परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
दीक्षाविधिः २५
मपञ्चकालाभे मुख्यं नास्तीति न कर्मलोपः। किन्तु प्रतिनिधिनाऽपि
नित्यक्रमो नित्यपूजा तस्याः प्रत्यवमृष्टिः अनुष्ठानं कर्त्तव्यमिति शेषः। तेन
नित्यपूजायां विशेषद्रव्यालाभेऽपि प्रतिनिधिना निर्वाहः सूचित इति नित्य-
पूजायामेवाभ्यनुज्ञा, नान्यत्रेति।।२४।।
मपञ्चक द्रव्यों की अप्राप्ति होने पर मुख्य द्रव्य नहीं है, यह सोच कर
कर्म में अवरोध नहीं आने देना चाहिये। प्रतिनिधि द्रव्य से भी नित्यपूजा का
क्रम पूरा करना कर्म का अनुष्ठान ही होता है। इसलिये यह सिद्धान्त रूप से
मान्य है कि, विशेष द्रव्य के न रहने पर भी प्रतिनिधि द्रव्य से निर्वाह करना
आवश्यक है। यह अभ्यनुज्ञा नित्यकर्म के लिये है। किसी अन्य काम्य या
नैमित्तिक के लिये नहीं।।२४।।
द्वादशं गुणमाह
निर्भयता सर्वत्र ।।२५।।
सर्वत्र सर्वतः मपञ्चकस्वीकारे कौलमार्गावलम्बनेन नरकादि-
प्रतिपादकानि यानि शास्त्राणि तेभ्यः सर्वेभ्यो निर्गतं भयं यस्मात् स निर्भयः,
तस्य भावस्तत्ता सम्पादनीयेति शेषः। तानि सर्वाणि शास्त्राणि रागिणं
भीषयन्ति कामं भीषयन्तु, अहं तु न रागी किन्तु शास्त्रेण प्रवर्तितेन न मे
भीतिरिति निर्धारणेन निर्भयता सम्पादनीयेति भावः।।२५।।
मपञ्चक से सर्वत्र पूजा को कौलमार्ग अङ्गीकार करता है। कौल शास्त्र
यह प्रतिपादित करते हैं कि, इनसे निरय (नरक) आदि की सम्भावना नहीं होती।
इससे उपासक निर्भय हो जाता है। भय तो रागी व्यक्तियों को होता है।
श्रीविद्योपासक रागी नहीं होता। अतः इसे निर्भय रहना चाहिये।।२५।।
सकलसिद्धान्तसारभूतं धर्ममाह
सर्वं वेद्यं हव्यम्, इन्द्रियाणि स्रुचः शक्तयो ज्वालाः स्वात्मा
शिवः पावकः स्वयमेव होता।।२६।।
इति भावयेदिति शेषः। अन्तःकरणवृत्तिभिरिति वेद्यमित्यस्यादौ पूरणीयम्।
अन्तःकरणवृत्तिवेद्यं सर्वं हविष्ट्वेन भावयेत्। यथा अग्नौ प्रक्षिप्तं हविस्तदाकारं
२६ परशुरामकल्पसूत्रम्
भवति एवं वृत्तिवेद्यानां सर्वेषां शिवरूपेऽग्नौ होमे सति शिवाकारसम्पत्तेस्तेषु
हविष्ट्वेन भावनं युक्तम्।
तादृशहविष आधारभूतहोमसाधनीभूत-जुहूरेव स्रुक्पदेन गृह्यते, न
स्रुवादयः, तेषां स्रुक्पदवाच्यत्वेऽपि होमसाधनत्वाभावेन होमभावनाप्रकरणे
स्रुवादीनामयोग्यत्वात्।।२६।।
यह सारा विश्व ही वेद्य है। वेद्यवस्तु का ज्ञान अन्तःकरण की वृत्तियों
से होता है। इसलिये यह कहा जा सकता है कि, अन्तःकरण की वृत्तियों द्वारा
सारा वेद्यमात्र आध्यात्मिक यज्ञ में अर्पित करने योग्य हवनीय द्रव्य है। सारी
इन्द्रियाँ स्रुक् हैं। हविष्य के आधारभूत होम में साधन रूप से प्रयुक्त मुख्य पात्र
स्रुक् होता है। स्रुवा आदि नहीं। स्रुवा होम का साधन नहीं होता। होम भावना
के सन्दर्भ में स्रुवा स्रुक् के समक्ष कोई महत्त्व नहीं रखता। शक्तियाँ ज्वाला
हैं। स्वात्मा शिव ही पावक है। और उपासक स्वयं होता माना जाता है। जैसे
अग्नि में अर्पित हविष्य अग्निसात् होकर अग्निरूप में परिवर्त्तित हो जाता है।
इसी तरह वृत्तिवेद्य सभी वस्तुजात को शिवरूप अग्नि की ज्वाला में हवन से
शिवरूपत्व की उपलब्धि हो जाती है। इसलिये वेद्यों का हविष्ट्व-भावन और
शिव रूप में सर्व समर्पण का भाव उपासक व्यक्ति के लिये अनिवार्यतः
आवश्यक माना जाता है।।२६।।
एवमनुष्ठितभावनायाः फलमाह
निर्विषयचिद्विमृष्टिः फलम्।।२७।।
निर्विषयाया निर्विकल्परूपायाश्चितो विमृष्टिः फलम्। पूर्वोक्तभावनाया
इति शेषः।।२७।।
पौराणिक भगवान् शिव को सच्चिदानन्द कहते हैं। आगमिक चिदानन्दघन
कहते हैं। चित् निर्विकल्प रूप ज्ञान होता है।
आणव भाव में सविकल्पकात्मकता का प्रभाव होता है। जब उपासक
अणुता पर विजय कर आध्यात्मिक यज्ञ का होता बनकर इसे सिद्ध कर लेता
है, उस समय उसका चिद्विमर्श निर्विकल्पदशा का स्पर्श कर लेता है। यही इस
उपासना का फल है।।२७।।
दीक्षाविधिः २७
ननु किमीदृशफललाभेनेत्यत आह
आत्मलाभान्न परं विद्यते॥२८॥
आत्मलाभात् स्वरूपलाभात् परं श्रेष्ठं फलम् इति पूर्वसूत्रस्थम-
नुषज्यते। न विद्यते नास्तीत्यर्थः। “पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा
गतिः” इति ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ इति च श्रुतिः। इममर्थं
प्रतिपादयति। मोक्षः परमपुरुषार्थ इत्यत्र न कोऽपि विवादं करोति।
अतस्तादृशभावनया परमपुरुषार्थ इति भावः। पूर्वं “स्वविमर्शः पुरुषार्थः”
इत्यनेन पुरुषार्थस्वरूपं प्रतिपादितम् अत्र स्तुतिरिति न पौनरुक्त्यम्॥२८॥
इस जीवन में स्वात्म रूप ही विस्मृत हो चुका है। इसी की उपलब्धि
जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि मानी जाती है। स्वरूप लाभ से बढ़कर कोई लाभ
नहीं हो सकता। इसे ही निर्विषय चिद्-विमृष्टि शब्द के माध्यम से पूर्व सूत्र
में परिभाषित किया गया है। भगवती श्रुति कहती है—
“पुरुष से पर अर्थात् उसको अतिक्रान्त कर वर्त्तमान कोई नहीं है। पुरुष
सत्ता की अनुभूति सर्वातिशायिनी सीमा है और वही सर्वोत्तम गति भी है।”
इसके अतिरिक्त भी कहा गया है कि, “उस परमेश्वर को इस रूप में जानने
वाला स्वयम् अमृत हो जाता है।”
ये दोनों उक्तियाँ इस सूत्र का समर्थन कर रही हैं। मोक्ष को परम पुरुषार्थ
कहते हैं। वह निर्विवाद तथ्यात्मक सत्य है। इस आधार पर यह कहा जा सकता
है कि, उक्त पुरुषार्थ भाव का भावन जीवन के चरम उत्कर्ष का साधक हो
सकता है। पहले स्वात्मविमर्श को पुरुषार्थ कहा गया है। यहाँ पुरुषार्थ के महत्त्व
का प्रतिपादन है, पुनरुक्ति नहीं है॥२८॥
अत्रायं सिद्धान्तः इत्यारभ्य प्रक्रान्तमर्थमुपसंहरति
सैषा शास्त्रशैली॥२९॥
सैषा पूर्वोक्ता शास्त्रशैली। शास्तीति शास्त्रं पञ्चाम्नायरूपं, तस्य शैली
रीतिर्भवतीति शेषः ॥२९॥
ऊपर निर्दिष्ट धर्मों का स्वरूप, उनका प्रतिपादन और उनके अनुसन्धान-
पूर्वक आचरण विज्ञान का सारा विस्तार शास्त्र की शैली मानी जाती है। शैली
२८ परशुरामकल्पसूत्रम्
को रीति भी कहते हैं। किन्तु शैली रीति से महत्त्वपूर्ण होती है। अभिव्यक्ति
के विशिष्ट प्रकार को शैली कहते हैं। वहीं रीति एक अनुकरणीय पद्धति मात्र
होती है। शास्त्र का शील पाँच आम्नायों में अभिव्यक्त है। उसे पूर्व, दक्षिण,
उत्तर, पश्चिम और ऊर्ध्वाम्नाय रूपों में जाना जाता है।।२९।।
एतादृशं शास्त्रं श्रोतॄप्रवृत्तये प्रशंसति
वेश्या इव प्रकटा वेदादिविद्याः ।
सर्वेषु दर्शनेषु गुप्तेयं विद्या ।।३०।।
वेश्या इव प्रकटाः सुलभा वेदादि-विद्याः। आदिना स्मृत्यादिः।
वेश्योपभोगो द्रव्यादिव्ययेन यथा सुलभः, एवं वेदादि-विद्यालाभो द्रव्यादिदानेन
सुलभ इत्यर्थः। अध्ययनस्य लोभमूलता शास्त्रेणैव प्रतिपादिता। “षष्णां तु
कर्मणां मध्ये त्रीणि कर्माणि जीविका”। इति।
अस्याः मोक्षसाधनीभूतब्रह्मविद्यायास्तु न कोटिकनकव्ययेनापि लाभः
किन्तु गुरुकृपैकलभ्यत्वम्।।३०।।
सारी वेद आदि विद्यायें जो प्रकट हैं अर्थात् सर्वसुलभ हैं, उनका
परमपुरुषार्थ लाभ की दृष्टि से कोई महत्त्व नहीं है। वे रहस्य विद्यायें नहीं हैं।
वेद आदि शब्द में आदि शब्द से स्मृति आदि का ग्रहण होता है।वे भी प्रकट
विद्यायें हैं। ये सारी विद्यायें सूत्रकार की दृष्टि से वेश्याओं के समान हैं।
वेश्याओं का उपभोग द्रव्य आदि के व्यय से सभी लोग कर सकते हैं।
वेद आदि विद्याओं के स्वाध्याय का अभिलाष मन में और पास में द्रव्य का
प्रबन्ध हो तो, अध्यापक को घर पर बुला कर भी पढ़ा जा सकता है। सूत्रकार
के समकालीन पैसा लेकर पढाने वालों पर यह एक कटाक्ष की तरह प्रतीत
होता है। यह सत्य है कि, इन प्रकटविद्याओं का उपभोग उसी तरह सर्वसुलभ
है जैसे वेश्या वर्ग का उपभोग।
अध्ययन की लोभमूलकता की चर्चा शास्त्रों में भी की गयी है। एक
स्थान पर कहा गया है कि,
“ब्राह्मणों के छः कर्म (पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-कराना और दान देना
एवं लेना) निर्धारित हैं। इनमें से तीन कर्म (पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना)
तो जीविकार्थ ही स्वीकृत हैं।”
दीक्षाविधिः २९
जीविका के प्रति लोभ स्वाभाविक है। इन तीनों से द्रव्योपार्जन होता है।
अर्थ के अभाव से जीवन कष्टसाध्य हो जाता है। पर इस कष्ट को प्राचीन ब्राह्मण
वर्ग सहर्ष स्वीकार करता था।
जहाँ तक परमपुरुषार्थसाधनीभूत ब्रह्मविद्या का प्रश्न है, यह रहस्य विद्या
है। करोड़ों द्रव्य व्यय कर भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह एकमात्र गुरुकृपा
और उनके अनुग्रह पर निर्भर है। इसलिये यह सर्वातिशायिनी ब्रह्मविद्या है ।।३०।।
एतावत्पर्यन्तं शास्त्रमनूद्य उपासकेन प्रथमां कर्त्तव्यां क्रियामाह
तत्र सर्वथा मतिमान् दीक्षेत ।।३१।।
सप्तमी षष्ठ्यर्थे, प्रकृत्यर्थः श्रीविद्योपास्तिः। षष्ठ्यर्थः सम्बन्धः
तदव्यवहितपूर्ववृत्तित्वम्। तस्य दीक्षापदार्थे आश्रयतया अन्वयः। तस्य
करणत्वसम्बन्धेन भावनायामन्वयः। तथा च श्रीविद्योपासनाऽव्यवहितपूर्ववृत्ति
दीक्षया इष्टं भावयेद् इति विशिष्टबोधः। अत एवोत्पत्तिविधिः। सर्वथा अवश्यं
मतिमान् पूर्वोक्तभूमिकामारूढः। एतत्पदस्वारस्यादेव अयमधिकारविधिरपि।
तादृशभूमिकामारूढस्यैव अधिकारो नान्यस्येति सिद्धम्।।३१।।
तत्र शब्द में सप्तमी विभक्ति का अर्थ सम्बन्ध का द्योतक है। प्रकृत
प्रक्रान्त तत्त्व यहाँ श्रीविद्या है। सम्बन्ध अव्यवहितपूर्व वस्तु से होता है।
श्रीविद्योपासना के अव्यवहितपूर्व दीक्षा होनी चाहिये। श्रीविद्योपासना दीक्षा पर
ही आश्रित है। दीक्षा में करण कारक का अन्तर्भाव है अर्थात् दीक्षा के ग्राह्य
सिद्धान्तों के द्वारा उपासना करे। इसे इस तरह कह सकते हैं कि, श्रीविद्योपासना
के अव्यवहितपूर्व दीक्षा द्वारा इष्ट का भावन करना चाहिये। यह विशिष्ट बोध
उत्पन्न होता है। इस आधार पर इस सूत्र को उत्पत्तिविधि भी कह सकते हैं।
पूर्व भूमिका में आरूढ व्यक्ति ही मतिमान् कहा जाता है। उपासना में मति
है। अत एव वह मतिमान् है। ऐसे मतिमान् को ही दीक्षा में अधिकार है।
इसलिये इस सूत्र को अधिकारविधि सूत्र भी कह सकते हैं ।।३१।।
दीक्षात्रयम्
एवं दीक्षां विधाय तत्र अवान्तरभेदवतीषु तासु एककालसम्बन्धं
विधातुम् आदौ तां विभज्य विभागप्रयोजकं धर्मं च प्रदर्श्य तासु तिसृष्वपि
एककालसम्बन्धरूपं गुणं विधत्ते—
३० परशुरामकल्पसूत्रम्
दीक्षास्तिस्रः, शाक्ती, शाम्भवी मान्त्री चेति। तत्र शाक्ती
शक्तिप्रवेशनात्, शाम्भवी चरणविन्यासात्, मान्त्री मन्त्रोपदिष्ट्या
सर्वाश्च कुर्यात् ॥३२॥
चेतीत्यन्तेन विभागं कृत्वा तासां नामकथनम्। तत्र तासु मध्ये
शाक्तीत्यस्यार्थं विवृणोति— शक्तिप्रवेशनात्। जातेति शेषः। यद्वा
शक्तिप्रवेशनाद् इति हेतौ पञ्चमी। शक्तिप्रवेशनाद् या दीक्षा शक्तिप्रवेश-
हेतुकीत्यर्थः। एवमेवाग्रेऽपि। प्रवेशनादिति स्वार्थे ल्युट्। शक्तिप्रवेशनं नाम
अग्रे 'तदमृतक्षालितम्' इत्यारभ्य पाशान् दग्ध्वा' इत्यन्तं प्रतिपादिता क्रिया।
चरणविन्यासो नाम शिष्यशिरसि गुरुकर्त्तृकं कामेश्वरी-कामेश्वरयो
रक्तशुक्लचरणभावनम्। मन्त्रोपदेशस्तु स्पष्टः। शिष्यमात्रश्रावणविषय-
गुरुकर्त्तृकशब्दोच्चारणरूपः। सर्वाः पूर्वोक्ताः। तिस्रश्चेत्यनेन एककालसम्बन्धः
तासु बोध्यते। च-शब्दः साहित्यवाची। साहित्यं च एककालसम्बद्धत्वरूपम्।
तथा च सर्वा दीक्षाः सह कुर्यादिति फलितोऽर्थः।
दीक्षात्रय
प्रथम सूत्र में यह प्रतिज्ञा की गयी है कि, दीक्षा की व्याख्या करने जा
रहा हूँ। उसके बाद उपासना के स्वरूप और उपासकों के धर्मों एवं गुणों की
चर्चा की गयी। पुनः शास्त्र-शैली के प्रसङ्ग में विद्या की अत्यन्त गोपनीयता
का वर्णन सूत्र ३० तक कर दिया गया है। सूत्र ३१ में दीक्षा की आज्ञा प्रदान
कर दी गयी। इस बत्तीसवें सूत्र में दीक्षा के भेद और इनके एककालिक संबन्ध
का विधान करने के लिये सूत्र का प्रवर्त्तन कर रहे हैं—
दीक्षायें तीन प्रकार की होती हैं— १. शाक्ती दीक्षा, २. शाम्भवी और
३. मान्त्री।
१. शक्ति प्रवेशन के माध्यम से दी जाने वाली दीक्षा शाक्ती कहलाती
है। हेतु अर्थ में 'प्रवेशनात्' में प्रयुक्त पंचमी विभक्ति शक्ति-प्रवेश के द्वारा दी
जाती है, यह अर्थ अभीप्सित है। स्वार्थ में ल्युट् का प्रयोग किया गया है।
शक्ति प्रवेशन की प्रक्रिया का वर्णन इसी क्रम के सूत्र ३५ और ३६ में किया
गया है।
दीक्षाविधिः ३१
२. शाम्भवी दीक्षा चरण विन्यास द्वारा दी जाती है। चरण विन्यास एक
आध्यात्मिक भावन है। कामेश्वरी और कामेश्वर के रक्त और शुक्ल वर्ण के अरुण
चरण का शिष्य के शिर पर गुरु द्वारा भावन किया जाता है। शिष्य यह ध्यान
करता है कि, वे चरण उसके उत्तमाङ्ग से सारे शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा का
संचार कर रहे हैं। इस अनुभूति से वह कृतार्थ हो जाता है।
३. मान्त्री दीक्षा मन्त्र के उपदेश से पूरी होती है। गुरु मन्त्र का उच्चारण
करते हैं। शिष्य ध्यान से सुनकर उस नाद सुधा का अनुसन्धान करता है।
जहाँ तक एककाल सम्बन्ध की बात है, इसे सूत्र में प्रयुक्त 'च' अव्यय
से वृत्तिकार ने आविष्कृत किया है। एककालिकता सम्प्रदाय और परम्परा पर
निर्भर करती है। यदि सूत्र क्रम को उत्तरोत्तर उत्कृष्ट माना जाय, तो गुरु पहले
शिष्य पर शक्तिपात करें। तब शाम्भवी का भावन करावें और तदुपरान्त
मन्त्रोपदेश देकर शिष्य को कृतार्थ करें। ये सारी क्रियायें एक दिन में ही पूरी
करें, यह क्रम उपयुक्त लगता है। अन्य विद्वद्वर्ग की दृष्टि से 'च' का तीनों
भेदों का स्पष्ट उल्लेख कर उनका यथावसर शिष्य की परीक्षा के उपरान्त
अनुपालन करना चाहिये, यही वास्तविक अर्थ है। जो हो, परम्परा का प्राधान्य
सर्वमान्य है। आणव, शाक्त और शाम्भवोपाय-क्रम के अनुसार सर्वप्रथम मान्त्री
दीक्षा, पुनः शाक्ती दीक्षा और अन्त में प्रतिबोध को सिद्ध करने के लिये शाम्भवी
दीक्षा दी जानी चाहिये। सूत्र में प्रयुक्त क्रम, विशिष्ट साम्प्रदायिक क्रम का द्योतक
है। इस पर श्रीविद्या के उपासकों को विचारपूर्ण निर्णय लेना चाहिये।।३२।।
परेषां मतमाह
एकैकां वेत्येके ।।३३।।
वीप्सया त्रयाणां समुच्चयः। काल-भेदमात्रमिति ज्ञापितम्। 'वा'कारेण
मध्ये चिरकालव्यवधानं कार्यम्, न तु दिवसत्रय इति सूचितम्।।३३।।
सूत्र-संख्या ३२ के हिन्दी अर्थ में इसी पक्ष का समर्थन किया गया है।
भेद सिद्ध है, तो काल-क्रम भी सिद्ध है। अन्यथा एक ही क्रिया की ये तीन
प्रक्रियायें मान ली जायेंगी। वस्तुतः ये स्वतन्त्र प्रक्रियायें हैं, और असामान्य रूप
से अपनाने योग्य हैं। दीक्षा जीवन के उत्कर्ष की विधायिका और परमपुरुषार्थ
की साधयित्री है। अतः इसमें सावधानी की अपेक्षा की जाती है।।३३।।
३२ परशुरामकल्पसूत्रम्
इतःपरं गुरुकर्त्तृकां क्रियामाह
सद्गुरुः क्रमं प्रवर्त्य साङ्गं हुत्वा तरुणोल्लासवान् शिष्यमाहूय
वाससा मुखं बद्ध्वा गणपति-ललिता-श्यामा-वार्त्ताली-परा-पात्र-
बिन्दुभिरस्तमवोक्ष्य सिद्धान्तं श्रावयित्वा।।३४।।
साङ्गम् अङ्गैः सहितं क्रमं प्रधानदेवतापूजां प्रवर्त्य कृत्वा। अत्र अङ्गानि
गणपति-ललिता-श्यामा-वार्त्ताली-पराः। प्रधानं च ललिता अत्र अङ्गपदेन
अङ्गक्रमोपलक्ष्यते। अङ्गक्रमसहितं प्रधानक्रमम् इत्यर्थः। द्वितीयखण्डारम्भे
“इत्थं सद्गुरोराहितदीक्षो महाविद्याराधनप्रत्यूहापोहाय गाणनायकीं पद्धति-
मामृशेत्” इत्यत्र विघ्नापोहाय यत्क्रियते तत्प्रधानम् अङ्गं लोके दृष्टम्।
एवं तृतीयखण्डारम्भे “एवं गणपतिमिष्ट्वा नायिकायाः श्रीललितायाः
क्रममारभेत” इति क्त्वाप्रत्ययेनापि ललितोपास्त्यङ्गत्वं स्पष्टम्।
श्यामोपास्तिखण्डे तस्याः प्रधानसचिवपदं श्यामा। अन्यास्तस्मादिमा
अङ्गदेवताः।
शिष्यमाहूय इत्यनेन तावत्पर्यन्तं शिष्यस्यान्तः प्रवेशो नास्ति इति
ज्ञापितम्। अत्र पात्रपदेन विशेषार्घ्यपात्रं ग्राह्यम्। सिद्धान्तं सिद्धान्तप्रतिपादक-
वाक्यसमूहं श्रावयित्वा।।३४।।
ये सूत्र गुरुकर्तृक प्रक्रिया का प्रवर्त्तन कर रहे हैं। सद्गुरु शब्द गुरु के
सर्वातिशायी पारदृश्वा स्तर के स्वरूप का संकेत कर रहे हैं। ऐसे ज्ञानवान् गुरुदेव
दीक्षा क्रम का प्रवर्त्तन करते हुए आङ्गिक शक्तियों के क्रमानुसार हवन करने
की व्यवस्था करें। उनमें सम्प्रदाय की आस्था का ओज है, श्रद्धा का उल्लास
है और विश्वास का तारुण्य है। इन उच्च गुणों से गौरवास्पद गुरुदेव शिष्य
को वहाँ आहूत करें। अब तक शिष्य वहाँ नहीं था। गुरुदेव ने इन प्रक्रियाओं
को पूरा करने के उपरान्त शिष्य को बुलाया है। शिष्य वहाँ आया। आज्ञा लेकर
वहीं बैठ गया। गुरुदेव ने सबसे पहले कपड़े से उसके पूरे मुख को ढक कर
बाँध दिया। मुख बाँधने की क्रिया ऐकाग्र्य के उद्देश्य से करनी पड़ती है।
गुरुदेव ने अब तक सारा उपक्रम पूरा कर लिया है। दीक्षा देने के अवसर
पर समस्त करने योग्य विधियाँ पूरी कर ली गयी हैं। इस सूत्र के सन्दर्भ में
दीक्षाविधिः ३३
सर्वप्रथम करने योग्य सारे अङ्गों से समन्वित क्रम का प्रवर्तन कर लिया है।
शिष्य आ गया है। उसके नेत्र बाँध दिये गये हैं। अब उसे श्रीविद्योपासना के
सिद्धान्तों को सुनाना है।
सूत्रकार के निर्देशानुसार सर्वप्रथम गणपति, ललिता, श्यामा, वार्त्ताली,
और परा रूप उपास्यों के निर्धारित विशेषार्घ्य पात्र में रखे पवित्र जल-बिन्दुओं
से शिष्य को प्रोक्षित करते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि, इनमें प्रधान
उपास्या माँ ललिताम्बा है। सूत्र में प्रयुक्त अङ्गशब्द क्रम का भी द्योतन करता
है। अङ्गक्रम के साथ ही प्रधान क्रम अपनाना उचित होता है।
इस अङ्ग क्रम के अनुसार प्रथम अङ्ग गणपति हैं। द्वितीय खण्ड के
आरम्भ में एक तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है। वहाँ लिखा गया
है कि,
“सद्गुरु द्वारा दीक्षा के लिये निर्देशानुसार स्वीकृत अनुशासन की योग्यता
से विभूषित और दीक्षा के लिये निर्धारित स्थान पर अवस्थित दीक्ष्य
श्रीविद्योपासना में आने वाले विघ्नों के निराकरण के लिये गणपति-क्रम-पद्धति
का स्वात्म परामर्श करे।”
इस निर्देश में यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि, विघ्नों के निराकरण
के लिये जो सबसे पहले स्वीकार्य होता है, वही प्रधान अङ्ग माना जाता है।
यह लोकसमर्थित दृष्टि है।
इसी तरह तृतीय खण्ड के आरम्भ में भी लिखा है कि, गणपति की
आराधना से उपासना में आने की सम्भावना वाले सारे विघ्नों का निराकरण
करने के उपरान्त समस्त शक्तिचक्र की एकमात्र नायिका सर्वेश्वरी भगवती
श्री माँ ललिताम्बा की उपासना का क्रम अपनाये।”
इस देशना में आने वाली पूर्वकालिक क्रिया के प्रत्यय से यह प्रतीत
होता है कि, गणपति-क्रम के बाद ललितोपासना का ही क्रम अपनाना चाहिये।
श्यामोपासना खण्ड में यह स्पष्ट उल्लेख है कि, “माँ ललिताम्बा के
प्रधान सचिव पद पर श्यामा ही प्रतिष्ठित हैं।” इस प्रकार अङ्ग की दृष्टि से
विचार करने पर अन्य सभी अङ्ग रूप से उपास्य हैं, यह स्पष्ट हो जाता है।
अन्त में सिद्धान्त श्रावण की प्रक्रिया अपनायी जाती है। सिद्धान्त शब्द
३४ परशुरामकल्पसूत्रम्
श्रीविद्योपासना में स्वीकृत विधियों के प्रतिपादक वाक्य समूह की ओर संकेत
करता है। यहाँ सिद्धान्त का सुनाना मात्र ही निर्दिष्ट है। अर्थबोधपूर्वक समझाने
की अपेक्षा एक संस्कार उत्पन्न करने के लिये शिष्य को सिद्धान्त श्रावण करे,
यही तात्पर्य है।।३४।।
अथ शाम्भवीदीक्षामाह
तच्छिरसि रक्तशुक्लचरणं भावयित्वा तदमृतक्षालितं
सर्वशरीरमलङ्कुर्यात् ।।३५।।
तच्छिरसि शिष्यस्य शिरसि। रक्तशुक्लचरणं, रक्तं कामेश्वर्या रजः-
स्वभावात्। तदुक्तं 'रक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम्' इति। श्यामा-
रहस्येऽपि—
"रक्तं तु चरणं देव्या रजोरूपं प्रकीर्त्तितम्।
शुक्लं च तदधिष्ठानचरणं सात्त्विकं भवेत्।।"
एतेन शुक्लचरणमपि व्याख्यातम्। प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावः। भावयित्वा
ध्यात्वा। तदमृतं चरणसम्बन्धि यदमृतम् उदकं तेन क्षालितं नाशितं सर्वपातकं
यस्य। ईदृशं शिष्यं कुर्यात्। तस्य सर्वं यावच्छरीरं गन्धवस्त्रभूषणकुसुमादिभिः
गुरुः अलङ्कुर्यात्।।३५।।
शाम्भवी दीक्षा के लिये तैयार शिष्य के शिर पर रक्त-शुक्ल चरणों का
ध्यान गुरु करे। भावन क्रिया ध्यानमय होती है। शिर व्यक्ति का उत्तमाङ्ग होता
है। उसमें नादानुसन्धान से लेकर समनापर्यन्त समस्त शक्तियों का उल्लास होता
है। इसलिये शाम्भवी दीक्षा सदृश महत्त्वपूर्ण दीक्षा के लिये उसके शिरोभाग में
कामेश्वरी के रक्त और कामेश्वर के शुक्ल चरणों का भावन कर शिष्य के मस्तिष्क
चक्र को चरण चेतना की चिन्मयता से समन्वित करना आवश्यक होता है।
जहाँ तक रक्त चरण का प्रश्न है, आगम कहता है कि, "रजः स्वभाव
के कारण कामेश्वरी के चरण रक्तवर्णी होते हैं।"
साथ ही यह भी कहा गया है कि, "परा अम्बिका का ध्यान करते समय
माँ के चरणों की लाली में डूब जाना चाहिये"।
दीक्षाविधिः ३५
श्यामारहस्य नामक साधना उपासना के महान् ग्रन्थ में रक्त और शुक्ल
दोनों चरणों के विषय में इस प्रकार लिखा गया है—
"परमोपास्या माँ के चरण लाली से ललित और आकर्षक हैं। यह लालिमा
रजोरूपता की प्रतीक है, ऐसा शास्त्र कहते हैं। कामेश्वर के चरण शुक्लता से
ललाम लगते हैं। इसका कारण परमेश्वर की पारमार्थिक सात्त्विकता है।
सूत्र में चरण शब्द के एकवचन का कारण व्याकरण शास्त्र का वह नियम
है, जिसके अनुसार प्राणियों के अङ्ग प्रयोग में एकवचनत्व हो जाता है।
ऐसे चरण शिष्य के शिरोभाग पर अमृत उड़ेल रहे हैं। चरणों से गङ्गा-
रूप ब्रह्मद्रव की परिकल्पना कितनी हृदयावर्जक है। यहाँ सूत्रकार के अनुसार
उनसे अमृत बरस रहा है। शिष्य के सारे पाप-ताप धुल गये हैं। अब वह
पातकरहित तप्तदिव्यकाञ्चनवत् निर्मल हो गया है। उसका सारा शरीर पावनता
का प्रतीक बन गया है। उसे गुरुदेव अपने अनुग्रह से अलङ्कृत करते हैं।
सूत्रकार ने गुरु के लिये यहाँ विधिलिङ् परस्मैपद प्रयोग द्वारा यह निर्देश दिया
है कि, उसे ऐसा करना चाहिये। वृत्तिकार द्वारा गन्ध, वस्त्र, अलङ्कार द्वारा
अलङ्कृत करने की बात व्यावहारिक नहीं लगती। यहाँ अलंकरण का तात्पर्य
सारे शरीर को सजाने से नहीं वरन् अनुगृहीत कर पुलकायमान करने मात्र
से है।।३५।।
शाक्तीं दीक्षामाह
तस्यामूलब्रह्मविलं प्रज्वलन्तीं प्रकाशलहरीं ज्वलदनलनिभां
ध्यात्वा तद्रश्मिभिस्तस्य पापपाशान् दग्ध्वा ।।३६।।
तस्य शिष्यस्य मूलं पायूपस्थमध्यवर्त्ति-चतुर्दलकमलाधारदेशः, तन्म-
र्यदेति आमूलम्। एवम् अधोमर्यादामुक्त्वा ऊर्ध्वमर्यादामाह ब्रह्मबिलं सहस्र-
दलकमलाधारभूतं मर्यादा अस्येति आब्रह्मबिलं प्रज्वलन्तीम्, अत एव प्रकाशानां
लहर्य ऊर्मयो यस्यां तादृशीम्, अत एव ज्वालायुक्तो योऽनलोऽग्निस्तन्निभां
तदुपमां ध्यात्वा संविदमिति शेषः। ज्वलदनलनिभत्वादेव पापपाशदाहकत्वमुप-
पन्नम्। पापपाशस्य दाह एव न भावनम् अत एव दग्ध्वेति। यद्यप्यत्रत्यपाठ-
क्रममनुसृत्य आदौ शाम्भवी, ततः शाक्तीति प्रतिभाति, तथाप्युपक्रमे दीक्षा-
३६ परशुरामकल्पसूत्रम्
विभागवेलायां शाक्ती शाम्भवी मान्त्री चेति चोक्तत्वाद् उपक्रमानुसारेण
उपसंहारोऽन्यथा नेयः, वेदोपक्रमाधिकरणन्यायेन। अत एव तत्पाशदाहानन्तरं
तद्भस्मरूपमलस्य सत्त्वात् चरणनिर्गतजलेन तत्क्षालनरूपार्थवत्त्वादर्थक्रमोऽ-
प्युपपन्नः। तथा चादौ शाक्तीं दीक्षां सम्पाद्य पश्चाच्छाम्भवीं कुर्यादिति
सिद्धम् ।।३६।।
शिष्य के मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र के परिवेशपर्यन्त निरन्तर जलने वाली
प्रकाश लहरी के जाज्वल्यमान अग्निपुञ्ज की ज्वालामयी लपटों से उद्दीप्त अनुभव
कर उसी ध्यान में समाहित होकर उसकी पापमयी पाशराशि को जलाकर शिष्य
को निष्पाप कर देना शाक्ती दीक्षा का एक स्वरूप है।
उस शिष्य में मूलाधार चक्र से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त सुषुम्ना के माध्यम
से उद्दीप्त संवित्ति का गुरुदेव सर्वप्रथम आकलन करें। मूलाधार चक्र कहाँ है,
टीकाकार आचार्य रामेश्वर के अनुसार यह पायु और उपस्थ के मध्य में है।
वास्तव में उस स्थान को कन्द कहते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि, सारे
चक्र मेरुदण्ड से सम्बद्ध हैं। मेरुदण्ड की निचली और नुकीली अस्थि जहाँ
समाप्त होती है, कुण्डलिनी वहीं साढ़े तीन आवृत्ति में लिपटी होती है। उसे
जागृत करने के लिये अश्विनी मुद्रा और ह्रस्व कूर्च बीज का आन्तर उच्चार
आवश्यक है। यह क्रिया कन्द में नहीं अपनायी जा सकती। चतुर्दल कमलवाली
उक्ति सर्वमान्य है। इस प्रसङ्ग में एक बात और भी ध्यान देने योग्य है। मेरुदण्ड
में अवस्थित चक्रों के आगे के मानव देह की संरचना में कोई न कोई अंग
सामने पड़ता है, जैसे— मूल के समक्ष कन्द, स्वाधिष्ठान के समक्ष लिङ्गमूल,
मणिपूर के समक्ष नाभि, अनाहत के समक्ष स्तनमध्य, विशुद्ध के समक्ष गले
की हँसुलियों का मध्य और आज्ञा के समक्ष भ्रूमध्य। इस विवरण से यह सिद्ध
होता है कि, कन्द मूलाधार चक्र का प्रतिष्ठान है, स्थान नहीं। यह शरीर के
स्वः, भुवः और भू-खण्डों में से भूखण्ड के चक्रों का अन्तिम स्थान रूप
मूलाधार है। भूखण्ड में ही स्वाधिष्ठान चक्र भी आता है।
भुवः खण्ड में मणिपूर, अनाहत एवं विशुद्ध ये तीन खण्ड आते हैं।
स्वः खण्ड में आज्ञा और सहस्रार ये दो चक्र ही आते हैं। आज्ञाचक्र के पीछे
तालुरन्ध्र और इसके ऊपर ब्रह्मरन्ध्र है। इसमें सुषुम्ना समाप्त हो जाती है।
दीक्षाविधिः ३७
प्राणशक्ति अत्यन्त सूक्ष्म रूप से कई पड़ावों को पार कर सहस्रदल कमल तक
पहुँच कर परतत्त्व में समाहित होती है।
इन दोनों अर्थात् मूलाधार और ब्रह्मबिल के मध्य में संविद् तत्त्व की
प्रकाश-लहरी अनुभूति का विषय है। वह प्रत्येक जीव की जीवनी शक्ति है।
शिष्य साधना के बल पर इसे और जागृत कर लेता है। गुरु से शिष्य का
परिष्कृत रूप छिपा नहीं रहता। वह उसमें अपनी ऊर्जा का अमृत उड़ेल कर
जाज्वल्यमान उद्दीप्त अग्नि के समान समिद्ध कर शिष्य के पाप-पाशों को दग्ध
कर देता है। सूत्र में दाहक्रिया का प्रयोग पूर्वकालिक क्रिया के रूप में किया
गया है।
पूर्वकालिक क्रिया के बाद मुख्य क्रिया होती है। वही मुख्य क्रिया शाक्ती
दीक्षा है। एक दूसरी बात भी यहाँ ध्यातव्य है। ध्यान तो अग्नि का हुआ।
यह ध्यान गुरु करता है। इसे शिष्य को भी भावित करना चाहिये। अग्नि दाह
करता है। केवल दाह का ही ध्यान यहाँ नहीं, वरन् पापराशि के जलने का
भी ध्यान है। ये आन्तर आनुभूतिक प्रक्रियायें साधना से ही सम्पन्न होती हैं।
इस सन्दर्भ में एक और बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है, सूत्र का
पाठक्रम। पहले शाम्भवी दीक्षा की बात कही गयी है फिर शाक्ती दीक्षा देने
का उल्लेख है। वास्तविक क्रम क्या है? यह जिज्ञासा यहाँ शेष रह जाती है।
दीक्षा का विभाग करते समय सर्वप्रथम शाक्ती का क्रम परम्पराप्राप्त है। तदन्तर
शाम्भवी दीक्षा दी जाती है। इनसे ऊर्जस्वल शिष्य को मान्त्री दीक्षा देकर गुरुदेव
उसे मन्त्रात्मिका चेतना की चिन्मयता से समन्वित करते हैं।
उपक्रम और उपसंहार दो स्थितियों पर ध्यान देकर उस विषय में विचार
करना चाहिये। इसमें प्रमाण वेदोपक्रमाधिकरण की व्यवस्था है। यह एक न्याय
अर्थात् नियम है कि, उपक्रम का स्वरूप क्या है। यहाँ उपक्रम शांभवी से किया
गया है। शाक्ती बीच में है किन्तु उपसंहार अन्यथा घटित है। पापदाह तो कर
दिया गया। पापदाह में भी यह ध्यातव्य है कि, शरीर में रहने वाला मल ही
जलता है। दूरीकृत मल नहीं। शरीरस्थ मल जब भस्म बनकर शरीर में ही
रह जाय, यह भी ठीक नहीं। इसीलिये उस शिष्य के शिर पर चरणनिर्गत
अमृतवारि से उसका प्रक्षालन करते हैं। इस प्रकार क्रमवत्ता की पूर्ति भी होती
है, और मान्त्री दीक्षा से दीक्षा का उपसंहार भी हो जाता है॥३६॥
३८ परशुरामकल्पसूत्रम्
मान्त्रीदीक्षाप्रयोगं वक्तुमुपक्रमते
त्रिकटु-त्रिफला-चतुर्जात-तक्कोल-मदयन्ती-सहदेवी-दूर्वा-
भस्म-मृत्तिका-चन्दन-कुङ्कुम-रोचना-कर्पूरवासितजलपूर्णं वस्त्रयुगवेष्टितं
नूतनकलशं बालाषडङ्गेनाभ्यर्च्य श्रीश्यामा-वार्तालीचक्राणि निःक्षिप्य
तिसृणामावरणमन्त्रैरभ्यर्च्य संरक्ष्यास्त्रेण प्रदर्श्य धेनुयोनी ।। ३७ ।।
त्रिकटुः-पिप्पली-शुण्ठी-मरीच्यः।
त्रिफला-हरीतकी-धात्री-विभीतक्यः।
तदुक्तं वैद्यसारे
शुण्ठी मरीचिपिप्पल्यः प्रोक्तास्त्रिकटुसंज्ञकाः।
त्रिफलेति समाख्याता पथ्या-धात्री-विभीतकैः।।
चतुर्जातम्—उशीरैलालवङ्गनागकेसराणि।
तदुक्तं मदनमहार्णवे
लवङ्गमेलोशीरं च त्रिसुगन्धं प्रकीर्त्तितम्।
नागकेसरसंयुक्तं चतुर्जातं प्रचक्षते ।।
तक्कोलः—मरीचिसदृशस्ताम्बूलेन सह भक्ष्यः शैत्योपचारहेतुवस्तु-
विशेषः।
मदयन्ती सहदेवी। वैद्यके प्रसिद्धे आरण्यके। दूर्वा-भस्म-मृत्तिकाः
प्रसिद्धाः। एतैर्युक्तं जलेन साकं वासितं चन्दनम्, कुङ्कुमं काश्मीरम्, रोचना
गोरोचनं, कर्पूरं प्रसिद्धम्। एतैर्वासितं यज्जलं तेन पूर्णं। वस्त्रयुगेन वेष्टितं
नूतनम् अभुक्तं कलशं बालाषडङ्गेन।
(“ऐं हृदयाय नमः, क्लीं शिरसे स्वाहा, सौः शिखायै वषट्, ऐं
कवचाय हुम्, क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट्, सौः अस्त्राय फट्”) अग्नीशासुरवायु-
कोणेषु मध्ये पूर्वादिदिक्षु क्रमेण अभ्यर्च्य, श्रीश्च श्यामा च वार्त्ताली चेति तासां
चक्राणि निक्षिप्य जले स्थापयित्वेत्यर्थः। तिसृणां ललितादीनामावरणमन्त्रै-
रभ्यर्च्य पूजयित्वा, अस्त्रेण संरक्ष्य, धेनु-योनि-मुद्रे प्रदर्श्य ।। ३७ ।।
दीक्षाविधिः ३९
त्रिकटु, त्रिफला, उशीर-इलायची-लवङ्ग-नागकेसर रूप चतुर्जात,
ताम्बूल-सहद्रव्य रूप तक्कोल, सहदेवी, दूर्वा, भस्म, मृत्तिका इन ओषधि रूप
द्रव्यों से वासित जल में चन्दन, कुङ्कुम, गोरोचन और कर्पूर मिलाकर तैयार
पवित्र जल से कलश को भर देना चाहिये। साथ ही दो लाल वस्त्रों से उसे
सजा कर उस कलश की पूजा करनी चाहिये। पूजा में पहला कार्य कलश का
संस्कार माना जाता है। कलश उसी समय संस्कृत होता है, जब उसे बालाषडङ्ग
मन्त्र से अभिमन्त्रित किया जाता है। इन मन्त्रों को मैंने संस्कृत टीका में कोष्ठक
में स्पष्ट कर दिया है। इनसे सभी पूर्वादि दिशाओं एवं अग्नि, ईशान, नैऋत्य
और वायुकोणों में भी पूजन का विधान है।
दूसरी पूजा प्रक्रिया चक्रपूजा है। श्रीविद्या-चक्र, श्यामा-चक्र और वार्त्ताली-
चक्र इन तीनों चक्रों की पूजा-पद्धति कलश के अतिरिक्त भूमि पर, पत्र पर
या यन्त्र पर करने की प्रक्रिया को भी मान्यता देती है। किन्तु सूत्रकार के अनुसार
चक्र पर पूजा कर चक्र कलश में ही स्थापित किया जाना प्रतीक बन जाता
है। उसी समय कलश पूजा पूरी होनी चाहिये।
इसके बाद ललिताम्बा, श्यामा और वार्त्ताली के आवरण मन्त्रों से
सचक्र, सवस्त्रवेष्टित जलपूर्ण कुम्भ की भी अर्चना सम्पन्न करनी चाहिये।
परम्परा के अनुसार चक्रोद्धार की भी क्रिया करते हैं। अस्त्रमन्त्र से विघ्नों
का अपसारण कर चक्र स्थान पर चक्रों को रख देते हैं। तदनन्तर धेनु-
मुद्रा और योनि-मुद्रा का प्रदर्शन करते हैं। धेनु-मुद्रा से आराध्या परमाम्बा
में वात्सल्य का उद्रेक होता है और योनि-मुद्रा से यह सिद्ध होता है
कि, माँ तू ही विश्व की मूल उत्स है। ये मुद्रायें स्तुतिपरक मुद्रायें मानी
जाती हैं।।३७।।
मातृकायन्त्रमाह
शिवयुक्सौवर्णकर्णिके स्वरद्वन्द्वजुष्ट-किञ्जल्काष्टके क च ट
त प य श लाक्षरवर्गाष्टियुक्ताष्टदले दिगष्टकस्थित ठं वं चतुरस्रे
मातृकायन्त्रे शिष्यं निवेश्य तेन कुम्भाम्भसा तिसृभिः विद्याभिः
स्नपयेत् ।।३८।।
४० परशुरामकल्पसूत्रम्
शिवो हकारः, तेन युक्तः 'सौ'वर्णः सौ इति वर्णः, स कर्णिकायां
कमलमध्यदेशे यस्य एतादृशे। अत्र पूर्वोक्तवर्णोपरि विसर्गोऽपि योजनीयः
"व्योमेन्द्रौरसनार्णकर्णिकम्" इति शङ्करभगवत्पादैरुक्तत्वात्। इमानि सर्वाणि
कमलविशेषणानि। स्वरा अकारादि-विसर्गान्ताः षोडश। तेषां द्वन्द्वं द्वयं द्वयं तेन
जुष्टं युक्तं किञ्जल्काष्टकं पत्रयुगमध्यवर्तिदेशविशेषो यस्येति बहुव्रीहिः। कश्च चश्च
टश्च तश्च पश्च यश्च लक्ष इति द्वन्द्वः, द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं प्रत्येकं सम्बध्यते इति
न्यायेन वर्गपदं सर्वैः सम्बध्यते। तथा च कवर्गमारभ्य पवर्गपर्यन्तं पञ्च पञ्च
वर्णाः। यवर्गः चत्वारः शवर्गोऽपि। लक्ष इति लवर्गः। एवमष्टवर्गैर्युक्तानि
अष्टदलानि यस्येति बहुव्रीहिः। एकैकदले एकैकं वर्गं लिखेदिति फलितार्थः।
केसरेषु दलेषु च वर्णलेखने क्रमाकाङ्क्षायां प्राच्यादिक्रम एव वर्त्तव्यः।
दिशां यदष्टकं प्राच्यादीशान-दिगन्तं तेषु स्थितौ वकारठकारौ यस्मिन् ईदृशं
चतुरस्रं यस्मिन्निति बहुव्रीहिः। ईदृशे मातृका-संज्ञके यन्त्रे शिष्यं निवेश्य
स्थापयित्वा, तेन कुम्भाम्भसा तिसृभिः विद्याभिः श्रीश्यामा-वार्त्ताली-विद्याभिः
स्नपयेत्। अयमेव पूर्णाभिषेक इत्युच्यते।।३८।।
चतुरस्रमातृकायन्त्र
दीक्षाविधिः ४१
यह मातृका यन्त्र है। इसकी विधि इस चित्र से स्पष्ट है। पूरी संस्कृत
विवृति में यही क्रम बताया गया है। बीच में एक वृत्त बनाइये। उसमें
ह्सौः लिख दीजिये। उसके ऊपर एक बड़ा वृत्त बनाइये। उस वृत्त के ऊपर
कमलपत्तों के समान बराबर-बराबर आठ दल बनाइये। पूर्व दक्षिण पश्चिम उत्तर
कमल दलों का स्पर्श करती चार ऐसी सीधी रेखायें खींचिये, जिससे एक
समचतुर्भुज बन जाय। इस चित्र में जैसे अक्षर लिखे हुए हैं। उसे अपने द्वारा
निर्मित चित्र में भर दीजिये। मातृका यन्त्र तैयार। इसी के बीच में शिष्य को
बिठलाना चाहिये। उसी कलश के पावन जल से शिष्य को श्रीविद्या मूलमन्त्र,
श्यामा मूलमन्त्र और वार्त्ताली मूलमन्त्र से स्नान कराना चाहिये। इसे पूर्णाभिषेक
कहते हैं॥३८॥
मान्त्रीं दीक्षामुपसंहरति
सदुकूलं सालेपं साभरणं समालं सुप्रसन्नं शिष्यं पार्श्वे निवेश्य
मातृकां तदङ्गे विन्यस्य विमुक्त-मुखकर्पटस्य तस्य हस्ते त्रीन् प्रथम-
सिक्तान्
४२ परशुरामकल्पसूत्रम्
मुख-बन्ध से मुक्त कर दिया गया, जिससे वह खुली आँखों से पारमेश्वरी सर्जना
का शैव स्वरूप ध्यान में ला सके।
उसके हाथ में प्रथम सिक्त अर्थात् पहले से ही सिक्त होने के लिये
रखे गये थे और गुरु द्वारा शिष्य को देने के लिये रखे गये दूसरे भाग को
देकर तत्त्व मन्त्रों से (ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा) (क्लीं विद्यातत्त्वं
शोधयामि नमः स्वाहा) (सौः शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहाः) उसे खिलाना
चाहिये। यह ध्यातव्य है कि, उस खण्ड को चन्दन से भी सिक्त करना
चाहिये।
उसके बाद उसके दाहिने कान में त्र्यक्षरी बाला मन्त्र का उपदेश करना
चाहिये। त्र्यक्षरी बाला “ऐं क्लीं सौः” मन्त्रमयी मानी जाती है। इस मन्त्र का
उपदेश मन्त्र बोलकर होना चाहिये, जिसे शिष्य ग्रहण कर सके। इसके बाद
इष्ट मन्त्र का कथन भी करना चाहिये। इष्ट मन्त्र गुरु पर निर्भर है।।३९।।
गुरुकर्त्तृकं कर्मशेषं वदति
ततस्तस्य शिरसि स्वचरणं निक्षिप्य सर्वान् मन्त्रान् सकृद्वा
क्रमेण वा यथाधिकारमुपदिश्य स्वाङ्गेषु कमप्यङ्गं शिष्यं स्पर्शयित्वा
तदङ्गमातृकावर्णादि द्व्यक्षरं त्र्यक्षरं चतुरक्षरं वा आनन्दनाथशब्दान्तं
तस्य नाम दिशेत् ।।४०।।
तत इत्यनेन वक्ष्यमाणधर्माणाम् उत्तराङ्गत्वं सूचितम्। स्वस्य गुरोः
चरणम् “अनादेशे दक्षिणं प्रतीयात्” इति परिभाषया दक्षिणचरणमेव
न्यसेत्। सर्वान् मन्त्रान् श्रीविद्याङ्गभूतान् गणपति-श्यामा-वार्त्ताली-परा-पञ्चदशी
नित्या-रश्मिमाला-मन्त्रादीन् सर्वान् सकृद्वा इत्यत्र वाकार एवकारार्थः। क्रमेण
वा तत्तदुपासनवेलायां वा यथाधिकारम् उपदिश्य स्वाङ्गेषु किमप्यङ्गं शिष्यं
स्पर्शयित्वा 'कस्यापि ममाङ्गस्य स्पर्शं कुरु' इत्यादिश्य। ततः शिष्यो
यमवयवं स्पृशेत् तत्र मातृकान्यासे यो वर्णः स आदिर्यस्मिन् ईदृशम्। यथा
शिरःस्पर्शे तत्र मातृका-वर्णः अकारः स आदिर्यस्य अमृतानन्दनाथ इति।
द्व्यक्षरं वेत्यादि स्पष्टार्थः। आनन्दनाथशब्दान्तं स्पष्टम्। तस्य शिष्यस्य नाम
दिशेत् ।।४०।।
दीक्षाविधिः ४३
इतना कर्मकाण्ड सम्पन्न कर लेने के बाद गुरुदेव अपना दाहिना चरण
शिष्य के शिर पर रखें। यह ध्यातव्य है कि, पादाधस्तल में श्री देवी का निवास
होता है। श्रीविद्या की दीक्षा के क्रम में शिष्य का सहस्रार श्रीविद्या की रश्मियों
से प्रकाशमान हो उठे, यह शिष्य के शिर पर गुरुचरण रखने का रहस्य है।
सूत्र में दायें-बायें किसी चरण का निर्देश नहीं है। अतः जहाँ निर्देश नहीं होता,
वहाँ दाहिना ग्रहण करना चाहिये। इस नियम के अनुसार गुरु का दाहिना चरण
ही शिष्य के शिर पर रखना चाहिये, उपासना में या उसी अवस्था में सभी
मन्त्रों का चाहे एक बार या श्रीविद्या के अङ्गभूत गणपति-श्यामा-वार्ताली परा-
पञ्चदशी-नित्या-रश्मिमाला इत्यादि सभी मन्त्रों का क्रमशः अधिकारानुसार उपदेश
करना चाहिये। श्रद्धा, भक्ति की कमी पर अपेक्षानुसार अधिकार की परीक्षा गुरु
कर लेता है।
इसके बाद गुरुदेव शिष्य को यह आदेश देते हैं कि, मेरे शरीर के किसी
अवयव का स्पर्श करो। आज्ञानुसार शिष्य गुरु के जिस अङ्ग का स्पर्श करता
है, गुरु यह जानता है कि, इस अङ्ग पर मातृका के किस अक्षर का न्यास
है। उस अक्षर से प्रारम्भ होने वाले द्व्यक्षर, त्र्यक्षर या चतुरक्षर संज्ञा शब्द के
साथ अमृतानन्द सदृश शब्द से नाथ लगाकर शिष्य का नाम रखने का आदेश
दे। जैसे शिष्य ने शिर का स्पर्श किया। गुरु का वह अङ्ग 'अ' अक्षर से न्यास-
युक्त है। अतः अमृतानन्दनाथ नाम रखना उचित माना जाता है क्योंकि इसके
आदि में 'अ'कार आता है। नाम दो, तीन और चार अक्षरों का होना चाहिये।
अमृत शब्द भी तीन अक्षरों वाला ही है।।४०।।
गुरुपादुकामन्त्रदानम्
बालोपदिष्टेः पूर्वमात्मनः पादुकां षट्त्तारयुक्तां दद्यात् ।।४१।।
द्वितीयशकल-ग्रासानन्तरं बालोपदिष्टेन पूर्वम् आत्मनः पादुकाम्
आत्मनः गुरोर्दीक्षाकाले दत्तं यन्नाम तद्घटितपादुकाऽन्तं मन्त्रं षट्त्तारयुक्तं तस्मै
उपदिशेत्। षट्त्तारश्च कुलार्णवे—
वाग्भवं च परा श्रीश्च कालीबीजं ततः प्रिये।
भुवनेशी मन्मथं च षट् ताराश्च प्रकीर्त्तिताः।।
४४ परशुरामकल्पसूत्रम्
अमुकानन्दनाथ श्रीपादुकां पूजयामीति।।४१।।
उपर्युक्त क्रम में द्वितीय खण्ड के ग्रास का वर्णन किया गया है। उसके
बाद और बालामन्त्रोपदेश के पहले गुरु अपनी पादुका का मन्त्र शिष्य को
बतलाये। गुरु की दीक्षा के समय परमगुरु ने उन्हें जो मन्त्र दिया होता है,
उस नाम को लगा कर कहना चाहिये कि, “अमुकानन्दनाथ श्रीपादुकां पूजयामि'।
इस मन्त्रात्मक वाक्य के पहले वाग्भवबीज, पराबीज, श्रीबीज, कालीबीज,
भुवनेशीबीज और मन्मथबीज रूप छः देवी प्रणवों का उच्चारण करना चाहिये।
गुरुपादुकामन्त्र परमेष्ठिगुरु, परमगुरु और दीक्षागुरु के क्रम से कुछ पृथक् से
प्रयुक्त किये जाते हैं।।४१।।
आचारानुशासनादिः
आचाराननुशिष्य हार्द-चैतन्यमामृश्य विद्यात्रयेण तदङ्गं त्रिः
परिमृज्य परिरभ्य मूर्धन्यवघ्राय स्वात्मरूपं कुर्यात् ।।४२।।
आचारान् दशम-खण्डे वक्ष्यमाणान् अनुशिष्य शिक्षयित्वा हार्दं
हृदयाकाशसम्बन्धि चैतन्यं तं शिष्यमामृश्य ध्यात्वा स्वहृदयस्थचैतन्याभिन्नं
शिष्यं भावयेदित्यर्थः। विद्यात्रयेण श्री-श्यामावार्त्तालीविद्याभिः तदङ्गं त्रिः
स्वहस्तेन शिष्यस्य सर्वशरीरं संस्पृश्य परिरभ्य आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय
स्वात्मरूपं कुर्यात्। स्वस्य यथा आत्मा मोक्षप्रतिबन्धकपौरुषमलरहितस्तथा तं
कुर्यात् ।।४२।।
दशवें खण्ड में निर्दिष्ट आचारों की शिक्षा शिष्य के लिये गुरु दे।
हृदयाकाश में प्रकाशमान चैतन्य गुरु के हृदय में जैसे है, उसी प्रकार के चैतन्य
को शिष्य के हृदयाकाश में ध्यान द्वारा उल्लसित और अभिन्न रूप से उद्रिक्त
कर दे। श्री, श्यामा और वार्त्ताली विद्याओं के उच्चारणपूर्वक पारम्परिक रूप
से शिष्य के सारे शरीर का स्पर्श करे। शिष्य को अपने हृदय से लगा ले।
शिर को सूँघकर उसे स्वात्म रूप में आत्मसात् कर ले। जैसे मोक्ष के प्रतिबन्धक
पौरुष मल से स्वयम् उन्मुक्त हैं, उसी तरह उसे भी निर्मल बनाकर मोक्ष मार्ग
में अग्रसर कर दे। यह दीक्षागुरु का उत्तरदायित्व है।।४२।।