परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीक्षाविधिः ५
सिद्धान्तप्रवर्त्तक सूत्रों में यह सर्वप्रथम और तत्त्वदृष्टि से महत्त्वपूर्ण सूत्र है।
पाँचों आम्नाय इसे सिद्धान्त रूप से स्वीकार करते हैं कि, यह जगत् ३६
तत्त्वात्मक है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। सर्वप्रथम केवल निजरूप में
ही परमशिव अवस्थित थे। उनमें "मैं एकाकी बहुरूपों अर्थात् अनन्तरूपों में व्यक्त
हो जाऊँ" इस प्रकार की इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मक शक्तियाँ उल्लसित हो गयीं।
इन शक्तियों के योग से क्रमशः अर्थ और शब्द की सृष्टि, अङ्कुर और प्रतिबिम्ब
की तरह एक साथ उत्पन्न हो गयी। इस प्रकार की सिसृक्षा से सिसृक्षु उपाधिविशिष्ट
परमशिव ही केवल 'शिव' पदवी से विभूषित हो गया। उसका अभिधेय शिव
हो गया। शिव ३६ तत्त्वों में प्रथम आदिम तत्त्व माना जाता है।
सिसृक्षा की वह शक्ति जो परमशिव में आद्यस्पन्द रूप से उल्लसित हुई,
वही शक्ति नामक द्वितीय तत्त्व है।
समग्र विश्व को अहमात्मक अङ्गीकृत कर 'सर्वं विश्वम् अहम्' इस वृत्ति
से विद्योतित 'सदाशिव' नामक तृतीय तत्त्व है।
यह विश्व है। यह भेदविषयक वृत्ति है। इस वृत्तिवाला तत्त्व ईश्वरतत्त्व
है। यह चतुर्थ तत्त्व है।
विश्वात्मक यह विस्तार मैं ही हूँ, इस प्रकार की सदाशिव सम्बन्धिनी
वृत्ति ही 'विद्या' है। यह पाँचवाँ तत्त्व है।
यह जगत् पार्थक्य प्रथा से प्रथित है। इसमें व्यापक पृथक् वृत्तिमयी
भेदविषयिणी ईश्वरनिष्ठा वृत्ति पृथक् तत्त्व मानी जाती है। यह वृत्ति ही माया
है। यह छठवाँ तत्त्व है।
ऊपर कथित विद्या को तिरोहित करने वाली शक्ति और विद्या की
विरोधिनी शक्ति को अविद्या कहते हैं। यह सातवाँ तत्त्व है।
जीव-निष्ठ सारा कर्त्तृत्व किञ्चित्कर्त्तृत्व से नितान्त संकुचित है। यह
सङ्कोचमयी वृत्ति ही कला है। इसे आठवाँ तत्त्व कहते हैं।
जीवनिष्ठा नित्यतृप्ति ही किन्हीं विषयों में अतृप्ति के कारण किन्हीं विषयों
में संकुचित होकर 'राग' संज्ञा से विभूषित हो जाती है। यह नवाँ तत्त्व है।
जीवनिष्ठ नित्यता, आच्छादित होने पर अस्ति (है), जायते (उत्पन्न होती
है), वर्धते (बढ़ती है), विपरिणमते (अधेड़ होकर परिणत होती है), अपक्षीयते