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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 320 में से

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पृष्ठ 65

दीक्षाविधिः २३
नवमं धर्ममाह
सर्वत्र निष्परिग्रहता ॥२१॥
सर्वत्र मपञ्चकादिषु निष्परिग्रहता। निर्गतः परिग्रह इच्छा यस्य सः
निष्परिग्रहः। तस्य भावस्तत्ता। “पत्नीपरिजनादानमूलशापाः परिग्रहाः”
इत्यमरः। अत्रादानस्य परिग्रहस्य मूलम् इच्छैव, एतादृशकोशानुसारेण परिग्रह-
शब्द इच्छावाचकः। मपञ्चकं मे भूयाद् इतीच्छया न स्वीकार्यम्।
यद्वा—सर्वत्र वस्तुमात्रे निष्परिग्रहता स्वीयबुद्धित्यागः सम्पादनीयः।
सर्वत्र ममता त्याज्येति यावत्॥२१॥
सर्वत्र मपञ्चक आदि में निष्परिग्रहता होनी चाहिये। यह सूत्र का संक्षिप्त
अर्थ है। यहाँ सर्वत्र शब्द का मपञ्चक आदि में यह अर्थ किया गया है।
सामान्यतया सर्वत्र शब्द से सर्वस्थान का प्रकल्पना होता है। सर्व शब्द के परिवेश
में सारा विश्वप्रपञ्च आता है। इस दृष्टि से इसका अर्थ 'इस विश्वात्मक प्रपञ्च
और स्थानात्मक विस्तार में परिग्रह बुद्धि नहीं रहनी चाहिये' यही होना चाहिये।
परिग्रह शब्द अमरकोश के अनुसार पत्नी, परिजन, आदान, मूल और
शाप इन अर्थों में प्रयुक्त होता है। कुछ लोग आदान को मूल के साथ जोड़कर
चार अर्थ ही करते हैं। इस दृष्टि से जिन व्यक्तियों के स्वभाव से ये निर्गत
हो जाते हैं, वे निष्परिग्रह कहलाते हैं। निष्परिग्रह का भाव ही निष्परिग्रहता
कहलाती है। परिग्रह शब्द का 'इच्छा' अर्थ भी करते हैं। मपञ्चक में मेरी इच्छा
हो अथवा मपञ्चक मुझे हो इस इच्छा से किसी की स्वीकृति नहीं होनी चाहिये।
इस सूत्र का एक वैकल्पिक अर्थ भी वृत्तिकार ने प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार
सर्वत्र वस्तु मात्र में 'यह मेरी है' इस प्रकार की बुद्धि का त्याग ही सर्वत्र निष्परि-
ग्रहता है। इसका सदैव सम्पादन होना चाहिये। अर्थात् कहीं ममता नहीं होनी
चाहिये॥२१॥
दशमं धर्ममाह
फलं त्यक्त्वा कर्मकरणम् ॥२२॥
फलं पूर्वोक्तं कृत्रिमं तत्साधनं च धर्मार्थकामा इति यावत्।
फलविषयिणी इच्छा फलपदस्यार्थः। तं त्यक्त्वा कर्मणो विहितस्य करणं