परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ परशुरामकल्पसूत्रम्
से विनियोगानुसार समस्त ईप्सित कार्य पूर्ण हो जाते हैं। यह मन्त्रों की महती
गुणवत्ता है। मन्त्र-माहात्म्य को जानकर सम्प्रदाय और विश्वास के अनुसार सारी
सिद्धियाँ हस्तामलकवत् सिद्ध हो जाती हैं।।९।।
जिज्ञासु पूछता है कि, गुरुवर्य! लोकविरुद्ध अर्थ प्रदान करने वाला यह
सूत्र-वाक्य कैसे प्रामाणिक माना जा सकता है? गुरुदेव इस आशङ्का का समाधान
सूत्र के माध्यम से ही कर रहे हैं—
विश्वासभूयिष्ठं प्रामाण्यम्।।१०।।
प्रामाण्यं संवाद-प्रवृत्तिजनक-तद्धतितत्प्रकारकज्ञानजनकत्वम्। सर्वसिद्धि-
रिति वाक्यनिष्ठं विश्वासभूयिष्ठम्। अत्र विश्वासपदार्थश्च वाक्यप्रयोक्तरि आप्त-
त्वनिश्चयः। बहुशब्दाद् अतिशयार्थे इष्ठन्प्रत्ययः। तत्र पाणिनिसूत्रम्
“अतिशायने तमबिष्ठनौ” अतिशय-विशिष्टार्थवृत्तेः स्वार्थे एतौ स्तः।
“बहोर्लोपो भू च बहोः” इति इडागमे च भूयिष्ठशब्देन अत्यन्तबहुत्वविशिष्टः
पुरुषार्थः। पुरुषे विश्वासभूयिष्ठत्वं च स्वोत्तरोत्पन्नत्वस्वविषयविषयकत्वसम्बन्धेन
च विश्वासविशिष्टशङ्काऽनधिकरणत्वं, तदाश्रयपुरुषेण सममभेदान्वयस्य
बाधितत्वात्। भूयिष्ठपदस्य भूयिष्ठाश्रयज्ञानविषये लक्षणा। तस्य प्रामाण्ये
अभेदान्वयः अत्यन्तविश्वासवत्पुरुषैकवेद्यम् एतच्छास्त्रप्रामाण्यमित्यर्थः।
कुतर्कशालिनां शास्त्रप्रामाण्यं सर्वथा अगम्यमिति भावः। तदुक्तं भट्टपादैः—
“शास्त्रैकगम्या ये ह्यर्था न ताँस्तर्केण दूषयेत्” ।।१०।।
प्रमाण के भाव को प्रामाण्य कहते हैं। प्रामाण्य में ज्ञानजनकता होती है।
किसी वस्तुविषयक संवाद का प्रवर्तन व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।
कोई वस्तु जिन विशेषणों से विशिष्ट है, उससे उसी प्रकार का ज्ञान होता है।
प्रामाण्य का ज्ञानजनकत्व स्वतःप्रामाण्यवाद के समर्थक कुमारिलभट्ट के अनुसार
सिद्ध माना जाता है। जैसे घड़ा मेरे द्वारा ज्ञात है। इस प्रयोग में ज्ञान की प्रमा
वाला मैं हूँ क्योंकि तथाविधज्ञातंता से मैं युक्त हूँ। यही तद्वान् में तत्प्रकारक
ज्ञान कहलाता है।
सर्वसिद्धि विश्वास पर निर्भर करती है। यह सूत्र सं. ९ में स्पष्ट किया
जा चुका है। गुरुवाक्य में विश्वास-भूयिष्ठता सिद्धि की हेतु मानी जाती है। जहाँ