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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 320 में से

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पृष्ठ 58

१६ परशुरामकल्पसूत्रम्
उपासकधर्मः भावनादार्ढ्यम्। 'अहमिदं जानामि' इत्येतादृशवृत्तिषु इदं
पदार्थपेक्षया अहंतया भासमानं श्रेष्ठमिति विवेचनम्-सर्ववृत्तिषु इदमेव भावना-
पदार्थः। तस्य दार्ढ्यम् अशैथिलता। अनेन आज्ञासिद्धिः, निग्रहानुग्रहसामर्थ्यं
भवतीति शेषः। भावनादार्ढ्यस्तुत्या सर्वदा ईदृशभावनाविधिरुन्नेयः॥१३॥
उपासक का सबसे बड़ा धर्म है, भावना की दृढ़ता। भावना क्या है,
इसे समझाते हुए वृत्तिकार कहते हैं कि, जब कोई 'मैं यह जानता हूँ' इस वाक्य
का प्रयोग करता है, तो इस प्रयोग में 'यह' कर्म पदार्थ प्रधान नहीं होता वरन्
ज्ञानवान् 'मैं' की ही प्रधानता होती है। सारे व्यवहार जगत् में गौणत्व और
प्रधानत्व का बोध ही भावना है। भावना एक प्रकार से वास्तविक विवेचना ही
होती है। शैथिल्य के लिये इसमें स्थान नहीं होता। इससे निग्रह और अनुग्रह
की शक्तिरूपी आज्ञा की सिद्धि होती है। भावना की दृढ़ता सर्वत्र अपनानी
चाहिये॥१३॥
उपासकस्य नियमान्तरमाह
सर्वदर्शनानिन्दा ॥१४॥
इतरदेवतोपासनाविधायकानि यानि दर्शनानि शास्त्राणि तेषां निन्दा न
कर्त्तव्येत्यर्थः। तन्निन्दने तदधिकारिणां संशयोत्पत्त्या स्वावलम्बितदर्शनेष्व-
नाश्वासः। अस्मिन् शास्त्रे अनधिकाराद् उभयभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्येत्।
इममेवार्थं श्रीकृष्णोऽप्याह—
'न बुद्धि-भेदं जनयेदज्ञानां कर्म-सङ्गिनाम्' ।
'लोकान्न निन्द्यात्' इति श्रुतिरपि ॥१४॥
संसार में जितने दर्शन हैं, किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिये। बहुत
से ऐसे दर्शन हैं और शास्त्र हैं, जो अन्यान्य देवोपासना का विधान करते हैं।
यद्यपि वे स्वात्मस्वीकृत मान्यता के विपरीत होते हैं, फिर भी उनकी निन्दा
कदापि नहीं करनी चाहिये। निन्दा से उसके अनुयायियों के विश्वास में भेद उत्पन्न
होने की सम्भावना होती है। आस्था-शैथिल्य बड़ा भारी दोष है। इससे जैसे
बिखरे बादल नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह स्व और पर दोनों में विश्वास की
कमी से उपासक उभयतः भ्रष्ट हो जाता है।