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सर्वकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 296 में से

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पृष्ठ 269

सप्तमोऽङ्कः [ २०५
सर्वाः—जाद ! चिरं जीव । [ जात ! चिरं जीव ।]
लक्ष्मणः—अनुगृहीतोऽस्मि ।
सीता—अय्या ! वन्दामि । [आर्याः ! वन्दे ।]
सर्वाः—वच्छ ! चिरमङ्गला होहि । [वत्से ! चिरमङ्गला भव ।]
सीता—अणुग्गहिदा म्हि । [अनुगृहीतास्मि ।]
भरतः—आर्य ! अभिवादये । भरतोऽस्मि ।
रामः—एह्येहि वत्स ! इक्ष्वाकुकुमार ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव ।
वक्षः प्रसारय कवाटपुटप्रमाण-
मालिङ्ग मां सुविपुलेन भुजद्वयेन ।
उन्नामयाननमिदं शरदिन्दुकल्पं
प्रह्लादय व्यसनदग्धमिदं शरीरम् ॥७॥
[अन्वयः—कवाटपुटप्रमाणं वक्षः प्रसारय । सुविपुलेन भुजद्वयेन माम्
आलिङ्ग । शरदिन्दुकल्पम् इदम् आननम् उन्नामय । व्यसनदग्धम् इदं शरीरं
प्रह्लादय ॥७॥
हिन्दी रूपान्तर—
राम—माताओं ! मैं अभिवादन करता हूँ ।
सब मातायें—पुत्र ! चिरञ्जीवी होओ । हमारा धन्य भाग्य है, जो हम
प्रतिज्ञा को पूरा करने वाले तुमको वधू के साथ कुशलपूर्वक देख रही हैं ।
राम—मैं अनुगृहीत हूँ !
लक्ष्मण—माताओ ! मैं अभिवादन करता हूँ ।
सब मातायें—पुत्र ! चिरञ्जीवी होओ ।
लक्ष्मण—मैं अनुगृहीत हूँ ।
सीता—आर्य ! मैं वन्दना करती हूँ ।
सब मातायें—वत्से ! सदा सुहागिन रहो ।
सीता—मैं अनुगृहीत हूँ ।
भरत—आर्य ! मैं अभिवादन करता हूँ । मैं भरत हूँ ।
राम—आओ, आओ वत्स इक्ष्वाकुकुमार ! तुम्हारा कल्याण हो आयुष्मान्
होओ ।
अथ [श्लोक ७]— [किवाड़ों के समान विशाल आकार वाले अपने वक्षःस्थल
को फैला लो । अति विशाल अपनी दोनों भुजाओं से मेरा आलिङ्गन कर लो ।
शरत्कालीन चन्द्रमा के समान इस सुन्दर मुख को ऊपर उठाओ । शोकरूप आपत्ति
से जले हुये इस शरीर को प्रसन्न कर दो ॥७॥