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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 320 में से

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पृष्ठ 52

१० परशुरामकल्पसूत्रम्
लिये इसके त्रैकालिक नित्यत्व का कोई महत्त्व नहीं रहता। यह ध्यान देने की
बात है कि, मन्त्र देवतावत् सूक्ष्म शरीररूप होते हैं। देवता के सूक्ष्म शरीर भी
अविद्या पर्यन्त ही अनुभूत होते हैं। अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर इनकी स्वतः
निवृत्ति स्वाभाविक है॥७॥
मन्त्राणामचिन्त्यशक्तिता ।।८।।
मन्त्राणामिति षष्ठी सप्तम्यर्थे, मन्त्रेष्वित्यर्थः। न चिन्त्या अचिन्त्या
शक्तिर्यत्र, ते अचिन्त्यशक्तयो मन्त्राः, तेषां भावस्तत्ता। अस्तीति शेषः। शक्तौ
अचिन्त्यत्वं च तर्काविषयत्वम्। एतेन पूर्वोदितमाया अतर्क्या दुर्वारा, तथापि
तन्निवारणे समर्था ततोऽपि अधिकशक्तिता मन्त्रेषु लीलया
ज्ञानावरकाविद्यानिर्वर्तकत्वशक्तिरस्तीति प्रतिपादितम् ।।८।।
सूत्र में मन्त्रशब्द से बहुवचन षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वस्तुतः सप्तम्यर्थ
में है। अतः उसका अर्थ करते समय सप्तमीवाचक अर्थ करना चाहिये। मन्त्रों
में अचिन्त्यशक्तिता होती है। यही व्यावहारिक प्रचलित प्रयोग है। मन्त्रों में ऐसी
शक्ति होती है, जो अचिन्त्य होती है। इनकी शक्ति के सम्बन्ध में कोई तर्क
नहीं किया जा सकता, अर्थात् मन्त्रों की शक्ति तर्क से परे है। यहाँ यह ध्यान
देने की बात है कि, माया की शक्ति भी अतर्क्य होती है। अन्तर इतना ही
है कि, मन्त्र की अतर्क्य शक्ति, माया की ज्ञान को आवृत कर लेने वाली अविद्या
शक्ति का भी निवारण कर देती है। अतः मन्त्रों में रहने वाली शक्ति माया शक्ति
को भी अतिक्रान्त कर विद्यमान रहती है॥८॥
सम्प्रदायविश्वासाभ्यां सर्वसिद्धिः ।।९।।
सम्प्रदायः गुरुपरम्पराऽऽचारानुसरणम्। विश्वासो मन्त्रेषु
फलसाधनत्वविषयको निश्चयः। आभ्यां सहितेन मन्त्रेण सर्वसिद्धिर्भवतीति
शेषः। यद्यपि लोके एकेन दण्डेन एकव्यापारेण घट एव भवति, न पटः।
एवं तुरीवेमादिना पट एव न घट इति। एवं सर्वकारणेषु लोके
नियतैककार्यजनकत्वं दृष्टम्। तथापि मन्त्रेषु न तथा। एक एव मन्त्रो
यद्यदीप्सितं तत्सर्वं जनयति इति ज्ञापयितुं सर्वपदम्। एतेन श्रोतॄप्रवृत्तये
मन्त्रवर्त्तिगुणोऽपि प्रतिपादितो भवति ।।९।।