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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 320 में से

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पृष्ठ 60

१८ परशुरामकल्पसूत्रम्
आत्यन्तिक अप्राप्ति हो, उस समरा कोई नियम बना दिया जाय, उसे विधि
कहते हैं। रहस्य कथन का निषेध है। इस स्थिति में नियम बनाया गया कि,
सच्छिष्य में कथन होना चाहिये। यह विधि है। परिसंख्या पक्ष में होती है। जैसे
मन्त्र गोपन का निषेध है अथवा 'अपना रहस्य नहीं बताना चाहिये, इस निषेध
का अपवाद उक्त नियम है। अर्चन में भी गोपन प्राप्त है। रहस्य कथन में भी
गोपन प्राप्त है। मन्त्र प्रदान में भी गोपन प्राप्त है किन्तु सच्छिष्य में यह विधि
बन गया है। इसलिये यह परिसंख्या विधि है। साहित्य में परिसंख्यालङ्कार भी
इससे मिलता-जुलता है। इसलिये स्वात्मस्वीकृत रहस्य को जिसे व्यक्ति अपना
सम्प्रदायनिष्ठ सिद्धान्त मानता है, उसे समय पालन में संलग्न सामयिक शिष्यों
को प्रदान करने में कोई विप्रतिपत्ति नहीं होनी चाहिये किन्तु शिष्य के अतिरिक्त
अन्य के प्रति कभी भी किसी अवस्था में भी इसे प्रदान नहीं करना चाहिये,
यह शास्त्रकार का मन्तव्य है॥१६॥
पञ्चमधर्ममाह
सदा विद्यानुसंहतिः ।।१७।।
सदा सर्वकालं पूजादिविहितनित्य-कर्मानुष्ठान-कालव्यतिरिक्ते सर्वदेत्यर्थः।
विद्यायाः स्वोपास्य-देवतावाचक-मन्त्रस्य अनुसंहतिस्तत्प्रतिपादितार्थस्य
अनुसन्धानं, कर्तव्यमिति शेषः।
यद्वा अनुसंहतिर्मनसा जपः कार्य इत्यर्थः। न च आसनादि-
नियमरहितस्य जपो युक्त इति शङ्कनीयम्, मानसे कस्यापि नियमस्याभावात्।
तदुक्तं परमानन्दतन्त्रे—
मानसेऽनन्तगुणितं नियमस्तत्र नैव तु।
गच्छन् शयान आसीनो मुक्तो वा यत्र कुत्रचित्।
अस्नातश्चापवित्रश्च न दोषस्तत्र विद्यते॥१७॥
यहाँ सदा शब्द शाश्वत और अजस्र अर्थ में प्रयुक्त नहीं है। समय के
उस काल खण्ड में जिसमें दैनन्दिन नित्य कर्मों का अनुष्ठान उपासक करता
है, उसकी गणना इस सदा के परिवेश में नहीं की जाती। उस काल को छोड़
कर जो समय बचता है, स्वप्न और सुषुप्ति से जो समय बचता है, उसमें
'सदा' अव्यय का प्रयोग किया गया है।