परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ परशुरामकल्पसूत्रम्
इस सूत्र में गुरु, मन्त्र, देवता, आत्मा और मन इन अत्यन्त सहकारी
कारणों के साथ पवन रूपी पाँच प्राणों की गणना की गयी है। ये सभी मन्त्र
की सिद्धि के सहकारी कारण हैं। मन्त्र भी मन्त्रसिद्धि का सहकारी कारण होता
है। इसके साथ ही गुरु आदि तत्त्वों के ऐक्यनिष्फालन अर्थात् भावनात्मक
ऐक्य सम्पादन से अन्तरात्मा की वित्ति होती है। इस सूत्र में प्रयुक्त निष्फालन
शब्द का अर्थ सम्पादन किया गया है। वस्तुतः निष्फालन परिणामोत्पादन अर्थ
में प्रयुक्त होना चाहिये। यह सम्पादन की चरितार्थता में ही समाहित है। ऐक्य
सम्पादन के परिणामस्वरूप प्रत्यगात्मा का वेदन होता है, यह वृत्तिकार का
पक्ष है।
एक दूसरा पक्ष यह कहता है कि, निष्फालन का अर्थ निर्णय होता है।
गुरु मन्त्र आदि कारणों के द्वारा की गयी उपासना के माध्यम से इनके ऐक्य
का निर्णय हो जाता है और इस निर्णय के उपरान्त ही प्रत्यगात्म संवेदन सिद्ध
होता है। इसका तीसरा पक्ष आचार्य उमानन्द नाथ द्वारा प्रतिपादित है। इनके
अनुसार गुरु, मन्त्र, देवता और आत्म का ऐक्य भावन एक अलग साधन है।
मन और पवन इन दोनों के एक साथ यत्नपूर्वक निरोध का ज्ञान दूसरा साधन
है। इन दोनों के ऐक्य निष्फालन से प्रत्यगात्मा का संवेदन होता है। आचार्य
रामेश्वर इस पक्ष को चिन्त्य मानते हैं।।१९।।
अर्चनरूप उपास्तिविधिः
एतावत्पर्यन्तं मन्त्रस्तुत्या तत्सहकारिकारणस्य कथनेन च मन्त्रकरणक-
क्रियातद्विधिरुन्नेयः। तथा च तादृशी जपरूपैव। एवं जपरूपास्तिं निरूप्य
पूजारूपामुपास्तिं विधत्ते—
आनन्दं ब्रह्मणो रूपम्। तच्च देहे व्यवस्थितम्। तस्याभि-
व्यञ्जकाः पञ्चमकाराः, तैरर्चनं गुप्त्या प्राकट्यान्निरयः।।१२।।
यथा चिद्रूपं ब्रह्म एवम् आनन्दरूपमपि। ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म।’ इति
श्रुतेः। यथा चिद्रूपमावृतमज्ञानेन न जानाति एवमानन्दस्वरूपमपि दुःखैनावृतं
न जानाति। यदा कदाचिद् भारादिरूपदुःखापगमे ब्रह्मणः परिच्छिन्नं रूपं
शरीरावच्छेदेन सम्प्रत्यपि जानाति तादृशानन्दः परिच्छिन्नो देहे देहावच्छेदेन