प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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सबको आनन्दित करने वाले ये आदरणीय राम यहाँ आ रहे हैं । तो आज इस
आश्रम में, हमारे तपोवन के ऐश्वर्य के योग्य अर्थात् वन में सुलभ जो भी सामग्रियाँ
अभीष्ट हो सकती हैं, उन सबकों तैयार कर लिया जावे ।
नन्दिलक—आर्य ! सब कुछ तैयार कर लिया है । किन्तु,
तपस्वी—किन्तु, यह क्या बात है ?
नन्दिलक—यहाँ विभीषण से सम्बन्धित राक्षस भी आये हैं। उनके भोजन
के लिये क्या सामग्री हो, इसमें कुलपति ही प्रमाण हैं।
टिप्पणी—
स्वदारापहारिणम्—स्वकीयान् दारान् अपहर्तुं शीलं यस्य तम् = स्व +
दार + अप + हृ + णिनि = स्वदारापहारिन् ।
त्रैलोक्यविद्राविणम्—त्रैलोक्यं विद्रावयितुं शीलं यस्य तम् = त्रैलोक्य + वि +
द्रु + णिच् + णिनि = त्रैलोक्यविद्राविन् ।
देवदेवर्षिसिद्धविमलचारित्राम्—दैवैः, देवर्षिभिः सिद्धैश्च प्रतिपादितं विमलं
चारित्रं यस्याः तादृशीम् । सीता के चरित्र पर राम ने सन्देह किया था । देवताओं ने
उसके चरित्र की निर्मलता प्रतिपादित की थी ।
शरद्विमलगगनचन्द्राभिरामः—शरदि विमले गगने चन्द्र इव अभिरामः ।
अभिरामयति = अभि + रम् + घञ् = अभिराम ।
अस्मद्विभवेन—आश्रम में वन्य फल-मूल = जल ही उपलब्ध होते हैं । वही
वहाँ का ऐश्वर्य है । उससे ही राम के आतिथ्य का प्रबन्ध किया जावे ।
विभीषणसम्बन्धिनो राक्षसाः—राक्षस नरमांस का भक्षण करते हैं । अतः
उनको भोजन में क्या दिया जावे, यह नन्दिलक को आशंका थी ।
तापसः—किमर्थम् ?
नन्दिलकः—ते खु खज्जन्ति । [ते खलु खादन्ति]
तापसः—अलमलं सम्भ्रमेण । विभीषणविधेयाः खलु राक्षसाः ।
नन्दिलकः—णमो रक्खससज्जणाअ । [नमो राक्षससज्जनायं]
(निष्क्रान्तः)
तापसः—(विलोक्य) अये अत्र भवान् राघवः ? य एषः—
जयः स्याद् द्वितीयस्तवारि-
स्तवभवतु विधया भूमिरैकातपत्रा ।
इति मुनिभिरनेकः स्तूयमानः प्रसन्नैः
क्षितितलमवतीर्णो मानवेन्द्रो विमानात् ॥१॥