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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 320 में से

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पृष्ठ 55

दीक्षाविधि: १३
तक विश्वास का प्रश्न है, यह वहीं होता है, जहाँ वाक्य प्रयोक्ता के प्रति यह
निश्चय होता है कि, यह प्रयोगकर्त्ता 'आप्त' पुरुष है।
अतिशायने अर्थ में 'तमप्' और इष्ठन् प्रत्यय होते हैं। यह पाणिनि सूत्र
(५।३।५५) का अर्थ है। बहु को भू आदेश और इट् का आगम होने पर
भूयिष्ठ शब्द व्युत्पन्न होता है। बहुत्व विशिष्ट पुरुषार्थ की अपेक्षा इसमें निहित
है। पुरुष में विश्वास की भूयिष्ठता उत्तरोत्तर उत्पन्न विश्वास के उत्कर्ष की सूचना
देती है। विश्वास विशिष्ट भूयिष्ठता इसका अर्थ नहीं करना चाहिये। यहाँ भूयिष्ठता
का आश्रय ज्ञान है। अतः अत्यन्त विश्वास सम्पन्न पुरुष द्वारा वेद्य ही इस शास्त्र
का प्रामाण्य है, यह इस सूत्र का निष्कर्षार्थ होता है। कुतर्कशाली पुरुष को
शास्त्र प्रामाण्य अगम्य ही रहता है। इसी तथ्य का समर्थन कुमारिल भट्ट की
इस उक्ति से होता है—
“जो अर्थ एकमात्र शास्त्र के द्वारा ही गम्य हैं, उन्हें तर्कों द्वारा दूषित
नहीं करना चाहिये।”
भूयिष्ठ ज्ञान का प्रामाण्य से अभेदान्वय सम्बन्ध ही यहाँ अपेक्षित
है॥१०॥
सहकार्यान्तरमाह
गुरुमन्त्रदेवताऽऽत्मनःपवनानाम् ऐक्यनिष्फालनादन्तरात्म-
वित्तिः ।।११।।
गुर्वादयः स्पष्टाः। पवनाः पञ्चप्राणाः। एतेषामैक्यनिष्फालनं भावनया
एकत्वसम्पादनम्, तेन अन्तरात्मनः प्रत्यगात्मनो वित्तिर्वेदनं भवतीति शेषः।
जपरूपोपास्तिफलम्
सम्प्रदायविश्वास-सहित-मन्त्रकरणकोपास्तेः फलमाह— ऐक्यनिष्फालन-
मैक्युनिर्णयः, तद्द्वारा प्रत्यगात्मज्ञानं भवतीति विशिष्टार्थः।
उमानन्दनाथास्तु
गुरुमन्त्रेत्यस्य आरम्भोल्लासे गुरुमन्त्रदेवतात्मनामैक्यभावनम् एकं
साधनं, मनःपवनयोरेकयत्ननिरोद्धव्यत्वज्ञानं चापरं, द्वाभ्यां कार्यसिद्धिरिति
व्याचक्रुः ।।११।।