सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

८ परशुरामकल्पसूत्रम्
छत्तीस तत्त्व भी सामान्यरूप से दृश्य और द्रष्टा रूप से दो भागों में
विभक्त हैं। जड़ों में दृश्यत्व और केवल तत्त्व में द्रष्टा का भाव। उसी तरह
निष्कञ्चुक परशिव और शरीर से कञ्चुकित जीव ये दो भाव होते हैं। जीव तत्त्व
भाव में परिगणित है। परशिव तत्त्ववाद से ऊपर है। यह दोनों में भेद है।
सर्वतन्त्रस्वतन्त्र परशिव अघटितघटनापटीयसी अपनी ही माया शक्ति द्वारा अपने
परम निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य को स्वयम् आच्छादित करता है। परिणाम-स्वरूप
आच्छादित परस्वातन्त्र्य परिमित स्वातन्त्र्य में परिणत हो जाता है। यही पारिमित्य
आणव मल कहलाता है। आणव मल को ही अविद्या भी कहते हैं।
आणव मल से आच्छन्न शिव स्वयम् अणुशरीर से परिमित हो जाता
है। इस अवस्था में वह अन्य अनन्त परिमित शरीराच्छन्न जीवों को स्वात्म से
भिन्न रूप में देखने लगता है। यह उसकी माया-परिच्छिन्न अवस्था है। इसे
मायिक मल कहते हैं।
यही भेदप्रथा मानी जाती है। जीव भेद-प्रथा से प्रथित परिमित प्रमाता
बन जाता है। ये जीव अब मायामलिन होकर अनन्त अनन्त शुभकर्मों को
अनुष्ठित करते हुए कर्मों के संस्कारों से प्रभावित होते रहते हैं। विवशता की
एक ऐसी परम्परा चल पड़ती है, जिसमें जीवजगत् की सक्रियता ही अभिशाप
बन जाती है। इसे कार्म मल कहते हैं।
यही तीनों आणव, मायिक और कार्ममल ही शरीर बनकर शरीरी को
कञ्चुक की कमनीयता प्रदान करते हैं। इस तरह शिव ही जीव भाव में पड़ा
भेदवाद की विभीषिका का उपभोग कर रहा है। यही शरीर कञ्चुकित शिव जीव
है। निष्कञ्चुक अर्थात् ऐसे कञ्चुकों से रहित तत्त्वातीत शिव ही परमशिव है॥५॥
एवं जीवेश्वरयोः स्वरूपमुक्त्वा कः पुरुषार्थ इति निर्दिशति-
स्वविमर्शः पुरुषार्थः ॥६॥
स्वस्य परशिवरूपस्य विमर्शः प्रत्यभिज्ञानं सोऽहमित्याकारकम्। यथा
कण्ठस्थं चामीकरं विस्मृत्य तदन्वेषणाय देशाद्देशं धावन् केनचिद् उद्बुद्ध-
संस्कारः कण्ठस्थं पश्यति तथा विस्मृतस्वरूपज्ञानस्य पुनर्लाभः पुरुषार्थः
अकृत्रिम इत्यर्थः। एतादृशपुरुषार्थलाभश्च न भगवत्कृपामृते भविष्यति। तदुक्तं