परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीक्षाविधिः १५
व्यवस्थितः। तस्य अभिव्यञ्जकास्तद्विषयकसाक्षात्कारजनकाः पञ्चमकाराः।
एतदन्तेन विधीयमान-द्रव्यस्तुतिः अनुष्ठातृ-प्रवृत्तये यत ईदृशाः श्रेष्ठा
मकाराः। अतस्तैरर्चनं गुप्त्या अप्राकट्येन, कुर्वीतेति शेषः। गुप्तिद्रव्योभय-
विशिष्टार्चनरूपं कर्म अनेन विधीयते॥१२॥
ब्रह्म की परिभाषा करते हुए मनीषियों ने कहा है कि, ब्रह्म चिद्रूप है।
इसी सन्दर्भ में भगवान् परशुराम कहते हैं कि, आनन्द भी ब्रह्म का रूप है।
भगवती श्रुति कहती है—"विज्ञान और आनन्द दोनों ब्रह्म हैं।"
जैसे अज्ञान से आवृत होने के कारण ब्रह्म के 'चिद्' रूप को सामान्य
अणु पुरुष नहीं जानता, उसी प्रकार दुःख से आवृत 'आनन्द' स्वरूपता का
ज्ञान भी उसे नहीं होता। मनुष्य कभी भार ढोने का काम करता है। अत्यधिक
भार दुःखदायी होता है। भार उतार देने पर सुख की साँस लेता है। वह सुख
क्या है? वह ब्रह्म का ही परिच्छिन्न रूप है। शरीर के माध्यम से वह अनुभूत
होता है।
उसी प्रकार आनन्द भी परिच्छिन्न है। देह में देह के माध्यम से व्यवस्थित
है। इस आनन्द का अभिव्यञ्जन कैसे होता है? यह सोचने पर ज्ञात होता है
कि, इसके साक्षात्कार के कारण रूप पाँच मकार हैं। एक नयी बात यह भी
मालूम होती है कि, देहरूप द्रव्य और पञ्चमकाररूप द्रव्यों से चिदानन्द का
साक्षात्कार हो सकता है। अनुष्ठाता इन दो माध्यमों से आनन्दोपलब्धि के लिए
पूजा में प्रवृत्त होता है।
एक नयी जिज्ञासा यहाँ उत्पन्न होती है। पञ्चमकारों से अर्चन कैसे किया
जाय। प्रकट रूप से या गोपन भाव अपना कर? सूत्रकार कहते हैं कि, 'गुप्ति'
के द्वारा अर्थात् प्रकट न करते हुए गोपन भाव से पूजा में प्रवृत्त होना चाहिये।
प्राकट्य से 'निरय' की प्राप्ति होती है। इस सूत्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि,
गुप्ति का परमेश्वर साक्षात्कार में अप्रतिम महत्त्व है। दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान
पञ्चमकारों का है। इन दोनों से विशिष्ट अर्चनरूप कर्म के विधायक इस सूत्र
द्वारा उपासना का द्वार अनावृत हो जाता है॥१२॥
एवमुपासनामुक्त्वा उपासकधर्मान् आह
भावनादार्ढ्यादाज्ञासिद्धिः ॥१३॥