने इसकी अनुमति दी थी
और यह बात उनको विदित है ।
भरत—अहोभाग्य है। ये तो निश्चय से तीनों लोकों के साक्षी हैं । भाग्य से
आप निरपराध हैं । मातः ! भाई के प्रति स्नेह के कारण मुझको क्रोध उत्पन्न हो
गया था और मैंने आदरणीया आप पर दोष लगाया था, उसको आप क्षमा कर
दीजिये । हे मातः ! मैं आपका अभिवादन करता हूँ। (पैरों में गिरता है)
कैकेयी—पुत्र ! कौनसी ऐसी माता है, जो प्रिय पुत्र के अपराध को क्षमा
नहीं कर देगी ? उठो, उठो । इसमें कौनसा दोष है ?
टिप्पणी—
पुत्रको रामो वनं प्रेषितः न खलु राज्यलोभेन—यहाँ कैकेयी अपनी सफाई
देने तथा अपने को निरपराध सिद्ध करने के लिये बता रही है कि मैंने राज्य का
लोभ नहीं किया था । राम भी मुझको पुत्र की तरह प्रिय हैं। वे मेरे प्रिय पुत्र ही
हैं । महर्षि के शाप का परिहार करने के लिये ही मैंने उनको वन भेजा था । पति
की हितकामना के कारण ही मैंने अपने को अपराधी बनाया ।