परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीक्षाविधिः ११
मन्त्र-सिद्धि के सहकारी कारण होते हैं। मन्त्रों से अभीप्सित कार्य की
सिद्धि के उद्देश्य से उनका वर्णन कर रहे हैं।
सूत्र में तीन शब्द हैं—१. सम्प्रदाय, २. विश्वास, ३. सर्वसिद्धि। इन
तीनों शब्दों का औपासनिक दृष्टि से अप्रतिम महत्त्व है। क्रमशः इन शब्दों की
परिभाषा के साथ इनका विश्लेषण उचित है और प्रासङ्गिक
भी है—
१. सम्प्रदाय
गुरु परम्परा के अनुसार निर्धारित आचारों के समर्थक मान्य सिद्धान्त
अर्थात् आचार्य-प्रवर द्वारा प्रवर्त्तित परम्परा पद्धति। गुरु द्वारा प्रवर्त्तित सिद्धान्त
आध्यात्मिक अनुभूतियों पर आधृत होते हैं। उनका अनुसरण स्वात्मोत्कर्ष का
साधक माना जाता है।
२. विश्वास
गुरु में, गुरु द्वारा प्रदत्त मन्त्रों में, शास्त्रों में और भगवत्सत्ता में सिद्धि
और साफल्य का निश्चय ही विश्वास माना जाता है।
३. सर्वसिद्धि
(गुरु द्वारा प्रवर्त्तित सिद्धान्तों और आचारों के अनुसरण और दृढ आस्था
से) सभी प्रकार की और सारी सिद्धियाँ अवश्य होती हैं। प्रकरण मन्त्रों का
है। इसलिये यह कह सकते हैं कि, सम्प्रदायानुसार विश्वासपूर्वक मन्त्रों के प्रयोग
से सारी सिद्धियाँ सम्भव हैं।
इसे एक उदाहरण से समझें। लोक में देखा जाता है कि, कुम्भकार द्वारा
एक दण्ड से घूर्णि देने के एक व्यापार से घट का ही निर्माण होता है, पट
का निर्माण नहीं होता। इसी तरह अनन्त कारणों से अनन्त कार्य (नियत कारण
से नियत कार्य रूप से ही) सम्पन्न होते हैं। जैसे तुरी और वेमा के प्रयोग
से पट रूप कार्य ही होते हैं, घड़ा रूप कार्य नहीं होता।
मन्त्रों में ऐसी बात नहीं। लोकदृष्ट व्यवहारवाद के विपरीत एक मन्त्र की
सिद्धि से ही सारी अभिलषित इच्छायें सिद्ध हो जातीं हैं। अर्थात् एक कारण