परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
दीक्षाविधिः ५
सिद्धान्तप्रवर्त्तक सूत्रों में यह सर्वप्रथम और तत्त्वदृष्टि से महत्त्वपूर्ण सूत्र है।
पाँचों आम्नाय इसे सिद्धान्त रूप से स्वीकार करते हैं कि, यह जगत् ३६
तत्त्वात्मक है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। सर्वप्रथम केवल निजरूप में
ही परमशिव अवस्थित थे। उनमें "मैं एकाकी बहुरूपों अर्थात् अनन्तरूपों में व्यक्त
हो जाऊँ" इस प्रकार की इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मक शक्तियाँ उल्लसित हो गयीं।
इन शक्तियों के योग से क्रमशः अर्थ और शब्द की सृष्टि, अङ्कुर और प्रतिबिम्ब
की तरह एक साथ उत्पन्न हो गयी। इस प्रकार की सिसृक्षा से सिसृक्षु उपाधिविशिष्ट
परमशिव ही केवल 'शिव' पदवी से विभूषित हो गया। उसका अभिधेय शिव
हो गया। शिव ३६ तत्त्वों में प्रथम आदिम तत्त्व माना जाता है।
सिसृक्षा की वह शक्ति जो परमशिव में आद्यस्पन्द रूप से उल्लसित हुई,
वही शक्ति नामक द्वितीय तत्त्व है।
समग्र विश्व को अहमात्मक अङ्गीकृत कर 'सर्वं विश्वम् अहम्' इस वृत्ति
से विद्योतित 'सदाशिव' नामक तृतीय तत्त्व है।
यह विश्व है। यह भेदविषयक वृत्ति है। इस वृत्तिवाला तत्त्व ईश्वरतत्त्व
है। यह चतुर्थ तत्त्व है।
विश्वात्मक यह विस्तार मैं ही हूँ, इस प्रकार की सदाशिव सम्बन्धिनी
वृत्ति ही 'विद्या' है। यह पाँचवाँ तत्त्व है।
यह जगत् पार्थक्य प्रथा से प्रथित है। इसमें व्यापक पृथक् वृत्तिमयी
भेदविषयिणी ईश्वरनिष्ठा वृत्ति पृथक् तत्त्व मानी जाती है। यह वृत्ति ही माया
है। यह छठवाँ तत्त्व है।
ऊपर कथित विद्या को तिरोहित करने वाली शक्ति और विद्या की
विरोधिनी शक्ति को अविद्या कहते हैं। यह सातवाँ तत्त्व है।
जीव-निष्ठ सारा कर्त्तृत्व किञ्चित्कर्त्तृत्व से नितान्त संकुचित है। यह
सङ्कोचमयी वृत्ति ही कला है। इसे आठवाँ तत्त्व कहते हैं।
जीवनिष्ठा नित्यतृप्ति ही किन्हीं विषयों में अतृप्ति के कारण किन्हीं विषयों
में संकुचित होकर 'राग' संज्ञा से विभूषित हो जाती है। यह नवाँ तत्त्व है।
जीवनिष्ठ नित्यता, आच्छादित होने पर अस्ति (है), जायते (उत्पन्न होती
है), वर्धते (बढ़ती है), विपरिणमते (अधेड़ होकर परिणत होती है), अपक्षीयते
६ परशुरामकल्पसूत्रम्
(क्षीण होती है) और विनश्यति (नष्ट हो जाती है) इस छः प्रकार की
अस्तित्वगत गतिशीलता से प्रभावित और संकुचित होती है। यही काल नामक
कञ्चुक है। यह दशवाँ तत्त्व है।
परशिव और जीव में अभेद है। जैसे परशिव में सर्वस्वातन्त्र्य है, वैसा
ही स्वातन्त्र्य जीव में भी है। इसका पिधान अविद्या करती है। यह कारणसापेक्ष
प्रक्रिया है। नियति ही वह कारण है। यह नियति ही ग्यारहवाँ तत्त्व है।
जीव इन नियति, काल, राग, कला और अविद्यारूप ५ कञ्चुकों का
आश्रय बन जाता है। यह बारहवाँ तत्त्व है।
सत्त्व, रजस् और तमस् गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है। इसे एक-
दूसरे पर्याय चित्त शब्द से भी बोधित करते हैं। यह तेरहवाँ तत्त्व है। सत्त्व
और तमस् को अभिभूत कर वर्त्तमान रजःप्रधान संकल्प हेतु तत्त्व ही मन
कहलाता है। यह चौदहवाँ तत्त्व माना जाता है।
रजस् और तमस् को अभिभूत कर प्रवर्त्तित सत्त्वप्रधान अन्तःकरण निश्चय
का हेतु होता है। इसे बुद्धि तत्त्व कहते हैं। यह पन्द्रहवाँ तत्त्व है। रजस् और
तमस् को अभिभूत कर प्रवर्त्तित तमःप्रधान अहंकार तत्त्व विकल्पों का कारण
माना जाता है। यह सोलहवाँ तत्त्व है।
शब्दग्राहक इन्द्रिय श्रोत्र कहलाती है। यह सत्रहवाँ तत्त्व है।
स्पर्शग्राहक इन्द्रिय त्वक् अठारहवाँ तत्त्व है।
रूपग्राहक इन्द्रिय चक्षु उन्नीसवाँ तत्त्व हैं।
रसग्राहक इन्द्रिय रसना बीसवाँ तत्त्व है।
गन्धग्राहक इन्द्रिय नासिका इक्कीसवाँ तत्त्व है।
व्यक्तवागुच्चारक वागिन्द्रिय बाइसवाँ तत्त्व है।
ग्रहणत्यागानुकूल पाणि तेइसवाँ तत्त्व है।
गमनानुकूल पाद चौबीसवाँ तत्त्व है।
मलविसर्जनक पायु इन्द्रिय पचीसवाँ तत्त्व है।
मैथुनजनक उपस्थ इन्द्रिय छब्बीसवाँ तत्त्व है।
दीक्षाविधिः ७
सूक्ष्माकाशरूप शब्द सत्ताइसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म वायुरूप स्पर्श अट्ठाइसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म तेजरूप रूप उन्तीसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म जलरूप रस तीसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म पृथ्वीरूप गन्ध इकतीसवाँ तत्त्व है।
स्थूल अवकाशात्मक आकाश बत्तीसवाँ तत्त्व है।
सदागतिशीलता-गुणशाली वायु तैंतीसवाँ तत्त्व है।
उष्णतागुणशाली तेज चौंतीसवाँ तत्त्व है।
द्रवत्वगुणशाली तत्त्व जल पैंतीसवाँ तत्त्व है।
काठिन्यगुणवती पृथ्वी अन्तिम छत्तीसवाँ तत्त्व है।
इन छत्तीस तत्त्वों का संघात ही विश्व है। व्यवहार में इसे ही जगत् कहते
हैं। शास्त्रों में इसके अनन्त प्रमाण उपलब्ध हैं।।४।।
शरीरकञ्चुकितः शिवो जीवो निष्कञ्चुकः परशिवः।।५।।
एवं षट्त्रिंशत्तत्त्वानामपि सामान्यरूपेण पुनर्द्विस्वभावत्वम्-केषुचित् केवलं
दृश्यत्वम्, केषुचित् केवलं द्रष्टृत्वम्। आद्यं जडेषु। द्वितीयं केवलमिति।
ननु जीवस्य तत्त्वान्तःपातित्वात् परशिवस्यातथात्वाद् द्वयोर्भेद
आयातः। सर्वस्वतन्त्रः परशिवः स्वस्य मायया दुर्घटया स्वनिष्ठं यदन्यानपेक्ष-
त्त्वरूपं पूर्णं स्वातन्त्र्यं तदाच्छादयति। ततस्तिरोहितं यत् स्वातन्त्र्यं परिमितं
तदाणवमलमुच्यते। आणवमलमेव अविद्येत्यप्युच्यते।
एवमाणवेन मलेन छन्नः, तदा स्वयमणुदेहपरिमितः सन् अन्यान्
देहपरिमितान् अनन्तान् जीवान् स्वभिन्नत्वेन पश्यति। तन्मायिकं मलम्। एवं
भेदप्रथारूपमायिकमलेन मलिनाः शुभाशुभकर्म अनुतिष्ठन्तस्तज्जनित-
संस्कारवन्तो भवन्ति। तदेतत् कार्मं मलम्। एतादृशत्रिविधमलं शरीर-
पदेनोच्यते। तद्रूपं यत् कञ्चुकम् आच्छादनं तेन आवृतः शिव एव जीवः।
एतादृश-कञ्चुकरहितो यः स तत्त्वातीतः परशिव इत्यर्थः।।५।।
८ परशुरामकल्पसूत्रम्
छत्तीस तत्त्व भी सामान्यरूप से दृश्य और द्रष्टा रूप से दो भागों में
विभक्त हैं। जड़ों में दृश्यत्व और केवल तत्त्व में द्रष्टा का भाव। उसी तरह
निष्कञ्चुक परशिव और शरीर से कञ्चुकित जीव ये दो भाव होते हैं। जीव तत्त्व
भाव में परिगणित है। परशिव तत्त्ववाद से ऊपर है। यह दोनों में भेद है।
सर्वतन्त्रस्वतन्त्र परशिव अघटितघटनापटीयसी अपनी ही माया शक्ति द्वारा अपने
परम निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य को स्वयम् आच्छादित करता है। परिणाम-स्वरूप
आच्छादित परस्वातन्त्र्य परिमित स्वातन्त्र्य में परिणत हो जाता है। यही पारिमित्य
आणव मल कहलाता है। आणव मल को ही अविद्या भी कहते हैं।
आणव मल से आच्छन्न शिव स्वयम् अणुशरीर से परिमित हो जाता
है। इस अवस्था में वह अन्य अनन्त परिमित शरीराच्छन्न जीवों को स्वात्म से
भिन्न रूप में देखने लगता है। यह उसकी माया-परिच्छिन्न अवस्था है। इसे
मायिक मल कहते हैं।
यही भेदप्रथा मानी जाती है। जीव भेद-प्रथा से प्रथित परिमित प्रमाता
बन जाता है। ये जीव अब मायामलिन होकर अनन्त अनन्त शुभकर्मों को
अनुष्ठित करते हुए कर्मों के संस्कारों से प्रभावित होते रहते हैं। विवशता की
एक ऐसी परम्परा चल पड़ती है, जिसमें जीवजगत् की सक्रियता ही अभिशाप
बन जाती है। इसे कार्म मल कहते हैं।
यही तीनों आणव, मायिक और कार्ममल ही शरीर बनकर शरीरी को
कञ्चुक की कमनीयता प्रदान करते हैं। इस तरह शिव ही जीव भाव में पड़ा
भेदवाद की विभीषिका का उपभोग कर रहा है। यही शरीर कञ्चुकित शिव जीव
है। निष्कञ्चुक अर्थात् ऐसे कञ्चुकों से रहित तत्त्वातीत शिव ही परमशिव है॥५॥
एवं जीवेश्वरयोः स्वरूपमुक्त्वा कः पुरुषार्थ इति निर्दिशति-
स्वविमर्शः पुरुषार्थः ॥६॥
स्वस्य परशिवरूपस्य विमर्शः प्रत्यभिज्ञानं सोऽहमित्याकारकम्। यथा
कण्ठस्थं चामीकरं विस्मृत्य तदन्वेषणाय देशाद्देशं धावन् केनचिद् उद्बुद्ध-
संस्कारः कण्ठस्थं पश्यति तथा विस्मृतस्वरूपज्ञानस्य पुनर्लाभः पुरुषार्थः
अकृत्रिम इत्यर्थः। एतादृशपुरुषार्थलाभश्च न भगवत्कृपामृते भविष्यति। तदुक्तं
दीक्षाविधिः ९
भगवता श्रीकृष्णेन—'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते' (श्री.भ.
७।१४)। भगवत्प्रीतिश्च भगवदाराधनेनैव भवति। अतो भगवदाराधनं
परम्परया मोक्षसाधनम्॥६॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर के स्वरूप कथन के अनन्तर पुरुषार्थ क्या
होता है, इसका निर्देश कर रहे हैं कि,
स्वात्म का विमर्श ही पुरुषार्थ है।
अपने परशिवरूप का विमर्श अत्यन्त आवश्यक है। इसे प्रत्यभिज्ञान
कहते हैं। माया के प्रतीप आत्माभिमुख्यपूर्वक विमर्श से सोऽहम् अर्थात् मैं
परशिव हूँ, इस तरह का दृढ़ ज्ञान उत्पन्न होता है। इसे ही प्रत्यभिज्ञान कहते
हैं। विस्मृत ज्ञान का पुनः उपलब्ध करना ही पुरुषार्थ है।
जैसे गले का स्वर्णाभूषण वस्त्र से ढक जाय। उसे इधर-उधर खोजा जाने
लगे। किसी प्रबुद्ध दर्शक द्वारा निर्देश देने पर गले में है, यह ज्ञान हो जाय,
तो प्रसन्नता होती है। उसी तरह स्वात्मज्ञान उपलब्ध हो जाने पर परमपुरुषार्थ
की सिद्धि हो जाती है। ऐसा पुरुषार्थ-लाभ भगवत्कृपा के विना नहीं हो सकता।
इसी तथ्य को श्रीमद्भगवद्गीता (७।१४) द्वारा भगवान् कृष्ण कहते हैं कि, 'जो
मेरी शरण में आ जाते हैं, मेरी प्रपत्ति प्राप्त कर लेते हैं। वे ही इस दुस्तर
माया को पार कर पाते हैं।'
यह सत्य है कि, भगवत्प्रीति भगवान् की आराधना से ही होती है।
इसीलिये यह माना जाता है कि, भगवान् की आराधना परम्परा से मोक्ष-साधन
सिद्ध होती है॥६॥
वर्णात्मका नित्या शब्दाः॥७॥
वर्णात्मका वर्णसमुदायरूपाः शब्दा मन्त्रा नित्याः। मूलविद्या समसत्ताका
इत्यर्थः॥७॥
शब्द वर्णात्मक होते हैं। वर्णात्मकता का तात्पर्य वर्णसमुदायरूपात्मकता
से है। वर्णसमुदाय रूप शब्द ही मन्त्र होते हैं। ये नित्य होते हैं। मूल अविद्या
की समान-सत्ता वाले ये मन्त्र यद्यपि नित्य हैं फिर भी अज्ञान की निवृत्ति हो
जाने पर स्वात्मातिरिक्त किसी अन्य देवता के अनस्तित्व के कारण ज्ञानी के
१० परशुरामकल्पसूत्रम्
लिये इसके त्रैकालिक नित्यत्व का कोई महत्त्व नहीं रहता। यह ध्यान देने की
बात है कि, मन्त्र देवतावत् सूक्ष्म शरीररूप होते हैं। देवता के सूक्ष्म शरीर भी
अविद्या पर्यन्त ही अनुभूत होते हैं। अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर इनकी स्वतः
निवृत्ति स्वाभाविक है॥७॥
मन्त्राणामचिन्त्यशक्तिता ।।८।।
मन्त्राणामिति षष्ठी सप्तम्यर्थे, मन्त्रेष्वित्यर्थः। न चिन्त्या अचिन्त्या
शक्तिर्यत्र, ते अचिन्त्यशक्तयो मन्त्राः, तेषां भावस्तत्ता। अस्तीति शेषः। शक्तौ
अचिन्त्यत्वं च तर्काविषयत्वम्। एतेन पूर्वोदितमाया अतर्क्या दुर्वारा, तथापि
तन्निवारणे समर्था ततोऽपि अधिकशक्तिता मन्त्रेषु लीलया
ज्ञानावरकाविद्यानिर्वर्तकत्वशक्तिरस्तीति प्रतिपादितम् ।।८।।
सूत्र में मन्त्रशब्द से बहुवचन षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वस्तुतः सप्तम्यर्थ
में है। अतः उसका अर्थ करते समय सप्तमीवाचक अर्थ करना चाहिये। मन्त्रों
में अचिन्त्यशक्तिता होती है। यही व्यावहारिक प्रचलित प्रयोग है। मन्त्रों में ऐसी
शक्ति होती है, जो अचिन्त्य होती है। इनकी शक्ति के सम्बन्ध में कोई तर्क
नहीं किया जा सकता, अर्थात् मन्त्रों की शक्ति तर्क से परे है। यहाँ यह ध्यान
देने की बात है कि, माया की शक्ति भी अतर्क्य होती है। अन्तर इतना ही
है कि, मन्त्र की अतर्क्य शक्ति, माया की ज्ञान को आवृत कर लेने वाली अविद्या
शक्ति का भी निवारण कर देती है। अतः मन्त्रों में रहने वाली शक्ति माया शक्ति
को भी अतिक्रान्त कर विद्यमान रहती है॥८॥
सम्प्रदायविश्वासाभ्यां सर्वसिद्धिः ।।९।।
सम्प्रदायः गुरुपरम्पराऽऽचारानुसरणम्। विश्वासो मन्त्रेषु
फलसाधनत्वविषयको निश्चयः। आभ्यां सहितेन मन्त्रेण सर्वसिद्धिर्भवतीति
शेषः। यद्यपि लोके एकेन दण्डेन एकव्यापारेण घट एव भवति, न पटः।
एवं तुरीवेमादिना पट एव न घट इति। एवं सर्वकारणेषु लोके
नियतैककार्यजनकत्वं दृष्टम्। तथापि मन्त्रेषु न तथा। एक एव मन्त्रो
यद्यदीप्सितं तत्सर्वं जनयति इति ज्ञापयितुं सर्वपदम्। एतेन श्रोतॄप्रवृत्तये
मन्त्रवर्त्तिगुणोऽपि प्रतिपादितो भवति ।।९।।
दीक्षाविधिः ११
मन्त्र-सिद्धि के सहकारी कारण होते हैं। मन्त्रों से अभीप्सित कार्य की
सिद्धि के उद्देश्य से उनका वर्णन कर रहे हैं।
सूत्र में तीन शब्द हैं—१. सम्प्रदाय, २. विश्वास, ३. सर्वसिद्धि। इन
तीनों शब्दों का औपासनिक दृष्टि से अप्रतिम महत्त्व है। क्रमशः इन शब्दों की
परिभाषा के साथ इनका विश्लेषण उचित है और प्रासङ्गिक
भी है—
१. सम्प्रदाय
गुरु परम्परा के अनुसार निर्धारित आचारों के समर्थक मान्य सिद्धान्त
अर्थात् आचार्य-प्रवर द्वारा प्रवर्त्तित परम्परा पद्धति। गुरु द्वारा प्रवर्त्तित सिद्धान्त
आध्यात्मिक अनुभूतियों पर आधृत होते हैं। उनका अनुसरण स्वात्मोत्कर्ष का
साधक माना जाता है।
२. विश्वास
गुरु में, गुरु द्वारा प्रदत्त मन्त्रों में, शास्त्रों में और भगवत्सत्ता में सिद्धि
और साफल्य का निश्चय ही विश्वास माना जाता है।
३. सर्वसिद्धि
(गुरु द्वारा प्रवर्त्तित सिद्धान्तों और आचारों के अनुसरण और दृढ आस्था
से) सभी प्रकार की और सारी सिद्धियाँ अवश्य होती हैं। प्रकरण मन्त्रों का
है। इसलिये यह कह सकते हैं कि, सम्प्रदायानुसार विश्वासपूर्वक मन्त्रों के प्रयोग
से सारी सिद्धियाँ सम्भव हैं।
इसे एक उदाहरण से समझें। लोक में देखा जाता है कि, कुम्भकार द्वारा
एक दण्ड से घूर्णि देने के एक व्यापार से घट का ही निर्माण होता है, पट
का निर्माण नहीं होता। इसी तरह अनन्त कारणों से अनन्त कार्य (नियत कारण
से नियत कार्य रूप से ही) सम्पन्न होते हैं। जैसे तुरी और वेमा के प्रयोग
से पट रूप कार्य ही होते हैं, घड़ा रूप कार्य नहीं होता।
मन्त्रों में ऐसी बात नहीं। लोकदृष्ट व्यवहारवाद के विपरीत एक मन्त्र की
सिद्धि से ही सारी अभिलषित इच्छायें सिद्ध हो जातीं हैं। अर्थात् एक कारण
१२ परशुरामकल्पसूत्रम्
से विनियोगानुसार समस्त ईप्सित कार्य पूर्ण हो जाते हैं। यह मन्त्रों की महती
गुणवत्ता है। मन्त्र-माहात्म्य को जानकर सम्प्रदाय और विश्वास के अनुसार सारी
सिद्धियाँ हस्तामलकवत् सिद्ध हो जाती हैं।।९।।
जिज्ञासु पूछता है कि, गुरुवर्य! लोकविरुद्ध अर्थ प्रदान करने वाला यह
सूत्र-वाक्य कैसे प्रामाणिक माना जा सकता है? गुरुदेव इस आशङ्का का समाधान
सूत्र के माध्यम से ही कर रहे हैं—
विश्वासभूयिष्ठं प्रामाण्यम्।।१०।।
प्रामाण्यं संवाद-प्रवृत्तिजनक-तद्धतितत्प्रकारकज्ञानजनकत्वम्। सर्वसिद्धि-
रिति वाक्यनिष्ठं विश्वासभूयिष्ठम्। अत्र विश्वासपदार्थश्च वाक्यप्रयोक्तरि आप्त-
त्वनिश्चयः। बहुशब्दाद् अतिशयार्थे इष्ठन्प्रत्ययः। तत्र पाणिनिसूत्रम्
“अतिशायने तमबिष्ठनौ” अतिशय-विशिष्टार्थवृत्तेः स्वार्थे एतौ स्तः।
“बहोर्लोपो भू च बहोः” इति इडागमे च भूयिष्ठशब्देन अत्यन्तबहुत्वविशिष्टः
पुरुषार्थः। पुरुषे विश्वासभूयिष्ठत्वं च स्वोत्तरोत्पन्नत्वस्वविषयविषयकत्वसम्बन्धेन
च विश्वासविशिष्टशङ्काऽनधिकरणत्वं, तदाश्रयपुरुषेण सममभेदान्वयस्य
बाधितत्वात्। भूयिष्ठपदस्य भूयिष्ठाश्रयज्ञानविषये लक्षणा। तस्य प्रामाण्ये
अभेदान्वयः अत्यन्तविश्वासवत्पुरुषैकवेद्यम् एतच्छास्त्रप्रामाण्यमित्यर्थः।
कुतर्कशालिनां शास्त्रप्रामाण्यं सर्वथा अगम्यमिति भावः। तदुक्तं भट्टपादैः—
“शास्त्रैकगम्या ये ह्यर्था न ताँस्तर्केण दूषयेत्” ।।१०।।
प्रमाण के भाव को प्रामाण्य कहते हैं। प्रामाण्य में ज्ञानजनकता होती है।
किसी वस्तुविषयक संवाद का प्रवर्तन व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।
कोई वस्तु जिन विशेषणों से विशिष्ट है, उससे उसी प्रकार का ज्ञान होता है।
प्रामाण्य का ज्ञानजनकत्व स्वतःप्रामाण्यवाद के समर्थक कुमारिलभट्ट के अनुसार
सिद्ध माना जाता है। जैसे घड़ा मेरे द्वारा ज्ञात है। इस प्रयोग में ज्ञान की प्रमा
वाला मैं हूँ क्योंकि तथाविधज्ञातंता से मैं युक्त हूँ। यही तद्वान् में तत्प्रकारक
ज्ञान कहलाता है।
सर्वसिद्धि विश्वास पर निर्भर करती है। यह सूत्र सं. ९ में स्पष्ट किया
जा चुका है। गुरुवाक्य में विश्वास-भूयिष्ठता सिद्धि की हेतु मानी जाती है। जहाँ
दीक्षाविधि: १३
तक विश्वास का प्रश्न है, यह वहीं होता है, जहाँ वाक्य प्रयोक्ता के प्रति यह
निश्चय होता है कि, यह प्रयोगकर्त्ता 'आप्त' पुरुष है।
अतिशायने अर्थ में 'तमप्' और इष्ठन् प्रत्यय होते हैं। यह पाणिनि सूत्र
(५।३।५५) का अर्थ है। बहु को भू आदेश और इट् का आगम होने पर
भूयिष्ठ शब्द व्युत्पन्न होता है। बहुत्व विशिष्ट पुरुषार्थ की अपेक्षा इसमें निहित
है। पुरुष में विश्वास की भूयिष्ठता उत्तरोत्तर उत्पन्न विश्वास के उत्कर्ष की सूचना
देती है। विश्वास विशिष्ट भूयिष्ठता इसका अर्थ नहीं करना चाहिये। यहाँ भूयिष्ठता
का आश्रय ज्ञान है। अतः अत्यन्त विश्वास सम्पन्न पुरुष द्वारा वेद्य ही इस शास्त्र
का प्रामाण्य है, यह इस सूत्र का निष्कर्षार्थ होता है। कुतर्कशाली पुरुष को
शास्त्र प्रामाण्य अगम्य ही रहता है। इसी तथ्य का समर्थन कुमारिल भट्ट की
इस उक्ति से होता है—
“जो अर्थ एकमात्र शास्त्र के द्वारा ही गम्य हैं, उन्हें तर्कों द्वारा दूषित
नहीं करना चाहिये।”
भूयिष्ठ ज्ञान का प्रामाण्य से अभेदान्वय सम्बन्ध ही यहाँ अपेक्षित
है॥१०॥
सहकार्यान्तरमाह
गुरुमन्त्रदेवताऽऽत्मनःपवनानाम् ऐक्यनिष्फालनादन्तरात्म-
वित्तिः ।।११।।
गुर्वादयः स्पष्टाः। पवनाः पञ्चप्राणाः। एतेषामैक्यनिष्फालनं भावनया
एकत्वसम्पादनम्, तेन अन्तरात्मनः प्रत्यगात्मनो वित्तिर्वेदनं भवतीति शेषः।
जपरूपोपास्तिफलम्
सम्प्रदायविश्वास-सहित-मन्त्रकरणकोपास्तेः फलमाह— ऐक्यनिष्फालन-
मैक्युनिर्णयः, तद्द्वारा प्रत्यगात्मज्ञानं भवतीति विशिष्टार्थः।
उमानन्दनाथास्तु
गुरुमन्त्रेत्यस्य आरम्भोल्लासे गुरुमन्त्रदेवतात्मनामैक्यभावनम् एकं
साधनं, मनःपवनयोरेकयत्ननिरोद्धव्यत्वज्ञानं चापरं, द्वाभ्यां कार्यसिद्धिरिति
व्याचक्रुः ।।११।।
१४ परशुरामकल्पसूत्रम्
इस सूत्र में गुरु, मन्त्र, देवता, आत्मा और मन इन अत्यन्त सहकारी
कारणों के साथ पवन रूपी पाँच प्राणों की गणना की गयी है। ये सभी मन्त्र
की सिद्धि के सहकारी कारण हैं। मन्त्र भी मन्त्रसिद्धि का सहकारी कारण होता
है। इसके साथ ही गुरु आदि तत्त्वों के ऐक्यनिष्फालन अर्थात् भावनात्मक
ऐक्य सम्पादन से अन्तरात्मा की वित्ति होती है। इस सूत्र में प्रयुक्त निष्फालन
शब्द का अर्थ सम्पादन किया गया है। वस्तुतः निष्फालन परिणामोत्पादन अर्थ
में प्रयुक्त होना चाहिये। यह सम्पादन की चरितार्थता में ही समाहित है। ऐक्य
सम्पादन के परिणामस्वरूप प्रत्यगात्मा का वेदन होता है, यह वृत्तिकार का
पक्ष है।
एक दूसरा पक्ष यह कहता है कि, निष्फालन का अर्थ निर्णय होता है।
गुरु मन्त्र आदि कारणों के द्वारा की गयी उपासना के माध्यम से इनके ऐक्य
का निर्णय हो जाता है और इस निर्णय के उपरान्त ही प्रत्यगात्म संवेदन सिद्ध
होता है। इसका तीसरा पक्ष आचार्य उमानन्द नाथ द्वारा प्रतिपादित है। इनके
अनुसार गुरु, मन्त्र, देवता और आत्म का ऐक्य भावन एक अलग साधन है।
मन और पवन इन दोनों के एक साथ यत्नपूर्वक निरोध का ज्ञान दूसरा साधन
है। इन दोनों के ऐक्य निष्फालन से प्रत्यगात्मा का संवेदन होता है। आचार्य
रामेश्वर इस पक्ष को चिन्त्य मानते हैं।।१९।।
अर्चनरूप उपास्तिविधिः
एतावत्पर्यन्तं मन्त्रस्तुत्या तत्सहकारिकारणस्य कथनेन च मन्त्रकरणक-
क्रियातद्विधिरुन्नेयः। तथा च तादृशी जपरूपैव। एवं जपरूपास्तिं निरूप्य
पूजारूपामुपास्तिं विधत्ते—
आनन्दं ब्रह्मणो रूपम्। तच्च देहे व्यवस्थितम्। तस्याभि-
व्यञ्जकाः पञ्चमकाराः, तैरर्चनं गुप्त्या प्राकट्यान्निरयः।।१२।।
यथा चिद्रूपं ब्रह्म एवम् आनन्दरूपमपि। ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म।’ इति
श्रुतेः। यथा चिद्रूपमावृतमज्ञानेन न जानाति एवमानन्दस्वरूपमपि दुःखैनावृतं
न जानाति। यदा कदाचिद् भारादिरूपदुःखापगमे ब्रह्मणः परिच्छिन्नं रूपं
शरीरावच्छेदेन सम्प्रत्यपि जानाति तादृशानन्दः परिच्छिन्नो देहे देहावच्छेदेन
दीक्षाविधिः १५
व्यवस्थितः। तस्य अभिव्यञ्जकास्तद्विषयकसाक्षात्कारजनकाः पञ्चमकाराः।
एतदन्तेन विधीयमान-द्रव्यस्तुतिः अनुष्ठातृ-प्रवृत्तये यत ईदृशाः श्रेष्ठा
मकाराः। अतस्तैरर्चनं गुप्त्या अप्राकट्येन, कुर्वीतेति शेषः। गुप्तिद्रव्योभय-
विशिष्टार्चनरूपं कर्म अनेन विधीयते॥१२॥
ब्रह्म की परिभाषा करते हुए मनीषियों ने कहा है कि, ब्रह्म चिद्रूप है।
इसी सन्दर्भ में भगवान् परशुराम कहते हैं कि, आनन्द भी ब्रह्म का रूप है।
भगवती श्रुति कहती है—"विज्ञान और आनन्द दोनों ब्रह्म हैं।"
जैसे अज्ञान से आवृत होने के कारण ब्रह्म के 'चिद्' रूप को सामान्य
अणु पुरुष नहीं जानता, उसी प्रकार दुःख से आवृत 'आनन्द' स्वरूपता का
ज्ञान भी उसे नहीं होता। मनुष्य कभी भार ढोने का काम करता है। अत्यधिक
भार दुःखदायी होता है। भार उतार देने पर सुख की साँस लेता है। वह सुख
क्या है? वह ब्रह्म का ही परिच्छिन्न रूप है। शरीर के माध्यम से वह अनुभूत
होता है।
उसी प्रकार आनन्द भी परिच्छिन्न है। देह में देह के माध्यम से व्यवस्थित
है। इस आनन्द का अभिव्यञ्जन कैसे होता है? यह सोचने पर ज्ञात होता है
कि, इसके साक्षात्कार के कारण रूप पाँच मकार हैं। एक नयी बात यह भी
मालूम होती है कि, देहरूप द्रव्य और पञ्चमकाररूप द्रव्यों से चिदानन्द का
साक्षात्कार हो सकता है। अनुष्ठाता इन दो माध्यमों से आनन्दोपलब्धि के लिए
पूजा में प्रवृत्त होता है।
एक नयी जिज्ञासा यहाँ उत्पन्न होती है। पञ्चमकारों से अर्चन कैसे किया
जाय। प्रकट रूप से या गोपन भाव अपना कर? सूत्रकार कहते हैं कि, 'गुप्ति'
के द्वारा अर्थात् प्रकट न करते हुए गोपन भाव से पूजा में प्रवृत्त होना चाहिये।
प्राकट्य से 'निरय' की प्राप्ति होती है। इस सूत्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि,
गुप्ति का परमेश्वर साक्षात्कार में अप्रतिम महत्त्व है। दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान
पञ्चमकारों का है। इन दोनों से विशिष्ट अर्चनरूप कर्म के विधायक इस सूत्र
द्वारा उपासना का द्वार अनावृत हो जाता है॥१२॥
एवमुपासनामुक्त्वा उपासकधर्मान् आह
भावनादार्ढ्यादाज्ञासिद्धिः ॥१३॥
१६ परशुरामकल्पसूत्रम्
उपासकधर्मः भावनादार्ढ्यम्। 'अहमिदं जानामि' इत्येतादृशवृत्तिषु इदं
पदार्थपेक्षया अहंतया भासमानं श्रेष्ठमिति विवेचनम्-सर्ववृत्तिषु इदमेव भावना-
पदार्थः। तस्य दार्ढ्यम् अशैथिलता। अनेन आज्ञासिद्धिः, निग्रहानुग्रहसामर्थ्यं
भवतीति शेषः। भावनादार्ढ्यस्तुत्या सर्वदा ईदृशभावनाविधिरुन्नेयः॥१३॥
उपासक का सबसे बड़ा धर्म है, भावना की दृढ़ता। भावना क्या है,
इसे समझाते हुए वृत्तिकार कहते हैं कि, जब कोई 'मैं यह जानता हूँ' इस वाक्य
का प्रयोग करता है, तो इस प्रयोग में 'यह' कर्म पदार्थ प्रधान नहीं होता वरन्
ज्ञानवान् 'मैं' की ही प्रधानता होती है। सारे व्यवहार जगत् में गौणत्व और
प्रधानत्व का बोध ही भावना है। भावना एक प्रकार से वास्तविक विवेचना ही
होती है। शैथिल्य के लिये इसमें स्थान नहीं होता। इससे निग्रह और अनुग्रह
की शक्तिरूपी आज्ञा की सिद्धि होती है। भावना की दृढ़ता सर्वत्र अपनानी
चाहिये॥१३॥
उपासकस्य नियमान्तरमाह
सर्वदर्शनानिन्दा ॥१४॥
इतरदेवतोपासनाविधायकानि यानि दर्शनानि शास्त्राणि तेषां निन्दा न
कर्त्तव्येत्यर्थः। तन्निन्दने तदधिकारिणां संशयोत्पत्त्या स्वावलम्बितदर्शनेष्व-
नाश्वासः। अस्मिन् शास्त्रे अनधिकाराद् उभयभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्येत्।
इममेवार्थं श्रीकृष्णोऽप्याह—
'न बुद्धि-भेदं जनयेदज्ञानां कर्म-सङ्गिनाम्' ।
'लोकान्न निन्द्यात्' इति श्रुतिरपि ॥१४॥
संसार में जितने दर्शन हैं, किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिये। बहुत
से ऐसे दर्शन हैं और शास्त्र हैं, जो अन्यान्य देवोपासना का विधान करते हैं।
यद्यपि वे स्वात्मस्वीकृत मान्यता के विपरीत होते हैं, फिर भी उनकी निन्दा
कदापि नहीं करनी चाहिये। निन्दा से उसके अनुयायियों के विश्वास में भेद उत्पन्न
होने की सम्भावना होती है। आस्था-शैथिल्य बड़ा भारी दोष है। इससे जैसे
बिखरे बादल नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह स्व और पर दोनों में विश्वास की
कमी से उपासक उभयतः भ्रष्ट हो जाता है।
दीक्षाविधिः १७
श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं— “कर्म में आसक्त अज्ञ पुरुषों में बुद्धि-
भेद नहीं उत्पन्न करना चाहिये।”
भगवती श्रुति भी यही निर्देश देती है कि, लोक अर्थात् लोगों या लोक-
प्रचलित मान्यताओं की निन्दा नहीं करनी चाहिये।।१४।।
तृतीयं धर्ममाह
अगणनं कस्यापि ।।१५।।
स्वशास्त्रविरुद्धं यदि गीर्वाणगुरुर्वदेत्तर्हि स गुरुरिति गणनं न कर्तव्यम्।
अत एव श्रुतिरपि—“न गणयेत् कमपि” इति।।१५।।
स्वात्म स्वीकृत दर्शन, उपासना अथ च शास्त्र के प्रति आस्था की दृढता
को यह सूत्र कट्टरता तक ले जाने का आदेश दे रहा है। यह कहता है कि,
हमारे दर्शन, हमारी उपासना पद्धति, हमारे सम्प्रदाय और शास्त्र के सामने सारी
मान्यतायें नगण्य हैं। हमारे शास्त्र के विरुद्ध यदि देवगुरु बृहस्पति भी कुछ
कहते हैं, तो हम उसे मानने के लिये तैयार नहीं। स्वात्मोपासना पद्धति के
विरुद्ध प्रतिवाद करने वाला कथमपि गुरु नहीं कहा जा सकता। यह हमारा दृढ
सिद्धान्त है।।१५।।
चतुर्थमाह
सच्छिष्ये रहस्यकथनम् ।।१६।।
कर्तव्यमिति शेषः। परिसंख्याविधिरियम्। ‘आत्मरहस्यं न वदेत्’ इति
निषेधस्यापवादोऽयम्। न तु गुप्त्याऽर्चनं इत्यस्यापवादः। तथा सति
शिष्यातिरिक्तेषु (सामयिकेषु) (पूजाप्राकट्यानापत्तेः। अतः इदम्)।
आत्मरहस्यं स्वसिद्धान्तरूपं सामयिकेषु शिष्यभिन्नेषु न कथयेत्। सच्छिष्ये
कथयेदित्यर्थः ।।१६।।
योग्य शिष्य यदि सम्प्रदाय निकष पर खरा उतर रहा हो, तो उसे
सम्प्रदाय-सिद्ध रहस्य का बोध कराने के उद्देश्य से गोपनीय बातों का भी उसको
बताना आवश्यक माना जाता है। सूत्र का यह विधान परिसंख्या विधि के
अनुसार किया गया है। परिसंख्या विधि मीमांसा दर्शन स्वीकृत विधि है। जब
१८ परशुरामकल्पसूत्रम्
आत्यन्तिक अप्राप्ति हो, उस समरा कोई नियम बना दिया जाय, उसे विधि
कहते हैं। रहस्य कथन का निषेध है। इस स्थिति में नियम बनाया गया कि,
सच्छिष्य में कथन होना चाहिये। यह विधि है। परिसंख्या पक्ष में होती है। जैसे
मन्त्र गोपन का निषेध है अथवा 'अपना रहस्य नहीं बताना चाहिये, इस निषेध
का अपवाद उक्त नियम है। अर्चन में भी गोपन प्राप्त है। रहस्य कथन में भी
गोपन प्राप्त है। मन्त्र प्रदान में भी गोपन प्राप्त है किन्तु सच्छिष्य में यह विधि
बन गया है। इसलिये यह परिसंख्या विधि है। साहित्य में परिसंख्यालङ्कार भी
इससे मिलता-जुलता है। इसलिये स्वात्मस्वीकृत रहस्य को जिसे व्यक्ति अपना
सम्प्रदायनिष्ठ सिद्धान्त मानता है, उसे समय पालन में संलग्न सामयिक शिष्यों
को प्रदान करने में कोई विप्रतिपत्ति नहीं होनी चाहिये किन्तु शिष्य के अतिरिक्त
अन्य के प्रति कभी भी किसी अवस्था में भी इसे प्रदान नहीं करना चाहिये,
यह शास्त्रकार का मन्तव्य है॥१६॥
पञ्चमधर्ममाह
सदा विद्यानुसंहतिः ।।१७।।
सदा सर्वकालं पूजादिविहितनित्य-कर्मानुष्ठान-कालव्यतिरिक्ते सर्वदेत्यर्थः।
विद्यायाः स्वोपास्य-देवतावाचक-मन्त्रस्य अनुसंहतिस्तत्प्रतिपादितार्थस्य
अनुसन्धानं, कर्तव्यमिति शेषः।
यद्वा अनुसंहतिर्मनसा जपः कार्य इत्यर्थः। न च आसनादि-
नियमरहितस्य जपो युक्त इति शङ्कनीयम्, मानसे कस्यापि नियमस्याभावात्।
तदुक्तं परमानन्दतन्त्रे—
मानसेऽनन्तगुणितं नियमस्तत्र नैव तु।
गच्छन् शयान आसीनो मुक्तो वा यत्र कुत्रचित्।
अस्नातश्चापवित्रश्च न दोषस्तत्र विद्यते॥१७॥
यहाँ सदा शब्द शाश्वत और अजस्र अर्थ में प्रयुक्त नहीं है। समय के
उस काल खण्ड में जिसमें दैनन्दिन नित्य कर्मों का अनुष्ठान उपासक करता
है, उसकी गणना इस सदा के परिवेश में नहीं की जाती। उस काल को छोड़
कर जो समय बचता है, स्वप्न और सुषुप्ति से जो समय बचता है, उसमें
'सदा' अव्यय का प्रयोग किया गया है।
द्वितीय एवं तृतीय खण्ड: गणपति एवं श्यामला (मातङ्गी) क्रम
दीक्षाविधिः १९
जहाँ तक विद्या शब्दार्थ का प्रश्न है, यह अपने उपास्य इष्ट देवता के
वाचक मन्त्र के लिये ही प्रयुक्त है। इसी इष्टमन्त्र की जिसे गुरुमन्त्र भी कहते
हैं, उसकी अनुसंहति होनी चाहिये। 'अनुसंहति' शब्द अनुसन्धान अर्थ में प्रयुक्त
है। अनुसन्धान मन्त्रों में प्रतिष्ठित दिव्य रहस्यार्थों का ही किया जाता है।
अनुसंहति शब्द का एक अन्य अर्थ भी लगाया जा सकता है। वस्तुतत्व
का अनुसन्धान सदा मानसिक होता है। अतः सदा अनुसंहति शब्द मानस जप
की ओर संकेत करता हुआ प्रतीत होता है, आसन आदि नियमों से रहित जप
नहीं हो सकता, इस प्रकार की आशङ्का मानस जप में नहीं करनी चाहिये।
परमानन्दतन्त्र में स्पष्ट लिखा हुआ है कि,
“मानस जप का अनन्तगुना फल होता है। इसमें किसी प्रकार के नियम
की कोई आवश्यकता नहीं होती। यह चलते-फिरते सोते-जागते, उठते-बैठते,
खाते-पीते किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। इसमें स्नान भी आवश्यक
नहीं होता। कभी अपवित्रता का अवसर भले आ जाय, उसमें भी इसे करना
चाहिये।”
इस सूत्र में प्रयुक्त सदा, विद्या और अनुसंहति शब्द अपने वैशिष्ट्य का
पूरा ख्यापन कर रहे हैं।।१७।।
षष्ठं धर्ममाह
सततं शिवतासमावेशः ।।१८।।
'सततम्' अस्याप्यर्थः पूर्वसूत्रस्थ-सदा-शब्दवत्। शिवतायाः समावेशः
आविर्भावः कर्त्तव्य इति शेषः। नित्यकर्मानुष्ठानव्यतिरिक्तकाले शिवोऽहमस्मीति
भावयेद् इति तात्पर्यम्।
वस्तुतस्तु पूर्वधर्मेण सहायं विकल्प्यते। अन्यथा उभयोर्भावनयो-
र्युगपत्सम्पादनासम्भवात्। पूजादि-व्यतिरिक्तकाले अन्यतरस्यानुष्ठानमिति भावः।
यद्वा— पूर्वधर्मो मन्दाधिकारिणः। अयं मुख्याधिकारिणः।।१८।।
पूर्वसूत्र 'सदा विद्यानुसंहतिः' में सदा शब्द जिस अर्थ को अभिव्यक्त कर
रहा है, उसी अर्थ में इस सूत्र में प्रयुक्त 'सतत' शब्द का भी व्यवहार किया
गया है। शिवतासमावेश में षष्ठी तत्पुरुष है। शिव का धर्मानुगुण्य ही शिवत्व
२० परशुरामकल्पसूत्रम्
है। उसका समावेश अर्थात् आविर्भाव। शिवत्व का अविर्भाव करना चाहिये।
नित्यकर्मों का अनुष्ठान करने के बाद यह भावन करना चाहिये कि, 'मैं स्वयं
शिव हूँ'। इस सूत्र का यही तात्पर्य है।
वास्तविकता यह है कि, शिवत्व का भावन एक वैकल्पिक कर्त्तव्य है।
पहले नित्य कर्म का विकल्प। पुनः शिवत्व भावन का विकल्प। दोनों भावों
का युगपद् सम्पादन असम्भव है। पूजादि के बाद इसका अनुष्ठान ही होना
चाहिये।
इसका एक अन्य अर्थ भी विचारणीय है। पूर्वधर्म मन्द अधिकारी का
धर्म है और यह मुख्य अधिकारी का धर्म है।
वस्तुतः मेरे विचार से इस सूत्र का ऊपर प्रतिपादित अर्थ आगमिक
परम्परा के पूर्णतः प्रतिकूल है। समावेश भावना नहीं एक दशा है। भावन में
भावना अर्थात् मानस अनुसन्धान होता है। समावेश अकिञ्चित् चिन्तन की
निर्विकल्प दशा की रूढि है। समावेश में गुरु द्वारा कृत शक्तिपातजन्य प्रतिबोध
का उल्लास करना नहीं पड़ता, वरन् वह स्वयं स्पन्दमान रहता है। इसका सतत
शब्दार्थ पूर्वसूत्रवत् नहीं है। इसके सातत्य का अर्थ उस दशा से शाश्वत अप्रच्याव
है। शिवता समावेश का षष्ठ्यर्थ सप्तम्यर्थ गर्भ है। पहले अणु था। पार्थक्य
प्रथा से प्रथित था। अब वह स्वयं शिव है। शिवत्व से शिवत्व में समाहित
है। तत्त्वेन प्रवेष्टुं प्रयत्नशील नहीं है, वरन् समा चुका है। वह शिव हो चुका
है। यह समावेश दशा है। शिवतासमावेश शाम्भव समावेश है। यह श्रीचक्र
साधक का सर्वातिशायी धर्म है। इसका मुख्याधिकारी वाला विकल्प आगमिकता
के अनुकूल है।।१८।।
सप्तममाह
काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्याविहित-हिंसा-स्तेय-
लोक-विद्विष्टवर्जनम्।।१९।।
कामो वैषयिकी इच्छा। इदं मे भूयादित्याकारिका क्रोधस्तमस उद्रेकेण
जनितोऽसौ अन्तःकरणधर्मः। लोभो द्रव्यादिनिष्ठस्वत्वत्यागप्रतिबन्ध-
कोऽत्यन्तमनुरागविशेषः। मोहः, कार्याकार्याविचारणम्। मदो गर्वः। मात्सर्यं
दीक्षाविधिः २१
द्वेषजनितो गुणिनि दोषारोपः। अविहितहिंसा, रागेण भक्षणार्थं पश्वादिवधः।
स्तेयं, पराननुमत्या परद्रव्यहरणम्, लोकविद्विष्टं, मातृबुद्ध्याऽपि एकान्ते
परस्त्रीसंलापादि। एतेषां वर्जनं त्यागः कर्त्तव्य इति शेषः॥१९॥
वैषयिकी इच्छा को काम कहते हैं। 'मुझे यह वस्तु मिल जाय' इस विषय
सम्बन्धी इच्छा को काम मानते हैं। क्रोध में तामसिकता का उद्रेक होता है।
यह अन्तःकरण का धर्म है। द्रव्य में अधिकारी का स्वत्व होता है। इस स्वत्व
के त्याग के साथ द्रव्य दूसरे को साधिकार देना दान है किन्तु इसका प्रतिबन्धक
आत्यन्तिक अनुराग पूर्व लिप्सा ही लोभ है। मोह में कार्य और अकार्य का
विचार नहीं होता क्योंकि इसमें चेतना अपना काम नहीं कर पाती। मद
मूर्खतापूर्ण गर्व होता है। मात्सर्य में द्वेषभाव से अच्छे पुरुष में दोष दिखायी
पड़ने लगते हैं। हिंसा दो प्रकार की होती है— १. विहित और २. अविहित।
वैदिकी हिंसा विहित मानी जाती है। मांस खाने की तामसी इच्छा से पशुवध
अविहित हिंसा मानी जाती है। स्तेय विना स्वामी की अनुमति के उसका द्रव्य-
हरण करना कहलाता है। यद्यपि ये सारी क्रियायें और आचरण लोकविरुद्ध हैं,
फिर भी कुछ ऐसे कार्य होते हैं, जो प्रत्यक्षतः लोकविद्वेष के कारण बन जाते
हैं। जैसे मातृ-भावन अपनाकर दूसरी स्त्री से एकान्त में बातें करना आदि। इन
सब का वर्जन आवश्यक है।
भगवान् परशुराम श्रीविद्या के उपासक को आदर्श चरित पुरुष के रूप में
देखना चाहते हैं। यह आशा स्वाभाविक है कि, उपासक सर्वगुणसम्पन्न हो। यह
भी सच्चाई है कि, इन दुर्गुणों का त्याग सामान्य स्तर के व्यक्ति के लिये असम्भव
है। इस सूत्र में जिस पुरुष का प्रकल्पन किया गया है, वह साधना के सोपानों
को पार कर पारमेश्वर शक्तिपात का अधिकारी हो जाता है। केवल कथन से यह
सम्भव नहीं। आयास-साध्य उपासकधर्म अपनाना आवश्यव है॥१९॥
अष्टमं धर्ममाह
एकगुरूपास्तिरसंशयः॥२०॥
न विद्यते संशयो यत्रेति विग्रहेण असंशय इत्येकगुरूपास्ति-
विशेषणम्, भिन्नलिङ्गत्वमार्षम्।
२२ परशुरामकल्पसूत्रम्
अयं भावः—अनेकगुरूपास्तौ पूर्वगुरूक्तविरुद्धं यदि वदेत् तर्हि संशयो
भवेदेव।
एकगुरूपास्तौ न संशयो भवेत्। अत एकगुरूपास्तिः कार्येति भावः।
गुरूपास्तेः 'सम्प्रदायविश्वासाभ्याम्' इति पूर्वसूत्रेणैव प्राप्तौ पुनर्विधानम्
एकं गुरुमाश्रित्य न गुर्वन्तरमाश्रयेद् इति इतरगुर्वाश्रयनिवृत्तिफलकेयं
परिसंख्या॥२०॥
असंशय शब्द का अर्थ करते समय नञ् समास का अभाव अर्थ और
संशय इन दोनों का साथ विचार करना चाहिये। इस आधार पर कहा जा सकता
है कि, जहाँ संशय का अभाव हो, उसे असंशय कहते हैं। पूरे सूत्र का इस
सन्दर्भ में अर्थ होता है— एक गुरु की उपासना संशयरहित होनी चाहिये।
असंशय शब्द में पुंलिङ्ग प्रयोग और उपास्ति का स्त्रीलिङ्ग प्रयोग आर्ष प्रयोग
है। इस तरह असंशय शब्द उपास्ति का विशेषण सिद्ध हो जाता है।
गुरु शब्द से यहाँ दीक्षागुरु अभिप्रेत है। गुरु ज्ञान के प्रकाश से शिष्य
के जीवन को धन्य बना देता है। ऐसे गुरु की असंशय उपासना शिष्य का
परमकर्त्तव्य है। अनेक गुरु नहीं हो सकते। 'ज्ञानवान् गुरुरिष्यते' के अनुसार गुरु
ज्ञानवान् होना ही चाहिये। अनेक गुरुओं की उपासना से व्यवहार खण्डित हो
जाता है। पहले गुरु के वचन के विरुद्ध कुछ कहने पर संशय उत्पन्न होना
स्वाभाविक है। वहीं एक ज्ञानवान् गुरु के तपःपूत व्यक्तित्व और उनकी दीक्षा
के लाभ से अभिभूत शिष्य के मन में शङ्का के लिये कोई स्थान नहीं होता।
इसलिये गुरु एक ही होना चाहिये और उसी में श्रद्धा और आस्था की दृढ़ता
अपनानी चाहिये। पहले आये हुए सूत्र—'सम्प्रदायविश्वासाभ्याम्' में सम्प्रदाय
शब्द सम्यक् रूप से गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान प्रकर्ष के उत्तरदायित्व के नियमों को
व्यक्त करता है। शिष्य उन नियमों का विश्वासपूर्वक पालन करता है। गुरु की
उपासना के ये दो मूलभूत तत्त्व हैं— १. सम्प्रदाय और २. विश्वास। इस सूत्र
से भी एक गुरु की उपासना संकेतित हो रही है। फिर भी इस सूत्र द्वारा पुनः
एक गुरूपासना का विधान एक गुरु का त्याग कर गुर्वन्तर आश्रय का बलपूर्वक
निषेध करने के लिये किया गया है। गुर्वन्तरोपास्तिनिवृत्तिफलक यह सिद्धान्तनिष्ठ
विधान है। इसमें संशयवाद और तर्क के लिये कोई स्थान नहीं रह गया है॥२०॥
दीक्षाविधिः २३
नवमं धर्ममाह
सर्वत्र निष्परिग्रहता ॥२१॥
सर्वत्र मपञ्चकादिषु निष्परिग्रहता। निर्गतः परिग्रह इच्छा यस्य सः
निष्परिग्रहः। तस्य भावस्तत्ता। “पत्नीपरिजनादानमूलशापाः परिग्रहाः”
इत्यमरः। अत्रादानस्य परिग्रहस्य मूलम् इच्छैव, एतादृशकोशानुसारेण परिग्रह-
शब्द इच्छावाचकः। मपञ्चकं मे भूयाद् इतीच्छया न स्वीकार्यम्।
यद्वा—सर्वत्र वस्तुमात्रे निष्परिग्रहता स्वीयबुद्धित्यागः सम्पादनीयः।
सर्वत्र ममता त्याज्येति यावत्॥२१॥
सर्वत्र मपञ्चक आदि में निष्परिग्रहता होनी चाहिये। यह सूत्र का संक्षिप्त
अर्थ है। यहाँ सर्वत्र शब्द का मपञ्चक आदि में यह अर्थ किया गया है।
सामान्यतया सर्वत्र शब्द से सर्वस्थान का प्रकल्पना होता है। सर्व शब्द के परिवेश
में सारा विश्वप्रपञ्च आता है। इस दृष्टि से इसका अर्थ 'इस विश्वात्मक प्रपञ्च
और स्थानात्मक विस्तार में परिग्रह बुद्धि नहीं रहनी चाहिये' यही होना चाहिये।
परिग्रह शब्द अमरकोश के अनुसार पत्नी, परिजन, आदान, मूल और
शाप इन अर्थों में प्रयुक्त होता है। कुछ लोग आदान को मूल के साथ जोड़कर
चार अर्थ ही करते हैं। इस दृष्टि से जिन व्यक्तियों के स्वभाव से ये निर्गत
हो जाते हैं, वे निष्परिग्रह कहलाते हैं। निष्परिग्रह का भाव ही निष्परिग्रहता
कहलाती है। परिग्रह शब्द का 'इच्छा' अर्थ भी करते हैं। मपञ्चक में मेरी इच्छा
हो अथवा मपञ्चक मुझे हो इस इच्छा से किसी की स्वीकृति नहीं होनी चाहिये।
इस सूत्र का एक वैकल्पिक अर्थ भी वृत्तिकार ने प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार
सर्वत्र वस्तु मात्र में 'यह मेरी है' इस प्रकार की बुद्धि का त्याग ही सर्वत्र निष्परि-
ग्रहता है। इसका सदैव सम्पादन होना चाहिये। अर्थात् कहीं ममता नहीं होनी
चाहिये॥२१॥
दशमं धर्ममाह
फलं त्यक्त्वा कर्मकरणम् ॥२२॥
फलं पूर्वोक्तं कृत्रिमं तत्साधनं च धर्मार्थकामा इति यावत्।
फलविषयिणी इच्छा फलपदस्यार्थः। तं त्यक्त्वा कर्मणो विहितस्य करणं
२४ परशुरामकल्पसूत्रम्
भवतीति शेषः। काम्यं कर्म न कर्त्तव्यमित्यर्थः। काम्यं कर्म न कर्त्तव्यमिति
वक्तव्ये फलं त्यक्त्वा कर्त्तव्यमिति कथनात् काम्यानामपि कर्मणामीश्वरार्पण-
बुद्ध्या अनुष्ठानं कर्त्तव्यमिति ज्ञायते।।२२।।
'फल का त्याग कर कर्म करना चाहिये' यह सूत्र का सार अर्थ है। जहाँ
तक फल का प्रश्न है, इसके कृत्रिम फल साधन धर्म, अर्थ और काम हैं।
फल का तात्पर्य फलविषयक इच्छा ही है। इस फलाकाङ्क्षा का परित्याग कर
विहित कर्म का करना उत्तम होता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि, काम्य
कर्म नहीं करना चाहिये। सूत्र में यही कहना चाहिये था। उसके स्थान पर फल
का त्याग कर करना चाहिये, यह कथन यह निर्दिष्ट करता है कि, ईश्वरार्पण
बुद्धि से काम्य कर्म सम्पादित करना चाहिये।।२२।।
एकादशं धर्ममाह
अनित्यकर्मलोपः ।।२३।।
नित्यं च तत्कर्म च नित्यकर्म, स्नानसन्ध्यापूजादि। तस्य लोपः
अननुष्ठानं नित्यकर्मलोपः। न विद्यते नित्यकर्मलोपो यस्मिन्नुपासके स
अनित्यकर्मलोपो भवेदिति शेषः। नित्यकर्म अवश्यंकर्त्तव्यमित्यर्थः। नित्य-
कर्म कर्त्तव्यमिति वक्तव्ये व्यतिरेकमुखेन कथनं, त्यागे न केवलं क्रतुवैगुण्यम्,
प्रत्यवायो निरयश्चेति ज्ञापयति।।२३।।
नित्य और कर्म दो शब्दों का समवायगत अर्थप्रद यह नित्यकर्म शब्द है।
स्नान, संध्या और पूजा आदि नित्यकर्म माने जाते हैं। इनका अनुष्ठान नियमित
होना चाहिये। अनुष्ठान का लोप अर्थात् अननुष्ठान ही नित्यकर्म लोप माना जाता
है। नित्यकर्म लोप जिस उपासक का नहीं होता है, वह अनित्यकर्मलोप उपासक
होता है। अर्थात् उपासक का यह धर्म है कि, वह नित्यकर्म अवश्य करे। नित्य-
कर्म करना चाहिये, वस्तुतः सूत्र में यही कहना चाहिये था किन्तु सूत्रकार ने
व्यतिरेक शैली का आश्रय लिया है। इससे यह सूचित होता है कि, नित्यकर्म
के त्याग से न केवल कर्म-वैगुण्य होता है, नरक की भी प्राप्ति सम्भव है।।२३।।
ननु नित्यकर्म-साधनीभूत-मपञ्चकालाभे कथं कार्यमित्याशङ्कायामाह
मपञ्चकालाभेऽपि नित्यक्रमप्रत्यवमृष्टिः ।।२४।।