सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 48

६ परशुरामकल्पसूत्रम्
(क्षीण होती है) और विनश्यति (नष्ट हो जाती है) इस छः प्रकार की
अस्तित्वगत गतिशीलता से प्रभावित और संकुचित होती है। यही काल नामक
कञ्चुक है। यह दशवाँ तत्त्व है।
परशिव और जीव में अभेद है। जैसे परशिव में सर्वस्वातन्त्र्य है, वैसा
ही स्वातन्त्र्य जीव में भी है। इसका पिधान अविद्या करती है। यह कारणसापेक्ष
प्रक्रिया है। नियति ही वह कारण है। यह नियति ही ग्यारहवाँ तत्त्व है।
जीव इन नियति, काल, राग, कला और अविद्यारूप ५ कञ्चुकों का
आश्रय बन जाता है। यह बारहवाँ तत्त्व है।
सत्त्व, रजस् और तमस् गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है। इसे एक-
दूसरे पर्याय चित्त शब्द से भी बोधित करते हैं। यह तेरहवाँ तत्त्व है। सत्त्व
और तमस् को अभिभूत कर वर्त्तमान रजःप्रधान संकल्प हेतु तत्त्व ही मन
कहलाता है। यह चौदहवाँ तत्त्व माना जाता है।
रजस् और तमस् को अभिभूत कर प्रवर्त्तित सत्त्वप्रधान अन्तःकरण निश्चय
का हेतु होता है। इसे बुद्धि तत्त्व कहते हैं। यह पन्द्रहवाँ तत्त्व है। रजस् और
तमस् को अभिभूत कर प्रवर्त्तित तमःप्रधान अहंकार तत्त्व विकल्पों का कारण
माना जाता है। यह सोलहवाँ तत्त्व है।
शब्दग्राहक इन्द्रिय श्रोत्र कहलाती है। यह सत्रहवाँ तत्त्व है।
स्पर्शग्राहक इन्द्रिय त्वक् अठारहवाँ तत्त्व है।
रूपग्राहक इन्द्रिय चक्षु उन्नीसवाँ तत्त्व हैं।
रसग्राहक इन्द्रिय रसना बीसवाँ तत्त्व है।
गन्धग्राहक इन्द्रिय नासिका इक्कीसवाँ तत्त्व है।
व्यक्तवागुच्चारक वागिन्द्रिय बाइसवाँ तत्त्व है।
ग्रहणत्यागानुकूल पाणि तेइसवाँ तत्त्व है।
गमनानुकूल पाद चौबीसवाँ तत्त्व है।
मलविसर्जनक पायु इन्द्रिय पचीसवाँ तत्त्व है।
मैथुनजनक उपस्थ इन्द्रिय छब्बीसवाँ तत्त्व है।